वॉशिंगटन,16 सितंबर (युआईटीवी)- ईरान के खिलाफ अमेरिकी सैन्य अभियान का आर्थिक बोझ लगातार बढ़ता जा रहा है। अमेरिकी कांग्रेसनल बजट ऑफिस ने अपनी ताजा रिपोर्ट में अनुमान लगाया है कि 1 अगस्त 2026 तक ईरान के खिलाफ जारी सैन्य संघर्ष पर अमेरिकी रक्षा विभाग यानी पेंटागन की लागत करीब 38 अरब डॉलर तक पहुँच चुकी है। सीबीओ के मुताबिक,यदि संघर्ष आगे भी जारी रहता है,तो लड़ाई की तीव्रता के आधार पर अमेरिका को हर महीने लगभग 2 से 3 अरब डॉलर अतिरिक्त खर्च करने पड़ सकते हैं। एजेंसी ने साथ ही चेतावनी दी है कि युद्ध का असर केवल सरकारी खर्च तक सीमित नहीं है,बल्कि अमेरिकी हथियार भंडार, ऊर्जा कीमतों, महँगाई और ब्याज दरों पर भी पड़ रहा है।
कांग्रेसनल बजट ऑफिस ने 15 सितंबर को जारी अपनी रिपोर्ट में ईरान के खिलाफ इस सैन्य अभियान की लागत और उसके व्यापक आर्थिक प्रभाव का आकलन किया है। रिपोर्ट के अनुसार,अभियान 28 फरवरी को शुरू हुआ था और शुरुआती चरण में लड़ाई काफी तीव्र रही। इसके बाद कुछ समय के लिए संघर्ष की तीव्रता कम हुई,लेकिन जुलाई में सैन्य गतिविधियाँ फिर तेज हुईं। सीबीओ ने बताया कि उसका 38 अरब डॉलर का अनुमान रक्षा विभाग की परिचालन,लॉजिस्टिक और सैन्य संसाधनों से जुड़ी अतिरिक्त लागत को दर्शाता है। इसमें इस्तेमाल किए गए हथियारों को बदलना, युद्ध में नष्ट हुए उपकरणों की भरपाई, अतिरिक्त उड़ान घंटे, सैन्य ईंधन और अन्य परिचालन खर्च शामिल हैं।
सीबीओ के आकलन के अनुसार इस कुल खर्च में सबसे बड़ा हिस्सा उन हथियारों को दोबारा खरीदने पर आएगा, जिनका इस्तेमाल युद्ध के दौरान किया जा चुका है। हथियारों और गोला-बारूद की भरपाई की अनुमानित लागत 21.7 अरब डॉलर है। इसमें करीब 13.1 अरब डॉलर मिसाइल-रोधी इंटरसेप्टरों की भरपाई पर खर्च होने का अनुमान है। इसके अलावा जमीन पर हमला करने वाली क्रूज मिसाइलों को दोबारा हासिल करने पर करीब 7.3 अरब डॉलर और अन्य हथियारों पर लगभग 1.2 अरब डॉलर खर्च होने का अनुमान है। इस तरह इस्तेमाल किए गए हथियारों की भरपाई ही पेंटागन के युद्ध संबंधी खर्च का सबसे बड़ा हिस्सा बनती है।
रिपोर्ट में बताया गया है कि सैन्य उड़ानों में हुई वृद्धि भी अमेरिकी रक्षा बजट पर भारी पड़ रही है। अतिरिक्त उड़ान घंटों से जुड़ी लागत करीब 10.4 अरब डॉलर आंकी गई है। इसके अलावा सैन्य ईंधन की बढ़ी हुई कीमतों पर लगभग 2.7 अरब डॉलर खर्च होने का अनुमान है। युद्ध में क्षतिग्रस्त या नष्ट हुए सैन्य उपकरणों को बदलने पर करीब 1.9 अरब डॉलर और अन्य सैन्य अभियानों पर लगभग 1.5 अरब डॉलर की लागत आंकी गई है। इन सभी मदों को मिलाकर सीबीओ का कुल अनुमान लगभग 38 अरब डॉलर बैठता है।
हालाँकि, इस आँकड़े में युद्ध से जुड़ी सभी संभावित लागतें शामिल नहीं हैं। सीबीओ ने स्पष्ट किया है कि ईरानी हमलों में क्षतिग्रस्त अमेरिकी सैन्य ठिकानों की मरम्मत या पुनर्निर्माण का खर्च इस अनुमान में शामिल नहीं है। इसके अलावा अमेरिकी सरकार के अन्य विभागों पर पड़ने वाले खर्च, कूटनीतिक गतिविधियों, विदेशी सहायता और युद्ध में घायल सैनिकों तथा पूर्व सैनिकों के लंबे समय तक इलाज और संभावित विकलांगता मुआवजे जैसी लागतों का भी पूरा आकलन नहीं किया गया है। सीबीओ ने कहा कि इन अतिरिक्त खर्चों का अनुमान लगाना कठिन है और ये युद्ध की आगे की दिशा पर निर्भर करेंगे।
रिपोर्ट तैयार करने के दौरान सीबीओ को एक और बड़ी चुनौती का सामना करना पड़ा। रक्षा विभाग ने एजेंसी की ओर से माँगी गई जानकारी उपलब्ध नहीं कराई। इसके कारण सीबीओ को सरकारी डेटाबेस और सार्वजनिक रूप से उपलब्ध रिपोर्टों के आधार पर अपने आंकड़े तैयार करने पड़े। एजेंसी ने इस वजह से अपने अनुमान में काफी अनिश्चितता होने की बात कही है। सीबीओ ने यह भी स्पष्ट किया कि अलग-अलग लागतों का आकलन अलग-अलग आँकड़ों,समय-सीमा और तरीकों पर आधारित है, इसलिए उन्हें एक ही व्यापक अनुमान की तरह नहीं जोड़ा जा सकता।
युद्ध की सबसे गंभीर चिंताओं में से एक अमेरिकी मिसाइल-रक्षा भंडार को लेकर सामने आई है। सीबीओ ने कहा कि संघर्ष के दौरान बड़ी संख्या में मिसाइल-रोधी इंटरसेप्टरों का इस्तेमाल हुआ है और इसके कारण अमेरिका के पास आने वाले कई वर्षों तक इन हथियारों का भंडार कम रह सकता है। एजेंसी ने उपलब्ध खरीद और इस्तेमाल के आँकड़ों की तुलना के आधार पर अनुमान लगाया है कि जून 2025 के बाद से अमेरिका ने अपने मिसाइल-रक्षा इंटरसेप्टर भंडार का लगभग आधा से दो-तिहाई हिस्सा इस्तेमाल कर लिया हो सकता है। इस अनुमान में विभिन्न प्रमुख मिसाइल-रोधी प्रणालियों के इंटरसेप्टर शामिल हैं।
सीबीओ ने यह भी चेतावनी दी कि हथियारों का उत्पादन बढ़ाने के बावजूद मौजूदा कमी को पूरी तरह दूर करने में कम से कम पाँच साल लग सकते हैं। इसका मतलब यह है कि युद्ध के दौरान इस्तेमाल किए गए हथियारों की भरपाई केवल अतिरिक्त बजट उपलब्ध कराने से तुरंत नहीं हो सकती। मिसाइल-रोधी इंटरसेप्टरों का निर्माण और उनकी आपूर्ति बढ़ाने के लिए उत्पादन क्षमता, औद्योगिक आधार और लंबी अवधि की खरीद प्रक्रिया की जरूरत होगी। यही कारण है कि सीबीओ ने इसे अमेरिका के लिए एक महत्वपूर्ण सैन्य अवसर लागत के रूप में देखा है।
सीबीओ ने भविष्य के संभावित संघर्षों के संदर्भ में भी इस कमी को महत्वपूर्ण बताया है। एजेंसी के अनुसार,यदि अमेरिका का सामना ऐसे देश से होता है जिसके पास बड़ी संख्या में बैलिस्टिक और क्रूज मिसाइलें हैं, तो कम हुआ इंटरसेप्टर भंडार गंभीर चुनौती पैदा कर सकता है। रिपोर्ट में चीन का विशेष उल्लेख किया गया है। सीबीओ ने कहा कि चीन के पास बड़ी संख्या में बैलिस्टिक और क्रूज मिसाइलें हैं और ताइवान को लेकर किसी संभावित सैन्य संघर्ष में इन हथियारों की महत्वपूर्ण भूमिका हो सकती है।
ईरान युद्ध का प्रभाव अमेरिका की अर्थव्यवस्था पर भी दिखाई देने लगा है। सीबीओ के अनुसार, होर्मुज जलडमरूमध्य से तेल और प्राकृतिक गैस की आपूर्ति में कमी तथा लाल सागर से जुड़े समुद्री मार्गों में व्यवधान के कारण वैश्विक ऊर्जा कीमतों पर दबाव बढ़ा है। कच्चे तेल की कीमतों में वृद्धि का असर केवल पेट्रोलियम उत्पादों तक सीमित नहीं रहता। परिवहन लागत बढ़ने के कारण इसका असर सामान और सेवाओं की कीमतों पर भी पड़ सकता है। इस वजह से अमेरिकी अर्थव्यवस्था में महँगाई का दबाव लंबे समय तक बने रहने की आशंका जताई गई है।
सीबीओ के मुताबिक,2026 की दूसरी तिमाही में ऊर्जा कीमतों में बढ़ोतरी ने व्यक्तिगत उपभोग व्यय से जुड़े मूल्य सूचकांक की वार्षिक महँगाई दर में 2.3 प्रतिशत अंक का योगदान दिया। उस तिमाही में कुल महँगाई दर 5.3 प्रतिशत रही। हालाँकि,सीबीओ का कहना है कि ऊर्जा कीमतों का सीधा प्रभाव समय के साथ कम हो सकता है,लेकिन महँगे ईंधन और परिवहन लागत का असर अन्य वस्तुओं और सेवाओं तक पहुँचने में अधिक समय लग सकता है। इसलिए मूल महँगाई यानी खाद्य और ऊर्जा कीमतों को छोड़कर मापी जाने वाली महँगाई पर प्रभाव बाद में भी बना रह सकता है।
सीबीओ ने 2027 की पहली तिमाही के लिए भी महँगाई का संशोधित अनुमान दिया है। एजेंसी के अनुसार,युद्ध के कारण बढ़ी ऊर्जा कीमतों का असर ऐसा रहेगा कि उस अवधि में व्यक्तिगत उपभोग व्यय मूल्य सूचकांक आधारित साल-दर-साल महँगाई फरवरी 2026 में किए गए अनुमान से 0.5 प्रतिशत अंक अधिक रह सकती है। वहीं मूल महँगाई दर का अनुमान पहले की तुलना में 0.3 प्रतिशत अंक अधिक लगाया गया है। इसका अर्थ है कि संघर्ष का आर्थिक प्रभाव युद्ध क्षेत्र से काफी दूर अमेरिकी उपभोक्ताओं तक भी पहुँच सकता है।
बढ़ती महँगाई का असर अमेरिकी सरकारी बॉन्ड पर भी पड़ने की संभावना है। सीबीओ के अनुसार,महँगाई के बढ़े दबाव से अमेरिकी ट्रेजरी प्रतिभूतियों पर ब्याज दरें पहले के अनुमान की तुलना में अधिक रह सकती हैं। 2026 में तीन महीने की ट्रेजरी प्रतिभूतियों की ब्याज दर करीब 0.2 प्रतिशत अंक अधिक रहने का अनुमान है। हालाँकि,2027 की पहली छमाही तक यह अंतर घटकर 0.1 प्रतिशत अंक से भी कम रह सकता है। इस तरह युद्ध का प्रभाव अमेरिकी सरकारी वित्त और मौद्रिक परिस्थितियों तक भी पहुँच सकता है।
युद्ध जारी रहने पर भविष्य की लागत भी तेजी से बढ़ सकती है। सीबीओ ने अनुमान लगाया है कि यदि संघर्ष मई और जून जैसी अपेक्षाकृत कम तीव्रता पर जारी रहता है,तो हर अतिरिक्त महीने की लागत करीब 2 अरब डॉलर हो सकती है। वहीं जुलाई जैसी अधिक तीव्र सैन्य गतिविधि होने पर यह खर्च लगभग 3 अरब डॉलर प्रति माह तक पहुँच सकता है। एजेंसी ने यह भी कहा है कि यदि संघर्ष की तीव्रता इससे और बढ़ती है,तो मासिक लागत 3 अरब डॉलर से भी अधिक हो सकती है।
अमेरिकी प्रशासन की ओर से भी संघर्ष के लिए अतिरिक्त धन की माँग की गई है। जून में प्रशासन ने कांग्रेस से 87.6 अरब डॉलर की अतिरिक्त राशि की माँग की थी,जिसमें 67.1 अरब डॉलर रक्षा विभाग के लिए निर्धारित थे। सीबीओ के विश्लेषण के अनुसार,इस माँग में से करीब 42.3 अरब डॉलर ऐसे खर्चों से सीधे जुड़े दिखाई देते हैं,जो ईरान के खिलाफ चल रहे संघर्ष से संबंधित हैं। यह राशि सीबीओ द्वारा 1 अगस्त तक अनुमानित 38 अरब डॉलर की लागत से लगभग 10 प्रतिशत अधिक है।
इससे पहले रक्षा मंत्री पीट हेगसेथ ने जुलाई में कांग्रेस को बताया था कि सितंबर तक ईरान के खिलाफ अमेरिकी अभियानों की लागत करीब 37.5 अरब डॉलर पहुँच सकती है। अब सीबीओ के नए अनुमान ने युद्ध की वास्तविक लागत और भविष्य में बढ़ने वाले खर्च को लेकर एक विस्तृत तस्वीर पेश की है। साथ ही सीबीओ की रिपोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया है कि युद्ध का मूल्यांकन केवल सैन्य बजट में खर्च की गई रकम से नहीं किया जा सकता। हथियारों के भंडार में कमी,उन्हें दोबारा तैयार करने में लगने वाला समय, ऊर्जा कीमतों में वृद्धि और महँगाई जैसे प्रभाव लंबे समय तक बने रह सकते हैं।
कुल मिलाकर,ईरान के खिलाफ अमेरिकी सैन्य अभियान अब तक अमेरिका के लिए करीब 38 अरब डॉलर की प्रत्यक्ष रक्षा लागत पैदा कर चुका है और संघर्ष जारी रहने पर हर महीने अरबों डॉलर का अतिरिक्त बोझ बढ़ सकता है। सबसे बड़ी चिंता महँगे मिसाइल-रोधी हथियारों के तेजी से इस्तेमाल और उनके भंडार को दोबारा भरने में लगने वाला लंबा समय है। दूसरी ओर,होर्मुज जलडमरूमध्य और लाल सागर से जुड़े व्यवधानों ने ऊर्जा बाजार को प्रभावित किया है,जिसका असर अमेरिकी महँगाई और ब्याज दरों पर पड़ रहा है। सीबीओ ने यह भी स्पष्ट किया है कि उसके अनुमान में काफी अनिश्चितता है, क्योंकि रक्षा विभाग ने माँगी गई पूरी जानकारी उपलब्ध नहीं कराई। ऐसे में संघर्ष जितना लंबा चलेगा,उसकी वास्तविक वित्तीय और आर्थिक कीमत का दायरा उतना ही बढ़ सकता है।
