नई दिल्ली,10 सितंबर (युआईटीवी)- 1993 के मुंबई सीरियल ब्लास्ट मामले में दोषी ठहराए गए गैंगस्टर अबू सलेम को सुप्रीम कोर्ट से बड़ा झटका लगा है। शीर्ष अदालत ने गुरुवार को बॉम्बे हाईकोर्ट के उस फैसले को बरकरार रखा,जिसमें सलेम की समय से पहले रिहाई की माँग को खारिज कर दिया गया था। जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की पीठ ने अबू सलेम की याचिका पर फैसला सुनाते हुए उसे खारिज कर दिया। इसके साथ ही सलेम की जल्द रिहाई की उम्मीदों को फिलहाल झटका लगा है।
अबू सलेम ने बॉम्बे हाईकोर्ट के फैसले को चुनौती देते हुए सुप्रीम कोर्ट का रुख किया था। उसकी याचिका में मुख्य रूप से यह दावा किया गया था कि पुर्तगाल से प्रत्यर्पण के दौरान भारत सरकार की ओर से दिए गए आश्वासन के मुताबिक उसे 25 साल से अधिक की सजा नहीं दी जा सकती। सलेम की ओर से दलील दी गई कि प्रत्यर्पण के समय भारत सरकार ने पुर्तगाल को आश्वासन दिया था कि उसे किसी भी मामले में मौत की सजा नहीं दी जाएगी और उसकी सजा 25 साल से अधिक नहीं होगी।
सलेम ने इसी आधार पर अपनी रिहाई की माँग की थी। उसकी ओर से अदालत में कहा गया कि जेल में बिताए गए समय और उसे मिले सजा में छूट के लाभ को जोड़कर देखा जाए तो वह निर्धारित 25 साल की अवधि पूरी कर चुका है। सलेम का दावा था कि मुकदमे के दौरान उसकी हिरासत,दोषसिद्धि के बाद जेल में बिताया गया समय और अच्छे आचरण के आधार पर मिली छूट को एक साथ जोड़ा जाना चाहिए।
सलेम की याचिका में विशेष रूप से कहा गया था कि 31 मार्च 2025 तक उसने कुल 25 साल की अवधि पूरी कर ली थी। इसी गणना के आधार पर उसने शीर्ष अदालत से उसे जेल से रिहा करने का अनुरोध किया था। हालाँकि,अदालत ने उसकी इस दलील को स्वीकार नहीं किया और बॉम्बे हाईकोर्ट के फैसले को बरकरार रखा।
इससे पहले बॉम्बे हाईकोर्ट ने सलेम की रिहाई की माँग को समय से पहले दायर की गई याचिका माना था। हाईकोर्ट ने कहा था कि उसकी 25 साल की अवधि अभी पूरी नहीं हुई है और यह अवधि वर्ष 2030 में पूरी होगी। इसी आधार पर सलेम को तत्काल रिहाई देने से इनकार किया गया था। अब सुप्रीम कोर्ट ने भी हाईकोर्ट के फैसले में हस्तक्षेप करने से इनकार कर दिया है।
अबू सलेम को वर्ष 2002 में पुर्तगाल में गिरफ्तार किया गया था। गिरफ्तारी के बाद उसे भारत प्रत्यर्पित किए जाने को लेकर लंबी कानूनी प्रक्रिया चली। कई कानूनी अड़चनों के बाद वर्ष 2005 में उसे भारत लाया गया। भारत आने के बाद उसके खिलाफ अलग-अलग मामलों में मुकदमे चले। इनमें आतंकवाद और विध्वंसक गतिविधियों से जुड़े कानून टाडा के तहत दर्ज मामले भी शामिल थे।
सलेम के खिलाफ टाडा के दो मामलों में सुनवाई हुई। इनमें से एक मामला वर्ष 1993 के मुंबई बम धमाकों से जुड़ा था,जबकि दूसरा एक अलग आपराधिक मामला था। दोनों मामलों में अदालतों ने उसे दोषी ठहराया और उम्रकैद की सजा सुनाई। उसे 25 फरवरी 2015 और 7 सितंबर 2017 को सुनाए गए अलग-अलग फैसलों में दोषी ठहराया गया था।
1993 के मुंबई सीरियल ब्लास्ट देश के सबसे गंभीर आतंकी हमलों में शामिल रहे हैं। इन धमाकों ने मुंबई को गहरे स्तर पर प्रभावित किया था और इस मामले की जांच तथा कानूनी कार्रवाई कई वर्षों तक चली। मामले में कई आरोपियों के खिलाफ मुकदमे चले और अलग-अलग अदालतों ने उनकी भूमिका के आधार पर फैसले सुनाए। अबू सलेम भी इस मामले के प्रमुख दोषियों में शामिल रहा है।
सलेम की रिहाई से जुड़ी याचिका में प्रत्यर्पण के समय भारत सरकार की ओर से पुर्तगाल को दिए गए आश्वासन को महत्वपूर्ण आधार बनाया गया था। उसका कहना था कि जब उसे भारत लाया गया,तब यह स्पष्ट था कि उसे मौत की सजा नहीं दी जाएगी और अधिकतम 25 साल की अवधि के बाद उसे राहत मिलनी चाहिए। उसने जेल में बिताए समय और मिलने वाली छूट को अपनी गणना में शामिल करते हुए दावा किया कि निर्धारित अवधि पूरी हो चुकी है।
हालाँकि,अदालत के सामने इस गणना को लेकर अलग स्थिति रही। बॉम्बे हाईकोर्ट ने उसकी ओर से बताई गई अवधि को स्वीकार नहीं किया और कहा कि उसकी 25 साल की अवधि 2030 में पूरी होगी। इसी फैसले के खिलाफ अबू सलेम सुप्रीम कोर्ट पहुँचा था। शीर्ष अदालत ने 27 जुलाई को उसकी याचिका पर सुनवाई पूरी करने के बाद फैसला सुरक्षित रख लिया था। गुरुवार को पीठ ने अपना फैसला सुनाते हुए उसकी याचिका खारिज कर दी।
सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले के बाद अबू सलेम को तत्काल रिहाई नहीं मिल पाएगी। अदालत ने हाईकोर्ट के उस निष्कर्ष को बरकरार रखा है कि रिहाई की मांग फिलहाल समय से पहले है। इसका अर्थ है कि सलेम की ओर से 25 साल की अवधि पूरी होने को लेकर की गई गणना को अदालत ने उसकी तत्काल रिहाई के लिए पर्याप्त आधार नहीं माना।
अब इस फैसले के बाद सलेम को जेल से बाहर आने के लिए आगे की कानूनी और वैधानिक प्रक्रिया का इंतजार करना होगा। उसकी ओर से दायर याचिका में प्रत्यर्पण के दौरान दिए गए आश्वासनों और सजा की गणना को लेकर जो तर्क दिए गए थे,उन पर सुप्रीम कोर्ट ने राहत देने से इनकार कर दिया है।
इस पूरे मामले में सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि अबू सलेम ने अपनी रिहाई के लिए केवल जेल में बिताए समय को आधार नहीं बनाया था,बल्कि पुर्तगाल से प्रत्यर्पण के समय भारत सरकार की ओर से दिए गए आश्वासन और सजा में मिलने वाली छूट को भी अपनी दलील का हिस्सा बनाया था। इसके बावजूद शीर्ष अदालत ने बॉम्बे हाईकोर्ट के निर्णय को सही माना।
गुरुवार का फैसला अबू सलेम के लिए फिलहाल राहत की सभी उम्मीदों पर विराम लगाता है। 25 साल की सजा पूरी होने को लेकर उसकी ओर से पेश की गई दलीलों के बावजूद अदालत ने उसकी याचिका खारिज कर दी है। बॉम्बे हाईकोर्ट के अनुसार उसकी 25 साल की अवधि 2030 में पूरी होगी और सुप्रीम कोर्ट ने भी इसी फैसले को बरकरार रखा है। इस तरह 1993 मुंबई धमाकों के दोषी अबू सलेम की तत्काल रिहाई का रास्ता बंद हो गया है।
