नई दिल्ली,5 नवंबर (युआईटीवी)- अमेरिका में मध्यावधि चुनावों के नतीजों के बाद वहाँ की राजनीति में हुए बदलाव का असर भारत-अमेरिका व्यापार संबंधों पर भी पड़ सकता है। कांग्रेस पर रिपब्लिकन पार्टी का एकतरफा नियंत्रण खत्म होने से भारत के लिए प्रस्तावित व्यापार समझौते को लेकर तत्काल दबाव कम होने की संभावना जताई जा रही है। आर्थिक विश्लेषकों का मानना है कि इस राजनीतिक घटनाक्रम से भारतीय निर्यातकों और अर्थव्यवस्था को कुछ राहत मिल सकती है। खास तौर पर अमेरिकी टैरिफ में अचानक बढ़ोतरी और व्यापार नीतियों को लेकर बनी अनिश्चितता का जोखिम पहले की तुलना में कम हो सकता है।
एमके ग्लोबल फाइनेंशियल सर्विसेज की ओर से गुरुवार को जारी रिपोर्ट में कहा गया है कि अमेरिकी चुनावों के बाद भारत के सामने व्यापार के मोर्चे पर तत्काल चुनौतियाँ कुछ कम हुई हैं। रिपोर्ट के मुताबिक,भारत के उत्पादों पर 18 प्रतिशत की प्रस्तावित अमेरिकी टैरिफ दर कभी लागू नहीं हुई। फिलहाल भारतीय वस्तुओं पर अपेक्षाकृत कम 10 प्रतिशत का सेक्शन 301 शुल्क लागू है। इसके अलावा,अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के प्रशासन के पास अब इंटरनेशनल इमरजेंसी इकोनॉमिक पावर्स एक्ट यानी आईईईपीए के तहत उपलब्ध कुछ प्रभावी दबाव बनाने वाले विकल्पों का इस्तेमाल करने की गुंजाइश भी सीमित हो सकती है।
विश्लेषकों के अनुसार, अमेरिकी कांग्रेस में सत्ता का संतुलन बदलने का मतलब यह नहीं है कि वहाँ की व्यापार नीति में तत्काल कोई बड़ा बदलाव हो जाएगा। हालाँकि,इससे राष्ट्रपति की नीतिगत प्राथमिकताओं और फैसले लेने की प्रक्रिया पर असर पड़ सकता है। अब व्यापारिक विवादों को बढ़ाने के लिए प्रशासन को पहले की तुलना में अधिक प्रक्रियागत और कानूनी बाधाओं का सामना करना पड़ सकता है। इसका फायदा भारत जैसे व्यापारिक साझेदारों को मिल सकता है,क्योंकि अचानक शुल्क बढ़ाने या नए प्रतिबंध लगाने की आशंका कम हो सकती है।
रिपोर्ट में कहा गया है कि मध्यावधि चुनाव के परिणाम अमेरिकी राष्ट्रपति की प्राथमिकताओं को प्रभावित कर सकते हैं। कांग्रेस में रिपब्लिकन पार्टी का एकीकृत नियंत्रण समाप्त होने के बाद प्रशासन के लिए कुछ फैसलों को आगे बढ़ाना पहले जितना आसान नहीं रह सकता। ऐसे में व्यापार के मोर्चे पर टकराव बढ़ाने के बजाय घरेलू अर्थव्यवस्था और उपभोक्ताओं से जुड़े मुद्दों को प्राथमिकता मिलने की संभावना है।
अमेरिका में वस्तुओं की कीमतें और महँगाई मतदाताओं के लिए महत्वपूर्ण मुद्दे बने हुए हैं। इसलिए प्रशासन पर यह दबाव बढ़ सकता है कि वह ऐसे कदम उठाने से बचे, जिनसे आयातित वस्तुएँ महँगी हों और आम उपभोक्ताओं पर अतिरिक्त आर्थिक बोझ पड़े। इसके साथ ही वर्ष 2028 में होने वाले राष्ट्रपति चुनाव से पहले कुछ प्रमुख व्यापारिक समझौतों को अंतिम रूप देने की कोशिश भी तेज हो सकती है। यदि ऐसा होता है तो भारत और अमेरिका के बीच व्यापारिक बातचीत को आगे बढ़ाने के लिए अधिक अनुकूल माहौल बन सकता है।
हालाँकि,इसका अर्थ यह नहीं है कि अमेरिका की ओर से टैरिफ लगाने की शक्ति पूरी तरह समाप्त हो गई है। रिपोर्ट के मुताबिक,व्यापार नीति उन क्षेत्रों में शामिल है, जहाँ अमेरिकी राष्ट्रपति के पास अब भी पर्याप्त अधिकार मौजूद हैं। इसलिए भारत को अमेरिकी व्यापार नीतियों से जुड़ी घोषणाओं और संभावित बदलावों पर नजर बनाए रखनी होगी। आने वाले समय में व्यापारिक मुद्दों को लेकर बयानबाजी और बाजार में उतार-चढ़ाव जारी रह सकता है।
विश्लेषकों का मानना है कि भविष्य में अमेरिका यदि किसी देश या उत्पाद के खिलाफ नया व्यापारिक कदम उठाता है तो उसे सेक्शन 301 या सेक्शन 232 जैसी प्रक्रियाओं का सहारा लेना पड़ सकता है। इन प्रावधानों के तहत जाँच और निर्धारित कानूनी प्रक्रिया के बाद ही शुल्क या अन्य प्रतिबंध लागू किए जा सकते हैं। इस तरह की कार्रवाई में समय लगता है और संबंधित पक्षों को अपनी बात रखने का अवसर भी मिल सकता है।
इसके मुकाबले आपातकालीन अधिकारों के इस्तेमाल से कम समय में व्यापक आर्थिक कदम उठाए जा सकते हैं। इसलिए इन अधिकारों के उपयोग की गुंजाइश सीमित होने से व्यापारिक साझेदारों के लिए अचानक पैदा होने वाली अनिश्चितता कम हो सकती है। भारत के लिए यह इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि अमेरिकी बाजार भारतीय दवा, इलेक्ट्रॉनिक्स, कपड़ा, इंजीनियरिंग उत्पादों और अन्य वस्तुओं के निर्यात का एक अहम केंद्र है।
फिर भी रिपोर्ट में कुछ ऐसे क्षेत्रों की पहचान की गई है,जहाँ भारत को सतर्क रहने की जरूरत होगी। इनमें फार्मास्युटिकल और इलेक्ट्रॉनिक्स उद्योग प्रमुख हैं। इन क्षेत्रों के उत्पादों पर अमेरिका सेक्शन 232 के तहत शुल्क लगाने पर विचार कर सकता है। यदि ऐसा कोई फैसला होता है,तो भारतीय कंपनियों की लागत बढ़ सकती है और अमेरिकी बाजार में उनकी प्रतिस्पर्धात्मक स्थिति प्रभावित हो सकती है। इसलिए केवल व्यापक टैरिफ नीति में नरमी के संकेतों के आधार पर इन उद्योगों से जुड़े जोखिमों को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
भारत की अर्थव्यवस्था के लिए एक अन्य महत्वपूर्ण जोखिम अंतर्राष्ट्रीय कूटनीति और ऊर्जा आपूर्ति से जुड़ा हुआ है। रिपोर्ट में कहा गया है कि रूस या ईरान से संबंधित कूटनीतिक प्रयासों में विफलता की स्थिति पैदा होने पर भारत के कच्चे तेल आयात पर दोबारा दबाव बढ़ सकता है। भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों का बड़ा हिस्सा आयात के माध्यम से पूरा करता है। ऐसे में अंतर्राष्ट्रीय बाजार में तेल की कीमतों में तेजी आने से देश का आयात बिल बढ़ सकता है।
कच्चे तेल की कीमतों में वृद्धि का असर केवल पेट्रोल और डीजल की लागत तक सीमित नहीं रहता। इससे परिवहन, उत्पादन और कई अन्य क्षेत्रों की लागत भी बढ़ सकती है। महँगे तेल के कारण देश के चालू खाते के घाटे पर दबाव पड़ता है और विदेशी मुद्रा की माँग बढ़ सकती है। इसका असर रुपये की विनिमय दर पर भी देखने को मिल सकता है।
इसके उलट, कमजोर अमेरिकी डॉलर, कच्चे तेल की कीमतों में नरमी और व्यापारिक अनिश्चितता में कमी भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए अनुकूल परिस्थितियाँ बना सकती हैं। रिपोर्ट के अनुसार,इन कारकों से रुपये को स्थिरता मिल सकती है। साथ ही भारतीय निर्यातकों को बेहतर कारोबारी माहौल मिल सकता है और भारतीय परिसंपत्तियों में निवेश से जुड़े जोखिम प्रीमियम में धीरे-धीरे कमी आने की संभावना है।
रिपोर्ट में ब्रेंट क्रूड की कीमतों में आई गिरावट को भारत के लिए महत्वपूर्ण राहत बताया गया है। इसके अनुसार, अक्टूबर 2026 में दर्ज उच्चतम स्तर से ब्रेंट क्रूड का भाव करीब 19 प्रतिशत नीचे आकर 94 डॉलर प्रति बैरल से कम हो गया है। तेल की कीमतों में यह गिरावट ऐसे समय आई है,जब चालू वित्त वर्ष में अब तक भारत का कच्चे तेल का आयात बिल लगभग 24 प्रतिशत बढ़ चुका है। इस अवधि में ब्रेंट क्रूड का औसत मूल्य करीब 97 डॉलर प्रति बैरल रहा है।
भारत जैसे बड़े तेल आयातक देश के लिए कीमतों में कमी का सीधा लाभ विदेशी मुद्रा की बचत के रूप में मिल सकता है। यदि तेल सस्ता बना रहता है,तो आयात पर होने वाला खर्च कम हो सकता है। इससे चालू खाते के घाटे पर दबाव घटाने और रुपये को सहारा देने में मदद मिल सकती है। इसके अलावा,ईंधन और परिवहन की लागत में बढ़ोतरी की आशंका भी कुछ कम हो सकती है।
कच्चे तेल की कीमतों में नरमी से भारतीय रिजर्व बैंक को भी राहत मिलने की संभावना है। रिपोर्ट के अनुसार, विदेशी मुद्रा बाजार में रुपये को स्थिर रखने के लिए केंद्रीय बैंक को लगातार प्रयास करने पड़ रहे थे। तेल आयात का खर्च बढ़ने पर डॉलर की माँग में इजाफा होता है, जिससे रुपये पर दबाव पड़ सकता है। ऐसे में अंतर्राष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में गिरावट से विदेशी मुद्रा बाजार में स्थिति सँभालने में मदद मिल सकती है।
हालाँकि,विश्लेषकों ने आगाह किया है कि मौजूदा राहत को स्थायी मानना जल्दबाजी होगी। भारत के चालू खाते के घाटे को वित्तपोषित करने की जरूरत अभी भी बनी हुई है। इसके अलावा,भारतीय रिजर्व बैंक की बैलेंस शीट पर लगभग 239 अरब डॉलर की फॉरवर्ड डॉलर देनदारियाँ मौजूद हैं। इस स्थिति में केंद्रीय बैंक को विदेशी मुद्रा भंडार और रुपये की सुरक्षा से जुड़े उपायों को संतुलित तरीके से आगे बढ़ाना होगा।
रिपोर्ट के अनुसार,भारत में दीर्घकालिक पूंजी का प्रवाह बढ़ने पर उसका इस्तेमाल विदेशी मुद्रा भंडार और मुद्रा सुरक्षा तंत्र को मजबूत करने के लिए किया जा सकता है। इससे रुपये में अत्यधिक तेजी को सीमित रखने में भी मदद मिल सकती है। यानी डॉलर की कमजोरी और कच्चे तेल की कीमतों में गिरावट से रुपये को समर्थन जरूर मिल सकता है,लेकिन इससे उसकी दिशा में एकतरफा मजबूती की गारंटी नहीं मिलती।
अमेरिकी मौद्रिक नीति भी भारत के लिए महत्वपूर्ण बनी रहेगी। रिपोर्ट में कहा गया है कि भले ही अमेरिकी फेडरल रिजर्व भविष्य में ब्याज दरों को लेकर नरम रुख अपनाए, लेकिन अमेरिका में महँगाई लगातार ऊँचे स्तर पर बनी रहने की स्थिति में ब्याज दरों में बड़ी कटौती करना आसान नहीं होगा। ऐसे में वहाँ लंबे समय तक ब्याज दरें ऊँची रह सकती हैं।
अमेरिका में ब्याज दरें ऊँची रहने से वैश्विक निवेश प्रवाह और उभरते बाजारों की मुद्राओं पर असर पड़ सकता है। भारत भी इससे अछूता नहीं रहेगा। विदेशी निवेशकों के लिए अमेरिकी परिसंपत्तियों में निवेश आकर्षक बने रहने पर भारतीय बाजारों में पूँजी प्रवाह प्रभावित हो सकता है। यही वजह है कि भारतीय रिजर्व बैंक को भी अपनी मौद्रिक नीति तय करते समय घरेलू महँगाई रुपये की स्थिति और वैश्विक ब्याज दरों के बीच संतुलन बनाए रखना होगा।
कुल मिलाकर,अमेरिकी मध्यावधि चुनावों के बाद कांग्रेस में बदले सत्ता संतुलन से भारत-अमेरिका व्यापार संबंधों में तत्काल दबाव कम होने की संभावना बनी है। कम टैरिफ जोखिम,सस्ता कच्चा तेल और कमजोर डॉलर भारतीय अर्थव्यवस्था को कुछ राहत दे सकते हैं। हालाँकि,दवा और इलेक्ट्रॉनिक्स जैसे क्षेत्रों पर संभावित शुल्क,रूस-ईरान से जुड़े कूटनीतिक घटनाक्रम और अमेरिकी ब्याज दरों की अनिश्चितता अब भी चुनौती बने हुए हैं। ऐसे में भारत के लिए आने वाले समय में व्यापारिक अवसरों का लाभ उठाने के साथ-साथ वैश्विक आर्थिक और राजनीतिक बदलावों पर सतर्क नजर रखना जरूरी होगा।
