मार्को रुबियो बोले- भारत और अमेरिका तय करेंगे 21वीं सदी का भविष्य (तस्वीर क्रेडिट@AIRNewsHindi)

मार्को रुबियो बोले- भारत और अमेरिका तय करेंगे 21वीं सदी का भविष्य, हिंद-प्रशांत क्षेत्र की सुरक्षा पर दोनों देशों में सहमति

मुंबई,21 अक्टूबर (युआईटीवी)- अमेरिका के विदेश मंत्री मार्को रुबियो ने भारत और अमेरिका के बीच बढ़ते रणनीतिक संबंधों को 21वीं सदी के भविष्य के लिए महत्वपूर्ण बताया है। उन्होंने कहा कि इस सदी का इतिहास इसी क्षेत्र में लिखा जा रहा है और भारत-अमेरिका की साझेदारी यह तय करने में अहम भूमिका निभाएगी कि आने वाले वर्षों में दुनिया किस दिशा में आगे बढ़ेगी। रुबियो ने भारत को दुनिया का सबसे अधिक आबादी वाला देश और अमेरिका का एक मजबूत भू-राजनीतिक साझेदार बताते हुए दोनों देशों के बीच सहयोग को और गहरा करने पर जोर दिया। मुंबई में अमेरिका की स्वतंत्रता की 250वीं वर्षगांठ के उपलक्ष्य में आयोजित ‘फ्रीडम 250’ कार्यक्रम में उन्होंने कहा कि भारत और अमेरिका के बीच राष्ट्रीय हितों से जुड़े कई महत्वपूर्ण मुद्दों पर असाधारण तालमेल है। इनमें उन्नत तकनीकों का जिम्मेदारी से इस्तेमाल, मुक्त व्यापार और हिंद-प्रशांत क्षेत्र में सुरक्षा बनाए रखना प्रमुख हैं।

मुंबई में आयोजित कार्यक्रम को संबोधित करते हुए रुबियो ने कहा कि यदि कोई व्यक्ति 21वीं सदी के इतिहास और उसकी दिशा को समझना चाहता है,तो उसे इस क्षेत्र में हो रहे घटनाक्रम पर ध्यान देना होगा। उनके अनुसार, आने वाले समय में जब कोई इतिहासकार 21वीं सदी पर पुस्तक लिखेगा,तो उसमें दुनिया के अलग-अलग क्षेत्रों का उल्लेख होगा, लेकिन इस सदी का स्वरूप काफी हद तक इसी क्षेत्र में होने वाली घटनाओं से तय होगा।

उन्होंने कहा कि यह प्रक्रिया भविष्य में नहीं,बल्कि अभी हो रही है और इसके प्रभावों को महसूस किया जा सकता है। रुबियो के मुताबिक,भारत और अमेरिका के बीच संबंध सकारात्मक दिशा में विकसित होते हैं,तो इसका असर पूरी सदी के भविष्य पर पड़ सकता है।

उनके इस बयान को दोनों देशों के बीच रणनीतिक साझेदारी को मजबूत करने की अमेरिकी प्रतिबद्धता के रूप में देखा जा रहा है। भारत की बढ़ती आर्थिक और कूटनीतिक भूमिका तथा हिंद-प्रशांत क्षेत्र में उसकी अहमियत को देखते हुए अमेरिका के लिए नई दिल्ली के साथ सहयोग महत्वपूर्ण है। वहीं,भारत के लिए भी तकनीक,व्यापार,सुरक्षा और वैश्विक चुनौतियों से निपटने के क्षेत्र में अमेरिका के साथ साझेदारी के व्यापक अवसर हैं।

अमेरिकी विदेश मंत्री ने भारत और अमेरिका के बीच तकनीकी सहयोग का उल्लेख करते हुए कहा कि दोनों देश इस बात से सहमत हैं कि सुपरइंटेलिजेंस और क्वांटम कंप्यूटिंग जैसी उन्नत तकनीकों का इस्तेमाल मानवता के कल्याण के लिए किया जाना चाहिए। साथ ही,इन तकनीकों से पैदा होने वाले संभावित नुकसान को कम करने की दिशा में भी काम करना जरूरी है।

सुपरइंटेलिजेंस को कृत्रिम बुद्धिमत्ता के ऐसे संभावित उन्नत स्तर के रूप में देखा जाता है, जो कई क्षेत्रों में मानवीय क्षमताओं से आगे निकल सकता है। वहीं,क्वांटम कंप्यूटिंग कंप्यूटर विज्ञान की एक उभरती हुई तकनीक है,जिसमें कुछ जटिल समस्याओं को हल करने की नई संभावनाएँ मौजूद हैं। इन तकनीकों का प्रभाव भविष्य में स्वास्थ्य, वैज्ञानिक अनुसंधान,उद्योग,राष्ट्रीय सुरक्षा और अर्थव्यवस्था जैसे क्षेत्रों पर पड़ सकता है।

रुबियो के बयान से स्पष्ट है कि अमेरिका और भारत तकनीकी प्रगति के साथ उससे जुड़े जोखिमों को भी महत्वपूर्ण मानते हैं। नई तकनीकों का सुरक्षित और जिम्मेदार इस्तेमाल सुनिश्चित करना दोनों देशों के लिए सहयोग का एक अहम क्षेत्र बन सकता है। हालाँकि, इन क्षेत्रों में वास्तविक प्रगति के लिए अनुसंधान,निवेश,विशेषज्ञता के आदान-प्रदान और प्रभावी नियमों की जरूरत होगी।

रुबियो ने अपने संबोधन में हिंद-प्रशांत क्षेत्र की सुरक्षा को भी भारत-अमेरिका संबंधों का प्रमुख आधार बताया। उन्होंने कहा कि दोनों देश ऐसे मुक्त और सुरक्षित हिंद-प्रशांत क्षेत्र के पक्ष में हैं,जहाँ कोई भी देश अंतर्राष्ट्रीय समुद्री मार्गों पर अपना प्रभुत्व स्थापित करने या उन पर अपने अधिकार का दावा करने की स्थिति में न हो।

उन्होंने जोर देकर कहा कि मुक्त व्यापार के लिए समुद्री मार्गों का खुला और सुरक्षित रहना बेहद जरूरी है। भारत और अमेरिका जैसे बड़े देशों की अर्थव्यवस्थाएँ अंतर्राष्ट्रीय व्यापार, समुद्री परिवहन और आपूर्ति श्रृंखलाओं से जुड़ी हैं। ऐसे में समुद्री मार्गों पर किसी एक देश का अनुचित नियंत्रण वैश्विक व्यापार और आर्थिक गतिविधियों को प्रभावित कर सकता है।

अमेरिकी विदेश मंत्री के अनुसार, इस मुद्दे पर भारत और अमेरिका की सोच पूरी तरह एक जैसी है। दोनों देश चाहते हैं कि हिंद-प्रशांत क्षेत्र में अंतर्राष्ट्रीय नियमों का सम्मान हो और समुद्री मार्गों का इस्तेमाल बिना किसी अनुचित दबाव के किया जा सके।

हिंद-प्रशांत क्षेत्र रणनीतिक दृष्टि से बेहद महत्वपूर्ण है। यहाँ समुद्री व्यापार,ऊर्जा आपूर्ति और वैश्विक आर्थिक गतिविधियों का बड़ा हिस्सा संचालित होता है। इसलिए इस क्षेत्र में शांति और स्थिरता बनाए रखना भारत और अमेरिका सहित कई देशों के हित में है। रुबियो का बयान इस बात को रेखांकित करता है कि समुद्री सुरक्षा और आर्थिक सहयोग दोनों देशों की साझेदारी में महत्वपूर्ण स्थान रखते हैं।

भारत और अमेरिका के संबंधों का उल्लेख करते हुए रुबियो ने यह भी स्वीकार किया कि दुनिया के किन्हीं दो देशों के बीच हर मुद्दे पर पूरी तरह सहमति होना संभव नहीं है। उन्होंने कहा कि दोनों देशों के बीच कुछ विषयों पर असहमति हो सकती है,लेकिन राष्ट्रीय हितों से जुड़े प्रमुख मुद्दों पर उनके बीच असाधारण तालमेल है।

रुबियो के अनुसार,दो बड़े देशों के बीच इस तरह का तालमेल महत्वपूर्ण है,क्योंकि उनके फैसलों का असर केवल द्विपक्षीय संबंधों तक सीमित नहीं रहता,बल्कि क्षेत्रीय और वैश्विक परिस्थितियों को भी प्रभावित कर सकता है।

भारत और अमेरिका के बीच व्यापार, रक्षा, ऊर्जा, प्रौद्योगिकी और रणनीतिक सुरक्षा जैसे कई क्षेत्रों में सहयोग की संभावनाएँ हैं। हालाँकि,दोनों देशों की प्राथमिकताएँ और नीतियाँ हर विषय पर एक जैसी हों,यह जरूरी नहीं है। रुबियो की टिप्पणी इस बात को स्वीकार करती है कि मतभेदों के बावजूद साझा हितों पर मिलकर काम करना द्विपक्षीय संबंधों को आगे बढ़ाने का महत्वपूर्ण आधार है।

अपने संबोधन के दौरान रुबियो ने भारत के साथ लगातार संपर्क बनाए रखने की इच्छा भी जताई। उन्होंने कहा कि वह तीन महीने बाद फिर मुलाकात करेंगे और अब हर तीन महीने में भारत आएँगे। उनके इस बयान से भारत के साथ नियमित संवाद और उच्चस्तरीय संपर्क को महत्व देने का संकेत मिलता है।

नियमित यात्राओं और बैठकों के माध्यम से दोनों देशों को आपसी प्राथमिकताओं पर चर्चा करने,सहयोग के नए अवसर तलाशने और लंबित मुद्दों पर बातचीत आगे बढ़ाने का अवसर मिल सकता है। हालाँकि,उनकी टिप्पणी को भविष्य की यात्राओं की निश्चित समय-सारणी के बजाय भारत के साथ लगातार जुड़ाव बनाए रखने की मंशा के रूप में देखना उचित होगा।

कुल मिलाकर,मुंबई में रुबियो का संबोधन भारत-अमेरिका संबंधों के रणनीतिक महत्व पर केंद्रित रहा। उन्होंने तकनीकी सहयोग,मुक्त व्यापार और हिंद-प्रशांत क्षेत्र की सुरक्षा को दोनों देशों के साझा हितों के प्रमुख आधार के रूप में पेश किया। उनका मानना है कि भारत और अमेरिका के बीच मजबूत साझेदारी आने वाले दशकों में वैश्विक घटनाक्रम की दिशा तय करने में अहम भूमिका निभा सकती है।