अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप

क्या डोनाल्ड ट्रंप को राष्ट्रपति पद से हटा सकती है डेमोक्रेटिक पार्टी? जानिए महाभियोग की पूरी संवैधानिक प्रक्रिया और 67 वोटों का गणित

वाशिंगटन,5 नवंबर (युआईटीवी)- अमेरिका की राजनीति में राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के भविष्य को लेकर एक बार फिर बहस तेज हो गई है। संसद के दोनों सदनों में डेमोक्रेटिक पार्टी की बढ़ती ताकत ने इस चर्चा को हवा दी है कि क्या विपक्ष अब ट्रंप के खिलाफ महाभियोग यानी इम्पीचमेंट की कार्रवाई शुरू कर सकता है? क्या प्रतिनिधि सभा में बहुमत हासिल कर लेने से राष्ट्रपति को पद से हटाया जा सकता है या इसके लिए संसद के दूसरे सदन की भी मंजूरी जरूरी होती है? इन सवालों के बीच अमेरिकी संविधान में राष्ट्रपति को हटाने की प्रक्रिया एक बार फिर चर्चा के केंद्र में आ गई है।

दरअसल,अमेरिका में राष्ट्रपति को पद से हटाने के लिए एक विशेष संवैधानिक व्यवस्था बनाई गई है, जिसे महाभियोग कहा जाता है। हालाँकि,महाभियोग की प्रक्रिया शुरू होना और राष्ट्रपति का पद से हट जाना दो अलग-अलग घटनाएँ हैं। केवल महाभियोग प्रस्ताव पारित होने से राष्ट्रपति की कुर्सी नहीं जाती। इसके लिए अमेरिकी कांग्रेस के दोनों सदनों में अलग-अलग संवैधानिक प्रक्रियाओं का पालन करना पड़ता है। सबसे महत्वपूर्ण भूमिका सीनेट की होती है,जहाँ राष्ट्रपति को दोषी ठहराने के लिए दो-तिहाई बहुमत की जरूरत होती है।

ऐसे में डेमोक्रेटिक पार्टी के पास प्रतिनिधि सभा में बहुमत होने पर ट्रंप के खिलाफ महाभियोग की कार्रवाई आगे बढ़ाने का रास्ता जरूर खुल सकता है, लेकिन उन्हें वास्तव में राष्ट्रपति पद से हटाना कहीं अधिक मुश्किल होगा। इसके लिए विपक्ष को अपनी पार्टी के सांसदों के अलावा रिपब्लिकन पार्टी के कई सदस्यों का समर्थन भी हासिल करना पड़ेगा।

अमेरिका में राष्ट्रपति को हटाने की प्रक्रिया समझने से पहले वहाँ की राजनीतिक व्यवस्था को समझना जरूरी है। भारत और अमेरिका में सरकार के गठन का तरीका एक-दूसरे से काफी अलग है। भारत में जनता लोकसभा के सांसदों का चुनाव करती है। इसके बाद लोकसभा में बहुमत हासिल करने वाली पार्टी या गठबंधन अपना नेता चुनता है और वही प्रधानमंत्री बनता है। प्रधानमंत्री को अपनी सरकार चलाने के लिए लोकसभा में बहुमत का समर्थन बनाए रखना पड़ता है। यदि सरकार बहुमत खो देती है,तो उसे पद छोड़ना पड़ सकता है।

इसके विपरीत अमेरिका में राष्ट्रपति और संसद के चुनाव अलग-अलग होते हैं। वहाँ राष्ट्रपति का चुनाव हर चार साल में होता है,जबकि कांग्रेस के सदस्यों का चुनाव अलग-अलग समय पर कराया जाता है। अमेरिकी संसद को कांग्रेस कहा जाता है और इसके दो सदन हैं। पहला सदन हाउस ऑफ रिप्रेजेंटेटिव्स यानी प्रतिनिधि सभा है,जिसे निचला सदन कहा जाता है। इसमें कुल 435 सदस्य होते हैं। प्रतिनिधि सभा के सदस्यों का कार्यकाल दो साल का होता है।

दूसरा सदन सीनेट है,जिसमें कुल 100 सदस्य होते हैं। प्रत्येक अमेरिकी राज्य से दो सीनेटर चुने जाते हैं और उनका कार्यकाल छह साल का होता है। सीनेट के सभी सदस्यों का चुनाव एक साथ नहीं होता,बल्कि हर दो साल में लगभग एक-तिहाई सीटों पर चुनाव कराया जाता है।

अमेरिका में राष्ट्रपति का चुनाव चार साल के अंतराल पर होता है। इसलिए यह जरूरी नहीं है कि राष्ट्रपति जिस पार्टी से आते हैं,उसी पार्टी का कांग्रेस के दोनों सदनों में भी बहुमत हो। कई बार राष्ट्रपति एक पार्टी का होता है,जबकि प्रतिनिधि सभा या सीनेट पर दूसरी पार्टी का नियंत्रण रहता है। ऐसी स्थिति में राष्ट्रपति को अपनी नीतियाँ लागू कराने के लिए विपक्षी सांसदों का समर्थन जुटाना पड़ सकता है। यही व्यवस्था राष्ट्रपति और कांग्रेस के बीच नियंत्रण एवं संतुलन बनाए रखने का काम करती है।

अमेरिकी संविधान राष्ट्रपति को असीमित अधिकार नहीं देता। यदि राष्ट्रपति अपने पद का गंभीर दुरुपयोग करते हैं या संविधान में निर्धारित गंभीर आरोपों के दायरे में आने वाला आचरण करते हैं,तो उनके खिलाफ महाभियोग की कार्रवाई की जा सकती है। अमेरिकी संविधान में इसके लिए देशद्रोह,रिश्वतखोरी और अन्य गंभीर अपराधों या कदाचार का उल्लेख किया गया है। इसे अंग्रेजी में ‘ट्रेजन, ब्राइबरी, ऑर अदर हाई क्राइम्स एंड मिस्डीमीनर्स’ कहा जाता है।

इस प्रावधान का दायरा केवल उन अपराधों तक सीमित नहीं है,जिनके लिए सामान्य आपराधिक कानून के तहत किसी व्यक्ति को सजा दी जा सकती है। राष्ट्रपति की ओर से सत्ता का गंभीर दुरुपयोग,संवैधानिक जिम्मेदारियों की अनदेखी और सार्वजनिक पद की गरिमा के खिलाफ काम करना भी महाभियोग की कार्रवाई का आधार बन सकता है। हालाँकि,किसी आचरण को महाभियोग योग्य अपराध माना जाएगा या नहीं, इसका फैसला कांग्रेस की संवैधानिक प्रक्रिया के तहत किया जाता है।

इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि राष्ट्रपति होने के बावजूद कोई व्यक्ति कानून और संविधान से ऊपर न हो। अमेरिकी व्यवस्था में राष्ट्रपति को भी अपने पद और अधिकारों के इस्तेमाल के लिए जवाबदेह बनाया जा सकता है।

अमेरिका में राष्ट्रपति के खिलाफ महाभियोग की प्रक्रिया शुरू करने का अधिकार प्रतिनिधि सभा के पास है। इसे प्रक्रिया का पहला चरण माना जाता है। सबसे पहले राष्ट्रपति के खिलाफ लगाए गए आरोपों की जाँच की जाती है। इस दौरान संबंधित दस्तावेजों, सबूतों और गवाहों के आधार पर आरोपों की गंभीरता का आकलन किया जा सकता है। प्रतिनिधि सभा की संबंधित समितियाँ जाँच और सुनवाई के जरिए यह तय करने में भूमिका निभाती हैं कि क्या राष्ट्रपति के खिलाफ महाभियोग के प्रस्ताव को आगे बढ़ाया जाना चाहिए।

यदि प्रतिनिधि सभा में बहुमत से महाभियोग के आरोपों को मंजूरी मिल जाती है,तो राष्ट्रपति को इम्पीच्ड यानी महाभियोग लगाया गया व्यक्ति माना जाता है। इसका अर्थ यह नहीं है कि उन्हें तत्काल राष्ट्रपति पद से हटा दिया गया है। इसका मतलब केवल इतना है कि उनके खिलाफ औपचारिक रूप से आरोप तय हो गए हैं और अब मामला सीनेट में सुनवाई के लिए जाएगा।

प्रतिनिधि सभा में कुल 435 सदस्य होते हैं। यदि सभी सीटें भरी हों और सभी सदस्य मतदान में हिस्सा लें,तो साधारण बहुमत के लिए 218 वोट पर्याप्त होते हैं। ऐसे में यदि डेमोक्रेटिक पार्टी के पास सदन में स्पष्ट बहुमत है,तो वह ट्रंप के खिलाफ महाभियोग प्रस्ताव पारित कराने की स्थिति में हो सकती है। हालाँकि,इसके लिए पार्टी के सभी या पर्याप्त सांसदों का समर्थन जरूरी होगा।

यही वजह है कि प्रतिनिधि सभा में विपक्ष का बहुमत ट्रंप के लिए राजनीतिक चुनौती बन सकता है। डेमोक्रेटिक सांसद प्रशासन के फैसलों की जाँच करा सकते हैं और महाभियोग की प्रक्रिया शुरू करने की दिशा में कदम उठा सकते हैं,लेकिन राष्ट्रपति को पद से हटाने के लिए उन्हें अभी एक और बड़ी संवैधानिक बाधा पार करनी होगी।

प्रतिनिधि सभा में महाभियोग प्रस्ताव पारित होने के बाद मामला सीनेट में पहुँचता है। यहाँ राष्ट्रपति के खिलाफ मुकदमे की तरह सुनवाई होती है। इस दौरान आरोपों,सबूतों और दोनों पक्षों की दलीलों पर विचार किया जाता है। राष्ट्रपति के महाभियोग ट्रायल की अध्यक्षता अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश करते हैं। हालाँकि,राष्ट्रपति को दोषी ठहराने या आरोपों से मुक्त करने का फैसला सीनेटर ही करते हैं।

राष्ट्रपति को दोषी ठहराकर पद से हटाने के लिए सीनेट में उपस्थित और मतदान करने वाले सदस्यों के दो-तिहाई समर्थन की आवश्यकता होती है। यदि सभी 100 सीनेटर मतदान करते हैं,तो कम-से-कम 67 वोट राष्ट्रपति के खिलाफ पड़ने चाहिए। यही वह सबसे बड़ी राजनीतिक और संवैधानिक चुनौती है,जिसे पार करना डेमोक्रेटिक पार्टी के लिए आसान नहीं होगा।

उदाहरण के तौर पर, यदि डेमोक्रेटिक पार्टी के पास सीनेट में 54 सदस्य हैं और सभी राष्ट्रपति को दोषी ठहराने के पक्ष में मतदान करते हैं,तो उसे 67 के आँकड़े तक पहुँचने के लिए कम से कम 13 रिपब्लिकन सीनेटरों का समर्थन चाहिए होगा। यानी केवल अपनी पार्टी के सांसदों के भरोसे राष्ट्रपति को पद से हटाना संभव नहीं होगा।

सीनेट में दो-तिहाई बहुमत की यह शर्त अमेरिकी संविधान में इसलिए रखी गई है, ताकि किसी राष्ट्रपति को केवल राजनीतिक विरोध या सामान्य बहुमत के आधार पर पद से न हटाया जा सके। राष्ट्रपति को हटाने के लिए व्यापक राजनीतिक सहमति और गंभीर आरोपों के समर्थन में पर्याप्त वोट जरूरी हैं।

अमेरिकी इतिहास में राष्ट्रपति के खिलाफ महाभियोग की कार्रवाई पहले भी कई बार हो चुकी है। अब तक तीन राष्ट्रपतियों के खिलाफ चार बार महाभियोग चलाया गया है। हालाँकि,इनमें से किसी भी मामले में सीनेट राष्ट्रपति को पद से हटाने के लिए जरूरी दो-तिहाई बहुमत हासिल नहीं कर सकी।

पहला मामला वर्ष 1868 में राष्ट्रपति एंड्रयू जॉनसन के खिलाफ सामने आया था। उनके और कांग्रेस के बीच राजनीतिक टकराव काफी बढ़ गया था। प्रतिनिधि सभा ने उनके खिलाफ महाभियोग के आरोप पारित किए,लेकिन सीनेट में उन्हें दोषी ठहराने के लिए जरूरी समर्थन नहीं मिल सका। इस तरह वह राष्ट्रपति पद पर बने रहे।

इसके बाद वर्ष 1998 में राष्ट्रपति बिल क्लिंटन के खिलाफ महाभियोग की कार्रवाई हुई। उन पर शपथ के तहत गलत बयान देने और न्याय प्रक्रिया में बाधा डालने से जुड़े आरोप लगाए गए थे। प्रतिनिधि सभा में महाभियोग प्रस्ताव पारित हुआ,लेकिन सीनेट में पर्याप्त समर्थन नहीं मिलने के कारण उन्हें दोषी नहीं ठहराया जा सका। परिणामस्वरूप क्लिंटन ने अपना कार्यकाल पूरा किया।

डोनाल्ड ट्रंप अमेरिकी इतिहास के पहले ऐसे राष्ट्रपति बने,जिनके खिलाफ दो बार महाभियोग की कार्रवाई हुई। पहली बार वर्ष 2019 में प्रतिनिधि सभा ने उनके खिलाफ महाभियोग प्रस्ताव पारित किया था। यह मामला यूक्रेन से जुड़े विवाद और राष्ट्रपति की ओर से अपने पद का इस्तेमाल किए जाने के आरोपों से संबंधित था। हालाँकि,सीनेट में उन्हें दोषी ठहराने के लिए आवश्यक दो-तिहाई समर्थन नहीं मिला।

दूसरी बार जनवरी 2021 में अमेरिकी संसद भवन कैपिटल पर हुए हमले के बाद ट्रंप के खिलाफ महाभियोग चलाया गया। प्रतिनिधि सभा ने उन पर विद्रोह के लिए उकसाने का आरोप लगाया था। इस बार भी सीनेट में उन्हें दोषी ठहराने के लिए जरूरी वोट नहीं मिल सके। हालाँकि,इस मामले की एक खास बात यह थी कि जब सीनेट में सुनवाई हुई,तब तक ट्रंप राष्ट्रपति पद छोड़ चुके थे। इसके बावजूद उनके खिलाफ महाभियोग का ट्रायल चलाया गया।

अमेरिकी इतिहास में राष्ट्रपति को पद से हटाने की प्रक्रिया के संदर्भ में रिचर्ड निक्सन का मामला भी बेहद चर्चित है। वर्ष 1974 में वॉटरगेट कांड के कारण निक्सन की मुश्किलें बढ़ गई थीं। उनके खिलाफ राष्ट्रपति पद के दुरुपयोग और जाँच में बाधा डालने जैसे गंभीर आरोप सामने आए थे। प्रतिनिधि सभा में उनके खिलाफ महाभियोग की प्रक्रिया आगे बढ़ रही थी और उनके पद पर बने रहने को लेकर सवाल उठने लगे थे।

हालाँकि,महाभियोग की प्रक्रिया पूरी होने और सीनेट में मुकदमा चलने से पहले ही निक्सन ने राष्ट्रपति पद से इस्तीफा दे दिया। इस तरह वह अमेरिकी इतिहास के पहले राष्ट्रपति बने, जिन्होंने महाभियोग की संभावित कार्रवाई के बीच पद छोड़ा। उनका मामला यह भी दिखाता है कि राष्ट्रपति पर बढ़ता राजनीतिक दबाव कई बार औपचारिक संवैधानिक प्रक्रिया पूरी होने से पहले ही बड़े फैसले की वजह बन सकता है।

ट्रंप के खिलाफ महाभियोग की संभावनाओं के बीच अमेरिकी राजनीतिक व्यवस्था की एक और खास बात समझना जरूरी है। अमेरिका में भारत की तरह सख्त दल-बदल विरोधी कानून लागू नहीं है। भारत में पार्टी व्हिप के खिलाफ मतदान करने पर सांसद की सदस्यता समाप्त होने का खतरा रहता है,लेकिन अमेरिका में सांसद अपनी पार्टी की आधिकारिक राय से अलग जाकर भी मतदान कर सकते हैं।

अमेरिकी सांसदों पर पार्टी नेतृत्व राजनीतिक दबाव बना सकता है। उन्हें संसदीय समितियों की जिम्मेदारियों से हटाया जा सकता है या अगले चुनाव में पार्टी का टिकट देने से इनकार किया जा सकता है। इसके बावजूद केवल पार्टी लाइन के खिलाफ मतदान करने से उनकी संसद सदस्यता अपने आप समाप्त नहीं होती।

ट्रंप के दूसरे महाभियोग ट्रायल में भी यह स्थिति देखने को मिली थी। उस दौरान सात रिपब्लिकन सीनेटरों ने अपनी ही पार्टी के राष्ट्रपति के खिलाफ मतदान किया था। इससे स्पष्ट हुआ कि अमेरिकी व्यवस्था में सांसदों के पास पार्टी नेतृत्व से अलग राय रखने और उसके अनुसार वोट देने की स्वतंत्रता है।

डोनाल्ड ट्रंप के राजनीतिक भविष्य को लेकर चर्चा में एक और संवैधानिक तथ्य महत्वपूर्ण है। वह अमेरिका में दो बार राष्ट्रपति चुने जा चुके हैं। अमेरिकी संविधान के 22वें संशोधन के अनुसार कोई भी व्यक्ति दो बार से अधिक राष्ट्रपति पद पर निर्वाचित नहीं हो सकता। इस लिहाज से ट्रंप का मौजूदा कार्यकाल उनका अंतिम कार्यकाल है।

ऐसी स्थिति में यदि रिपब्लिकन सांसदों को लगता है कि ट्रंप का समर्थन करना उनके राजनीतिक भविष्य के लिए नुकसानदायक हो सकता है,तो वे उनके खिलाफ मतदान करने का फैसला ले सकते हैं। अमेरिकी सांसदों पर पार्टी के प्रति पूरी तरह एकजुट रहने की कोई कानूनी बाध्यता नहीं है। हालाँकि,राजनीतिक गणित और पार्टी के भीतर समर्थन का सवाल अलग है।

इसके बावजूद सीनेट में दो-तिहाई बहुमत जुटाना डेमोक्रेटिक पार्टी के लिए बड़ी चुनौती रहेगा। उसे अपने सभी समर्थक सदस्यों के साथ-साथ रिपब्लिकन पार्टी के पर्याप्त सीनेटरों को भी अपने पक्ष में लाना होगा। जब तक 67 वोटों का आँकड़ा हासिल नहीं होता,तब तक राष्ट्रपति को दोषी ठहराकर पद से हटाने का फैसला नहीं हो सकता।

कुल मिलाकर,अमेरिकी प्रतिनिधि सभा में डेमोक्रेटिक पार्टी का बहुमत डोनाल्ड ट्रंप के खिलाफ महाभियोग की प्रक्रिया शुरू करने का रास्ता खोल सकता है। इससे राष्ट्रपति प्रशासन पर राजनीतिक दबाव बढ़ेगा और उसके फैसलों की संसदीय जाँच भी तेज हो सकती है। लेकिन महाभियोग प्रस्ताव पारित होना राष्ट्रपति की विदाई की गारंटी नहीं है। वास्तविक रूप से पद से हटाने के लिए सीनेट में दो-तिहाई समर्थन हासिल करना अनिवार्य है। इसलिए ट्रंप के खिलाफ महाभियोग की तलवार लटक सकती है,लेकिन केवल विपक्ष के बहुमत के आधार पर उनकी राष्ट्रपति पद से विदाई तय नहीं की जा सकती।