एच-1बी वीज़ा

एच-1बी वीजा पर 1.03 लाख डॉलर अतिरिक्त शुल्क का प्रस्ताव,भारतीय पेशेवरों की भर्ती अमेरिकी कंपनियों के लिए होगी महँगी

वॉशिंगटन,25 अगस्त (युआईटीवी)- अमेरिका में ट्रंप प्रशासन ने एच-1बी वीजा व्यवस्था को लेकर एक बड़ा प्रस्ताव सामने रखा है। इसके तहत ‘कैप-सब्जेक्ट’ एच-1बी याचिकाओं पर 1,03,265 डॉलर का अतिरिक्त शुल्क लगाने की योजना है। यदि यह प्रस्ताव अंतिम रूप से लागू हो जाता है,तो अमेरिकी कंपनियों के लिए विदेशी विशेषज्ञ कर्मचारियों,खासकर भारत जैसे देशों से आने वाले पेशेवरों को नियुक्त करना काफी महँगा हो सकता है। यह शुल्क एच-1बी आवेदन से जुड़ी मौजूदा सभी फीस के अतिरिक्त होगा और नियोक्ताओं को याचिका दाखिल करते समय इसका भुगतान करना पड़ेगा।

अमेरिकी डिपार्टमेंट ऑफ होमलैंड सिक्योरिटी यानी डीएचएस ने प्रस्तावित नियम को लेकर जानकारी देते हुए कहा है कि यह अतिरिक्त शुल्क सभी कैप-सब्जेक्ट एच-1बी याचिकाओं पर लागू होगा। इसमें वे याचिकाएँ भी शामिल होंगी,जो तथाकथित ‘एडवांस्ड डिग्री छूट’ के तहत आती हैं। हालाँकि,प्रस्ताव अभी अंतिम नियम नहीं बना है। इसे मंगलवार को फेडरल रजिस्टर में प्रकाशित किया जाना है। इसके बाद आम लोगों, कंपनियों,संगठनों और अन्य संबंधित पक्षों को 30 दिनों तक अपनी टिप्पणियाँ,सुझाव और आपत्तियाँ दर्ज कराने का अवसर मिलेगा। इन प्रतिक्रियाओं पर विचार करने के बाद ही सरकार प्रस्ताव को अंतिम रूप देने या उसमें बदलाव करने का फैसला कर सकती है।

प्रस्तावित शुल्क की सबसे बड़ी खासियत इसकी बेहद ऊँची राशि है। 1,03,265 डॉलर का अतिरिक्त भुगतान किसी कंपनी के लिए एक कर्मचारी की एच-1बी याचिका दाखिल करने की लागत को कई गुना बढ़ा सकता है। इसके अलावा नियोक्ता को एच-1बी प्रक्रिया से संबंधित अन्य निर्धारित शुल्क भी देने होंगे। इसका सीधा असर उन कंपनियों पर पड़ सकता है,जो तकनीक,इंजीनियरिंग,स्वास्थ्य सेवा,वित्त और अन्य विशेषज्ञता वाले क्षेत्रों में विदेशी पेशेवरों को नियुक्त करती हैं।

डीएचएस का अनुमान है कि प्रस्तावित शुल्क से अमेरिकी सरकार को हर साल लगभग 8.8 अरब डॉलर की अतिरिक्त आय हो सकती है। विभाग ने यह अनुमान प्रति वर्ष लगभग 85,000 एच-1बी याचिकाओं के आधार पर लगाया है। सरकार का कहना है कि इस अतिरिक्त राशि का उपयोग कानूनी इमिग्रेशन व्यवस्था से जुड़े विभिन्न खर्चों को पूरा करने में किया जाएगा। अमेरिकी प्रशासन का तर्क है कि इमिग्रेशन प्रणाली की जाँच,सत्यापन, सुरक्षा परीक्षण और संचालन पर होने वाले खर्च का पूरा या बड़ा हिस्सा उन लोगों और संस्थाओं से वसूला जाना चाहिए,जो इस व्यवस्था का इस्तेमाल करते हैं।

यूएस सिटीजनशिप एंड इमिग्रेशन सर्विसेज के प्रवक्ता जैक काहलर के अनुसार, प्रस्तावित एच-1बी शुल्क का उद्देश्य उन खर्चों की भरपाई करना है,जो संघीय सरकार कानूनी इमिग्रेशन कार्यक्रमों की जाँच,सत्यापन और संचालन पर करती है। उनका कहना है कि अगर इन खर्चों की भरपाई शुल्क के जरिए नहीं होती है,तो अंततः इसका बोझ अमेरिकी करदाताओं पर पड़ सकता है। सरकार का कहना है कि प्रस्तावित व्यवस्था के जरिए इमिग्रेशन प्रणाली से जुड़े खर्चों के लिए अतिरिक्त संसाधन उपलब्ध होंगे।

डीएचएस ने प्रस्तावित शुल्क से होने वाली आय के इस्तेमाल का व्यापक खाका भी बताया है। इसके तहत इमिग्रेशन लाभों के आवेदनों की जाँच,धोखाधड़ी की पहचान,राष्ट्रीय सुरक्षा से संबंधित जाँच,सरकारी सूचना प्रणालियों का आधुनिकीकरण और रिकॉर्ड प्रबंधन जैसी गतिविधियों को वित्तीय सहायता मिल सकती है। इसके अलावा इमिग्रेशन अदालतों के संचालन,वीजा प्रोसेसिंग,श्रम मानकों के अनुपालन और विभिन्न सरकारी एजेंसियों के बीच बेहतर समन्वय के लिए भी इस राशि का उपयोग किए जाने की बात कही गई है।

विभाग के अनुसार,अतिरिक्त राशि का इस्तेमाल कई सरकारी संस्थाओं की इमिग्रेशन संबंधी गतिविधियों में किया जा सकता है। इनमें यूएस सिटीजनशिप एंड इमिग्रेशन सर्विसेज,कस्टम्स एंड बॉर्डर प्रोटेक्शन,इमिग्रेशन एंड कस्टम्स एनफोर्समेंट,न्याय विभाग की इमिग्रेशन अदालतें,विदेश विभाग और श्रम विभाग शामिल हैं। सरकार का तर्क है कि इमिग्रेशन व्यवस्था से जुड़े काम का दायरा काफी बड़ा है और इसकी जाँच,सुरक्षा तथा प्रशासनिक लागत को पूरा करने के लिए अतिरिक्त वित्तीय संसाधनों की आवश्यकता है।

हालाँकि,प्रस्तावित शुल्क हर तरह की एच-1बी याचिका पर लागू नहीं होगा। डीएचएस के अनुसार,एच-1बी कैप से छूट प्राप्त संस्थाओं को इस अतिरिक्त शुल्क से बाहर रखा जाएगा। इनमें कुछ गैर-लाभकारी शोध संगठन,सरकारी शोध संस्थान और उच्च शिक्षा संस्थान शामिल हैं। इसका मतलब यह है कि कुछ ऐसे संगठन,जो एच-1बी कैप से पहले ही बाहर हैं,उन्हें 1,03,265 डॉलर का प्रस्तावित अतिरिक्त शुल्क नहीं देना होगा।

एच-1बी वीजा अमेरिकी कंपनियों के लिए विदेशी विशेषज्ञ कर्मचारियों को नियुक्त करने का एक महत्वपूर्ण माध्यम है। इसके तहत हर वर्ष 65,000 नियमित एच-1बी वीजा उपलब्ध होते हैं। इसके अतिरिक्त अमेरिकी संस्थानों से मास्टर डिग्री या उससे अधिक योग्यता हासिल करने वाले विदेशी नागरिकों के लिए 20,000 अतिरिक्त वीजा का प्रावधान है। इस तरह कुल 85,000 एच-1बी वीजा वार्षिक कैप के तहत उपलब्ध होते हैं। दुनिया भर के बड़ी संख्या में पेशेवर इस व्यवस्था के माध्यम से अमेरिका में काम करने का अवसर प्राप्त करते हैं।

इस व्यवस्था में भारतीय पेशेवरों की भूमिका विशेष रूप से महत्वपूर्ण रही है। अमेरिकी तकनीकी कंपनियों और अन्य विशेषज्ञता वाले क्षेत्रों में भारत से बड़ी संख्या में पेशेवर एच-1बी व्यवस्था के जरिए काम करते हैं। इसलिए प्रस्तावित भारी शुल्क का असर भारतीय पेशेवरों और उन्हें नियुक्त करने वाली अमेरिकी कंपनियों पर विशेष रूप से पड़ने की आशंका है। हालाँकि,शुल्क सीधे कर्मचारियों से नहीं,बल्कि एच-1बी याचिका दाखिल करने वाले नियोक्ताओं से लिया जाना प्रस्तावित है,लेकिन कंपनियाँ इस अतिरिक्त लागत को नियुक्ति के फैसले में शामिल कर सकती हैं।

सरकार का कहना है कि प्रस्तावित शुल्क सभी नियोक्ताओं पर समान रूप से लागू होगा। इसमें कंपनियों के आकार के आधार पर कोई अलग दर प्रस्तावित नहीं की गई है। यानी छोटी कंपनी हो या बड़ी, यदि वह ऐसी एच-1बी याचिका दाखिल करती है जो कैप के दायरे में आती है,तो उसे समान अतिरिक्त शुल्क का सामना करना पड़ सकता है। गैर-लाभकारी संस्थाओं पर भी यह शुल्क लागू हो सकता है,जब तक कि वे एच-1बी कैप से छूट प्राप्त श्रेणी में नहीं आतीं।

डीएचएस के अपने विश्लेषण से पता चलता है कि इसका असर छोटी कंपनियों पर भी काफी बड़ा हो सकता है। वित्तीय वर्ष 2025 में एच-1बी कैप-सब्जेक्ट याचिकाएँ दाखिल करने वाली कुल 28,649 संस्थाओं में से 14,541 छोटी संस्थाएँ थीं। विभाग का अनुमान है कि लगभग 11,051 छोटी संस्थाओं पर प्रस्तावित नियम का महत्वपूर्ण आर्थिक प्रभाव पड़ सकता है। यह इस विश्लेषण में शामिल छोटी संस्थाओं का लगभग 76 प्रतिशत हिस्सा है। इससे स्पष्ट है कि प्रस्तावित शुल्क का असर केवल बड़ी बहुराष्ट्रीय कंपनियों तक सीमित नहीं रहेगा।

प्रस्ताव को लेकर अमेरिका में आलोचना भी शुरू हो गई है। इमिग्रेशन सुधार के लिए काम करने वाले संगठन एफडब्ल्यूडी यूएस के अध्यक्ष टॉड शुल्टे ने इसे अमेरिकी कारोबारों पर भारी टैक्स करार दिया है। उनका कहना है कि एच-1बी पर इतना बड़ा शुल्क अमेरिकी कंपनियों की वैश्विक प्रतिभा को आकर्षित करने की क्षमता को कमजोर कर सकता है। उनके अनुसार,यदि विदेशी विशेषज्ञों को नियुक्त करना अत्यधिक महँगा हो जाता है,तो कंपनियाँ प्रतिभाशाली कर्मचारियों की तलाश अमेरिका के बाहर कर सकती हैं।

शुल्टे ने यह भी चेतावनी दी कि इस तरह के शुल्क से नौकरियाँ और कारोबार दूसरे देशों में जा सकते हैं और इसका असर केवल विदेशी कर्मचारियों तक सीमित नहीं रहेगा। उनके अनुसार,यदि अमेरिका दुनिया के सर्वश्रेष्ठ प्रतिभाशाली लोगों को आकर्षित करने की अपनी क्षमता खोता है तो अंततः अमेरिकी कंपनियों और कर्मचारियों दोनों को नुकसान हो सकता है। उन्होंने यह सवाल भी उठाया कि क्या सरकार के पास किसी एच-1बी आवेदन की वास्तविक प्रोसेसिंग लागत से कहीं अधिक राशि वसूलने का कानूनी अधिकार है।

आलोचकों का सबसे बड़ा सवाल प्रस्तावित शुल्क की राशि को लेकर है। सामान्य प्रशासनिक या आवेदन प्रक्रिया की लागत और 1,03,265 डॉलर के अतिरिक्त शुल्क के बीच बड़ा अंतर है। आलोचकों का तर्क है कि यदि शुल्क का उद्देश्य केवल इमिग्रेशन आवेदन की जाँच और प्रोसेसिंग लागत की भरपाई करना है,तो इतनी बड़ी राशि उचित नहीं लगती। शुल्टे ने प्रस्ताव को कानून के संभावित उल्लंघन से भी जोड़ा और कहा कि वास्तविक प्रोसेसिंग लागत से कहीं अधिक राशि वसूलने का प्रावधान कानूनी चुनौती का सामना कर सकता है।

वहीं,डीएचएस इस आलोचना से सहमत नहीं है। विभाग का कहना है कि अमेरिकी इमिग्रेशन कानून सरकार को ऐसे शुल्क निर्धारित करने की अनुमति देता है,जिनके जरिए इमिग्रेशन और नागरिकता सेवाओं से जुड़ी पूरी लागत की भरपाई की जा सके। सरकार का यह भी तर्क है कि एच-1बी के तहत विदेशी कर्मचारियों को नियुक्त करने वाली कंपनियां सामान्य व्यक्तिगत आवेदकों की तुलना में अधिक भुगतान करने की क्षमता रखती हैं। इसलिए नियोक्ताओं पर अधिक शुल्क लगाने को सरकार इमिग्रेशन व्यवस्था के वित्तपोषण का एक उचित तरीका मानती है।

फिलहाल प्रस्ताव अंतिम नहीं है और इसके लागू होने से पहले सार्वजनिक टिप्पणियों की प्रक्रिया पूरी होगी। 30 दिनों के दौरान कंपनियाँ,उद्योग संगठन,श्रमिक संगठन,इमिग्रेशन विशेषज्ञ और अन्य प्रभावित पक्ष अपनी राय दे सकते हैं। इन टिप्पणियों के आधार पर प्रशासन शुल्क में बदलाव कर सकता है या प्रस्ताव को मौजूदा रूप में आगे बढ़ा सकता है। अंतिम निर्णय के बाद ही यह स्पष्ट होगा कि 1,03,265 डॉलर का शुल्क वास्तव में किस रूप में लागू होगा।

यदि प्रस्ताव लागू होता है,तो अमेरिकी कंपनियों के लिए एच-1बी कर्मचारियों की नियुक्ति से जुड़ा आर्थिक समीकरण काफी बदल सकता है। खासकर तकनीकी और विशेषज्ञता आधारित क्षेत्रों में जहां कंपनियां वैश्विक प्रतिभा पर निर्भर हैं,वहाँ नियोक्ताओं को अतिरिक्त लागत और प्रतिभा की जरूरत के बीच संतुलन बनाना होगा। भारतीय पेशेवरों के लिए भी इसका महत्व इसलिए बढ़ जाता है,क्योंकि अमेरिका लंबे समय से भारतीय तकनीकी और विशेषज्ञता वाले कर्मचारियों के लिए प्रमुख रोजगार बाजार रहा है।

फिलहाल इस प्रस्ताव ने अमेरिका की इमिग्रेशन नीति और विदेशी प्रतिभाओं को लेकर नई बहस छेड़ दी है। ट्रंप प्रशासन इसे कानूनी इमिग्रेशन व्यवस्था की लागत और सुरक्षा जरूरतों को पूरा करने की दिशा में जरूरी कदम बता रहा है,जबकि आलोचकों को आशंका है कि अत्यधिक शुल्क अमेरिका की वैश्विक प्रतिस्पर्धात्मकता को नुकसान पहुँचा सकता है। अब 30 दिनों की सार्वजनिक टिप्पणी प्रक्रिया और उसके बाद सरकार के अंतिम फैसले पर सबकी नजर रहेगी।