कनाडा के प्रधानमंत्री मार्क कार्नी (तस्वीर क्रेडिट@DragonSG001)

अमेरिकी टैरिफ से कनाडा में बढ़ा तनाव,कार्नी बोले- बराबरी के सम्मान के साथ बातचीत को तैयार

ओटावा,25 अगस्त (युआईटीवी)- अमेरिका की ओर से कनाडाई उत्पादों पर नए और भारी टैरिफ लागू किए जाने के बाद दोनों पड़ोसी देशों के बीच व्यापारिक तनाव एक बार फिर बढ़ गया है। अमेरिकी कार्रवाई के जवाब में कनाडा के राजनीतिक नेताओं ने भी अपना रुख सख्त कर लिया है। कनाडा के प्रधानमंत्री मार्क कार्नी ने कहा है कि उनका देश अमेरिका के साथ बातचीत के लिए तैयार है,लेकिन इसके लिए वॉशिंगटन को अपना रवैया बदलना होगा और कनाडा के उद्योगों तथा अर्थव्यवस्था के साथ साझेदार की तरह व्यवहार करना होगा। उन्होंने साफ किया कि कनाडा को अमेरिका की किसी शाखा या अधीन इकाई के रूप में स्वीकार नहीं किया जाएगा।

क्यूबेक में पत्रकारों से बातचीत के दौरान प्रधानमंत्री मार्क कार्नी ने कहा कि कनाडा बातचीत के खिलाफ नहीं है। अगर अमेरिकी पक्ष सही सोच के साथ और कनाडाई उद्योगों को साझेदार की तरह सम्मान देते हुए बातचीत की मेज पर आता है,तो कनाडा भी निश्चित रूप से वार्ता के लिए तैयार रहेगा। हालाँकि,उन्होंने यह भी स्पष्ट कर दिया कि उनका देश ऐसी व्यवस्था स्वीकार नहीं करेगा,जिसमें कनाडा को अमेरिका से कमतर समझा जाए या उसके साथ ऐसा व्यापारिक व्यवहार किया जाए जिससे कनाडाई अर्थव्यवस्था को अनुचित नुकसान पहुँचे।

कार्नी का यह बयान ऐसे समय में आया है,जब अमेरिका ने कनाडा से आयात होने वाले करीब 20 अरब डॉलर मूल्य के सामान पर 50 प्रतिशत टैरिफ लागू कर दिया है। यह नया शुल्क शनिवार आधी रात के बाद प्रभावी हुआ। अमेरिका का यह कदम दोनों देशों के बीच लंबे समय तक चली व्यापार वार्ताओं के किसी ठोस समझौते तक नहीं पहुँचने के बाद उठाया गया है। भारी टैरिफ लागू होने से कनाडाई कारोबारियों और उद्योगों पर दबाव बढ़ने की आशंका है,जबकि अमेरिका में भी कनाडाई उत्पादों की कीमतों और आपूर्ति श्रृंखला पर इसका असर पड़ सकता है।

कनाडा के वित्त मंत्री फ्रांस्वा-फिलिप शैम्पेन ने भी अमेरिकी टैरिफ के खिलाफ सरकार के सख्त रुख का संकेत दिया है। मॉन्ट्रियल में हुई चर्चाओं के दौरान उन्होंने कहा कि एक समय ऐसा आता है जब किसी देश को यह कहना पड़ता है कि अब बहुत हो गया। उनके बयान से साफ है कि कनाडा अमेरिकी दबाव को अनिश्चितकाल तक स्वीकार करने के पक्ष में नहीं है। उन्होंने यह भी संकेत दिया कि 50 प्रतिशत टैरिफ से प्रभावित कनाडाई कारोबारों के लिए संघीय सरकार की ओर से सहायता उपलब्ध कराई जाएगी।

शैम्पेन ने कहा कि कनाडा सरकार लंबे समय से ऐसी अर्थव्यवस्था तैयार करने की दिशा में काम कर रही है,जो मजबूत होने के साथ-साथ टिकाऊ भी हो। उनके अनुसार,सरकार की प्राथमिक योजना हमेशा से एक मजबूत कनाडाई अर्थव्यवस्था का निर्माण करना रही है। इसके लिए प्रांतों के बीच व्यापारिक बाधाओं को कम करना,अर्थव्यवस्था में विविधता लाना और देश में बड़े पैमाने पर विकास परियोजनाओं को आगे बढ़ाना जरूरी है। अमेरिकी टैरिफ के कारण पैदा हुई परिस्थितियों के बीच सरकार अब घरेलू आर्थिक क्षमता को और मजबूत करने पर जोर दे रही है।

कनाडा के पूर्व प्रधानमंत्री जीन क्रेतियन ने मौजूदा व्यापारिक विवाद में सरकार को और कड़ा जवाब देने की सलाह दी है। उन्होंने सुझाव दिया कि कनाडा को ऊर्जा,तेल, प्राकृतिक गैस और पोटाश जैसे महत्वपूर्ण उत्पादों के अमेरिकी निर्यात पर कर लगाने पर विचार करना चाहिए। उनका मानना है कि कनाडा को ऐसे क्षेत्रों में जवाबी कार्रवाई करनी चाहिए,जहाँ अमेरिका पर इसका सीधा और बड़ा आर्थिक प्रभाव पड़े।

क्रेतियन ने कहा कि अगर कनाडा को मजबूती से खड़ा होना है तो उसे वहीं चोट करनी होगी,जहाँ सबसे ज्यादा असर पड़े। उन्होंने महत्वपूर्ण प्राकृतिक संसाधनों पर निर्यात कर लगाने का सुझाव देते हुए कहा कि इसका फायदा यह होगा कि इस शुल्क का आर्थिक बोझ मुख्य रूप से अमेरिकी खरीदारों पर पड़ेगा। उनका यह बयान दोनों देशों के बीच बढ़ते तनाव में ऊर्जा क्षेत्र की रणनीतिक भूमिका को सामने लाता है।

ओंटारियो के प्रीमियर डग फोर्ड ने भी कनाडा को सभी उपलब्ध जवाबी उपायों के इस्तेमाल के लिए तैयार रहने की सलाह दी है। फोर्ड ने कहा कि यदि दोनों देशों के व्यापारिक संबंध और बिगड़ते हैं,तो कनाडा को अपनी महत्वपूर्ण आर्थिक ताकतों का इस्तेमाल करने से पीछे नहीं हटना चाहिए। उन्होंने चेतावनी दी कि कनाडा जरूरत पड़ने पर अमेरिका को बिजली और महत्वपूर्ण खनिजों की आपूर्ति रोकने जैसे कदमों पर भी विचार कर सकता है।

कनाडा और अमेरिका के बीच ऊर्जा और प्राकृतिक संसाधनों का व्यापार दोनों देशों की अर्थव्यवस्थाओं के लिए महत्वपूर्ण है। कनाडा लंबे समय से अमेरिका को तेल,प्राकृतिक गैस,बिजली और अन्य खनिज संसाधनों की आपूर्ति करता रहा है। ऐसे में इन उत्पादों की आपूर्ति को जवाबी कार्रवाई के रूप में इस्तेमाल करने की चेतावनी अमेरिका के लिए भी चिंता का कारण बन सकती है। यदि दोनों देशों के बीच व्यापारिक टकराव बढ़ता है,तो इसका असर उद्योगों के साथ-साथ उपभोक्ताओं और उत्तरी अमेरिकी आपूर्ति श्रृंखला पर भी पड़ सकता है।

अमेरिकी टैरिफ लागू होने के बाद कनाडा के सामने सबसे बड़ी चुनौती घरेलू उद्योगों को अचानक बढ़े व्यापारिक दबाव से बचाने की है। 50 प्रतिशत शुल्क से प्रभावित कंपनियों के लिए उत्पादन लागत और अमेरिकी बाजार में प्रतिस्पर्धा दोनों मुश्किल हो सकती हैं। कई कनाडाई कंपनियां अमेरिकी बाजार पर काफी हद तक निर्भर हैं। ऐसे में टैरिफ के कारण उनके उत्पादों की कीमत बढ़ सकती है और अमेरिकी बाजार में उनकी माँग प्रभावित हो सकती है।

इसी वजह से वित्त मंत्री शैम्पेन ने सरकार की ओर से प्रभावित कारोबारों को सहायता देने का संकेत दिया है। सरकार की कोशिश यह है कि अमेरिकी टैरिफ के कारण कंपनियों को तत्काल नुकसान से बचाया जाए और साथ ही उन्हें दूसरे बाजारों की तलाश के लिए प्रोत्साहित किया जाए। कनाडा लंबे समय से अपनी अर्थव्यवस्था को अमेरिकी बाजार पर अत्यधिक निर्भरता से बाहर निकालने की कोशिश करता रहा है। मौजूदा विवाद इस रणनीति को और तेज कर सकता है।

प्रधानमंत्री कार्नी ने भी अर्थव्यवस्था में विविधता लाने और घरेलू स्तर पर व्यापारिक बाधाओं को हटाने की जरूरत पर जोर दिया है। कनाडा के अलग-अलग प्रांतों के बीच मौजूद व्यापारिक बाधाओं को कम करने से घरेलू बाजार को मजबूत किया जा सकता है। यदि देश के भीतर वस्तुओं और सेवाओं की आवाजाही आसान होती है,तो कंपनियों को अमेरिकी बाजार पर निर्भरता कम करने में मदद मिल सकती है।

हालाँकि,कनाडा अभी भी अमेरिका के साथ बातचीत का रास्ता बंद नहीं करना चाहता। कार्नी ने स्पष्ट किया है कि अगर अमेरिका कनाडा के साथ सम्मानजनक और बराबरी के आधार पर बातचीत करता है,तो कनाडा भी वार्ता के लिए तैयार रहेगा। इससे संकेत मिलता है कि ओटावा एक ओर जवाबी कार्रवाई की तैयारी कर रहा है,लेकिन दूसरी ओर व्यापारिक विवाद को बातचीत के जरिए हल करने की संभावना भी बनाए रखना चाहता है।

कनाडा की ओर से जवाबी टैरिफ 8 सितंबर से लागू किए जाने की बात पहले ही कही जा चुकी है। इससे दोनों देशों के बीच व्यापारिक टकराव का अगला चरण शुरू हो सकता है। यदि अमेरिका अपने मौजूदा टैरिफ को वापस लेने या कम करने के लिए तैयार नहीं होता, तो कनाडा की जवाबी कार्रवाई अमेरिकी कारोबारों पर भी असर डाल सकती है।

दोनों देशों के बीच मौजूदा विवाद केवल टैरिफ तक सीमित नहीं रह गया है। ऊर्जा, महत्वपूर्ण खनिज,औद्योगिक उत्पादन और आपूर्ति श्रृंखला जैसे रणनीतिक क्षेत्रों पर भी इसका प्रभाव पड़ सकता है। कनाडा की ओर से बिजली और खनिजों की आपूर्ति रोकने की चेतावनी तथा ऊर्जा उत्पादों पर निर्यात कर लगाने का सुझाव बताता है कि आने वाले समय में विवाद आर्थिक दबाव के नए क्षेत्रों तक पहुँच सकता है।

फिलहाल कनाडा का संदेश अमेरिका के लिए स्पष्ट है कि वह बातचीत चाहता है,लेकिन बराबरी और सम्मान के आधार पर। कार्नी सरकार घरेलू उद्योगों को सहायता देने, अर्थव्यवस्था में विविधता लाने और जवाबी कदमों की तैयारी कर रही है। वहीं,अमेरिका द्वारा लगाए गए 50 प्रतिशत टैरिफ के कारण दोनों देशों के बीच व्यापारिक संबंधों पर दबाव बढ़ गया है। आने वाले सप्ताहों में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि क्या दोनों देश टकराव बढ़ाने के बजाय बातचीत की मेज पर लौटते हैं या फिर जवाबी शुल्क और रणनीतिक प्रतिबंधों के जरिए व्यापार युद्ध को और तेज करते हैं।