वाशिंगटन,22 अगस्त (युआईटीवी)- अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप का प्रशासन ईरान पर आर्थिक दबाव बढ़ाने के लिए चीन की ओर रुख कर रहा है और बीजिंग से तेहरान की एक अहम आर्थिक लाइफलाइन (वित्तीय मदद का ज़रिया) को काटने में मदद करने को कह रहा है। यह कदम ऐसे समय में उठाया जा रहा है,जब वॉशिंगटन अमेरिकी इतिहास के सबसे कड़े प्रतिबंध लगाने की तैयारी कर रहा है,साथ ही ईरान के तेल निर्यात को रोकने के लिए नौसैनिक नाकेबंदी की योजना भी बना रहा है।
बेसेंट ने चीन से अमेरिकी मुहिम में सहयोग करने को कहा है और चेतावनी दी है कि जो देश और कंपनियाँ ईरान के साथ व्यापार जारी रखेंगी,उन्हें गंभीर आर्थिक नतीजों का सामना करना पड़ सकता है। हालाँकि,चीन ने इस तरीके को खारिज कर दिया है। उसका तर्क है कि प्रतिबंधों और आर्थिक दबाव से विवाद हल नहीं होगा और इसके बजाय उसने कूटनीतिक समाधान की वकालत की है।
वॉशिंगटन की रणनीति के लिए चीन खास तौर पर अहम है क्योंकि वह ईरान का सबसे बड़ा तेल खरीदार बना हुआ है। ईरान से भेजे जाने वाले तेल का 80% से ज़्यादा हिस्सा चीन जाता है,जिससे चीनी खरीदार तेहरान के लिए कमाई का एक अहम ज़रिया बन गए हैं। अमेरिकी अधिकारियों का मानना है कि इस व्यापार पर रोक लगाने से ईरान की अपनी सरकार और सैन्य गतिविधियों के लिए फंड जुटाने की क्षमता काफी कमज़ोर हो सकती है।
इस दबाव का असर चीन को होने वाली ईरानी कच्चे तेल की सप्लाई पर दिखने लगा है। चीनी खरीदारों के लिए ईरानी तेल की पेशकश में भारी कमी आई है,जबकि कीमतें बढ़ गई हैं क्योंकि होर्मुज जलडमरूमध्य पर अमेरिकी नाकेबंदी से शिपमेंट में रुकावट आ रही है। शेडोंग में चीन की स्वतंत्र रिफाइनरियाँ,जो पारंपरिक रूप से सस्ते ईरानी कच्चे तेल पर बहुत ज़्यादा निर्भर रही हैं,अब ब्राज़ील और इराक जैसे देशों से वैकल्पिक सप्लाई की तलाश कर रही हैं।
बीजिंग का विरोध ट्रंप के लिए एक बड़ी चुनौती है। चीन ने लगातार अमेरिका के एकतरफा प्रतिबंधों का विरोध किया है और सालों के अमेरिकी दबाव के बावजूद ईरान के साथ महत्वपूर्ण आर्थिक संबंध बनाए रखे हैं। विश्लेषकों का कहना है कि चीन और रूस के साथ ईरान के करीबी व्यापारिक संबंध तेहरान को पूरी तरह से अलग-थलग करने की वाशिंगटन की कोशिश को मुश्किल बना सकते हैं।
ट्रंप की नई रणनीति मुख्य रूप से सैन्य दबाव से हटकर एक तेज़ आर्थिक अभियान की ओर बढ़ने का संकेत देती है। अमेरिकी प्रशासन ने चेतावनी दी है कि ईरान की मदद करने वाले देशों को ‘सेकेंडरी प्रतिबंधों’ का सामना करना पड़ सकता है,जिससे टकराव तेहरान से आगे बढ़ सकता है और वाशिंगटन के प्रमुख व्यापारिक साझेदारों के साथ मतभेद पैदा हो सकते हैं।
इस तनाव के बढ़ने से वैश्विक ऊर्जा बाज़ार के लिए भी जोखिम पैदा हो गए हैं। होर्मुज जलडमरूमध्य अंतर्राष्ट्रीय तेल सप्लाई के लिए एक महत्वपूर्ण मार्ग बना हुआ है और इसमें रुकावटों के कारण कच्चे तेल की कीमतें पहले ही बढ़ चुकी हैं। ईरान द्वारा जवाबी कार्रवाई की धमकी और वाशिंगटन द्वारा आर्थिक नाकेबंदी को और कड़ा करने के कारण, आगे और रुकावट की आशंका बनी हुई है।
फिलहाल,ईरान के साथ चल रहे विवाद को खत्म करने के तरीके को लेकर अमेरिका और चीन के बीच गहरी असहमति है। वॉशिंगटन का तर्क है कि भारी आर्थिक दबाव तेहरान को अपना रुख बदलने पर मजबूर कर सकता है,जबकि बीजिंग का मानना है कि प्रतिबंधों और दबाव से कोई स्थायी समाधान निकलने की संभावना कम है।
इस गतिरोध ने चीन के सामने एक मुश्किल विकल्प खड़ा कर दिया है या तो वह वॉशिंगटन का साथ दे और ईरान के साथ अपने पुराने ऊर्जा संबंधों को नुकसान पहुँचाने का जोखिम उठाए या फिर ईरानी तेल खरीदना जारी रखे और अमेरिका के कड़े प्रतिबंधों का सीधा निशाना बनने का खतरा मोल ले। इस फैसले का असर न केवल ईरान विवाद पर,बल्कि अमेरिका और चीन के पहले से ही नाजुक संबंधों पर भी पड़ सकता है।
