झारखंड में प्रतियोगी परीक्षाओं में धाँधली का बड़ा खुलासा (तस्वीर क्रेडिट@itSachinverma)

झारखंड में प्रतियोगी परीक्षाओं में धाँधली का बड़ा खुलासा,स्ट्रांग रूम से निकलती थीं कॉपियाँ और होटलों में लिखवाए जाते थे जवाब

राँची,31 अगस्त (युआईटीवी)- झारखंड में झारखंड लोक सेवा आयोग और झारखंड कर्मचारी चयन आयोग की प्रतियोगी परीक्षाओं में कथित धाँधली को लेकर चल रही सीआईडी जाँच में चौंकाने वाले खुलासे सामने आए हैं। जाँच में ऐसे संकेत मिले हैं कि परीक्षा में गड़बड़ी का नेटवर्क केवल सॉफ्टवेयर और डेटा में हेरफेर तक सीमित नहीं था,बल्कि अति सुरक्षित माने जाने वाले स्ट्रांग रूम से उत्तरपुस्तिकाएँ निकालकर उन्हें होटलों और किराए के फ्लैटों तक पहुँचाने और वहाँ विशेषज्ञों से जवाब लिखवाने तक का खेल चल रहा था। इसके बाद इन कॉपियों को दोबारा गुप्त तरीके से स्ट्रांग रूम में रख दिया जाता था।

सीआईडी की विशेष जाँच टीम की ओर से गिरफ्तार परीक्षा संचालन एजेंसियों के कर्मचारियों,निदेशकों और कथित बिचौलियों से की गई पूछताछ के दौरान इस पूरे नेटवर्क के काम करने के तरीके को लेकर कई महत्वपूर्ण जानकारियाँ सामने आई हैं। जाँच एजेंसी अब आरोपियों के बयानों के साथ तकनीकी साक्ष्यों,सर्वर लॉग और वित्तीय लेन-देन की भी जाँच कर रही है। अधिकारियों को आशंका है कि प्रतियोगी परीक्षाओं की प्रक्रिया में सुनियोजित तरीके से हस्तक्षेप करने के लिए एक संगठित सिंडिकेट काम कर रहा था।

जाँच में सामने आए तथ्यों के मुताबिक,परीक्षा कराने के लिए आउटसोर्स की गई एजेंसियों ने कथित तौर पर ऐसे सॉफ्टवेयर और पोर्टल तैयार किए थे,जिनके माध्यम से परीक्षा परिणामों में हेरफेर किया जा सकता था। वेंडर एजेंसी ‘मेसर्स टीएसआर डेटा प्रोसेसिंग प्राइवेट लिमिटेड’ के कर्मचारी हेमंत वर्मा ने पूछताछ में कथित तौर पर बताया कि झारखंड में परीक्षा धाँधली का तरीका उत्तर प्रदेश विधानसभा की समीक्षा अधिकारी और सहायक समीक्षा अधिकारी परीक्षा में सामने आए कथित पैटर्न जैसा था।

बताया गया है कि वर्ष 2025 में टीडीपीएल के निदेशकों ने पिकर टेक्नोलॉजी प्राइवेट लिमिटेड के साथ मिलकर झारखंड लोक सेवा आयोग की परीक्षाओं के लिए विशेष सॉफ्टवेयर और पोर्टल तैयार कराया था। जाँच में यह पता लगाने की कोशिश की जा रही है कि इस सॉफ्टवेयर में कौन-कौन से तकनीकी बदलाव किए गए थे और इसका इस्तेमाल परीक्षा प्रक्रिया के किस चरण में किया जाता था।

आरोपियों के बयानों के अनुसार,कथित तौर पर इस सॉफ्टवेयर की मदद से परीक्षा से पहले ही उन उम्मीदवारों की पहचान कर ली जाती थी,जिनके साथ सेटिंग की गई थी। इसके बाद उनके उत्तरों में सीधे डेटाबेस के स्तर पर बदलाव किए जाने का दावा किया गया है। यदि जाँच में ये आरोप सही पाए जाते हैं,तो इसका मतलब होगा कि परीक्षा परिणामों को प्रभावित करने के लिए डिजिटल माध्यम का इस्तेमाल योजनाबद्ध तरीके से किया गया था।

लेकिन जाँच में केवल ऑनलाइन डेटा में हेरफेर की बात ही सामने नहीं आई है। मुख्य परीक्षाओं की उत्तरपुस्तिकाओं में कथित गड़बड़ी का एक अलग तरीका भी सामने आया है। आरोपी हेमंत वर्मा के बयान के अनुसार,परीक्षा समाप्त होने के बाद जब अभ्यर्थियों की उत्तरपुस्तिकाएँ झारखंड लोक सेवा आयोग के कार्यालय स्थित स्ट्रांग रूम में जमा हो जाती थीं,तब कथित तौर पर सेटिंग वाले उम्मीदवारों की खाली कॉपियों को वहाँ से बाहर निकाल लिया जाता था।

जाँच के मुताबिक,इन उत्तरपुस्तिकाओं को वेंडर एजेंसी टीडीपीएल के निदेशकों रामवीर सिंह,सत्यपाल सिंह,प्रदीप कुमार सिंह और मोहम्मद उस्मानी की मदद से अलग-अलग स्थानों तक पहुँचाया जाता था। आरोप है कि कॉपियों को होटलों और किराए के फ्लैटों में ले जाया जाता था,जहाँ विशेषज्ञों और संबंधित परीक्षार्थियों की मौजूदगी में उत्तर लिखवाए जाते थे। उत्तर लिखे जाने के बाद इन्हीं कॉपियों को दोबारा बेहद गुप्त तरीके से स्ट्रांग रूम में पहुँचा दिया जाता था।

इस पूरे मामले में मुख्य आरोपियों में शामिल बताए जा रहे अभय तिवारी के कथित कबूलनामे से भी जांचकर्ताओं को अहम जानकारी मिली है। उसके बयान के अनुसार, सहायक वन संरक्षक और वन क्षेत्र अधिकारी की प्रारंभिक परीक्षा समाप्त होने के बाद मुख्य परीक्षा की तैयारी के नाम पर राँची के हरिओम टावर में एक कमरा किराए पर लिया गया था। आरोप है कि इसी स्थान का इस्तेमाल उत्तरपुस्तिकाओं से जुड़े कथित फर्जीवाड़े के लिए किया गया।

अभय तिवारी के कथित बयान के मुताबिक,गिरोह से जुड़े एजेंट सतपाल और मिश्रा पंजाब,हरियाणा और लखनऊ से विशेषज्ञों को राँची बुलाते थे। इन विशेषज्ञों से कथित तौर पर अभ्यर्थियों की उत्तरपुस्तिकाएँ लिखवाई जाती थीं। इसके अलावा,उत्तर लिखे जाने के बाद संबंधित उम्मीदवारों के अंक बढ़वाने के लिए विभिन्न कॉलेजों और विश्वविद्यालयों के प्रोफेसरों से संपर्क किए जाने का भी आरोप है। इससे जाँच का दायरा और व्यापक हो गया है,क्योंकि अब जाँच एजेंसी यह पता लगाने की कोशिश कर रही है कि इस नेटवर्क में कितने लोग शामिल थे और किन-किन स्तरों पर मदद पहुँचाई गई।

आरोपी अभय तिवारी के कथित कबूलनामे के अनुसार,उसने अपने उम्मीदवारों के लिए उत्तरपुस्तिकाएँ लिखवाने और उनके अंक बढ़वाने के बदले 40 लाख रुपये का भुगतान किया था। इस कथित भुगतान ने जाँच में वित्तीय लेन-देन की भूमिका को भी महत्वपूर्ण बना दिया है। सीआईडी अब यह पता लगाने में जुटी है कि रकम किन लोगों तक पहुँचीं, भुगतान किस माध्यम से किया गया और क्या इसी तरह के लेन-देन अन्य उम्मीदवारों या आरोपियों के मामलों में भी हुए थे।

जाँच एजेंसी तकनीकी साक्ष्यों और सर्वर लॉग की जाँच के जरिए यह पता लगाने का प्रयास कर रही है कि कथित सॉफ्टवेयर के माध्यम से किन अभ्यर्थियों के डेटा में बदलाव किया गया। साथ ही,स्ट्रांग रूम की सुरक्षा व्यवस्था,उत्तरपुस्तिकाओं की आवाजाही, संबंधित कर्मचारियों की भूमिका और होटलों तथा किराए के फ्लैटों में हुई गतिविधियों की भी पड़ताल की जा रही है।

इस मामले ने झारखंड में प्रतियोगी परीक्षाओं की पारदर्शिता और सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। प्रतियोगी परीक्षाओं में शामिल होने वाले हजारों अभ्यर्थी अपनी मेहनत और योग्यता के आधार पर चयन की उम्मीद रखते हैं। ऐसे में यदि परीक्षा के बाद उत्तरपुस्तिकाओं में बदलाव या परिणामों में डिजिटल हेरफेर के आरोप जाँच में सही साबित होते हैं,तो यह पूरी परीक्षा व्यवस्था की विश्वसनीयता के लिए गंभीर मामला होगा।

फिलहाल सीआईडी कथित परीक्षा सिंडिकेट से जुड़े लोगों की भूमिका,तकनीकी नेटवर्क, आर्थिक लेन-देन और उत्तरपुस्तिकाओं की आवाजाही की कड़ियों को जोड़ने में जुटी है। जाँच पूरी होने के बाद ही यह स्पष्ट हो सकेगा कि इस नेटवर्क का दायरा कितना बड़ा था, कितनी परीक्षाओं को प्रभावित किया गया और कितने उम्मीदवार कथित तौर पर इसका हिस्सा बने। आरोपों की अंतिम पुष्टि जाँच और कानूनी प्रक्रिया के परिणाम के बाद ही होगी।