मेटा (तस्वीर क्रेडिट@IndianInfoGuid)

बच्चों के लिए ‘लत लगाने वाला’ बनाया फेसबुक-इंस्टाग्राम? मेटा 16.68 अरब डॉलर तक के समझौते पर राजी,किशोरों की सुरक्षा के लिए होंगे बड़े बदलाव

नई दिल्ली,27 अगस्त (युआईटीवी)- सोशल मीडिया की दिग्गज कंपनी मेटा प्लेटफॉर्म्स ने बच्चों और किशोरों की सुरक्षा से जुड़े एक बड़े कानूनी विवाद को खत्म करने के लिए अमेरिका के कई राज्यों के साथ समझौते पर सहमति जताई है। इस मामले में कंपनी पर आरोप लगाया गया था कि उसने फेसबुक और इंस्टाग्राम को बच्चों और किशोरों के लिए इस तरह डिजाइन किया कि वे इन प्लेटफॉर्म का अत्यधिक और बार-बार इस्तेमाल करें। इसके अलावा कंपनी पर प्लेटफॉर्म की सुरक्षा को लेकर उपयोगकर्ताओं को गुमराह करने और नाबालिगों की व्यक्तिगत जानकारी को अनुचित तरीके से एकत्र करने के आरोप भी लगाए गए थे। अदालती दस्तावेजों के अनुसार, प्रस्तावित समझौते के तहत मेटा को 16.68 अरब डॉलर तक का भुगतान करना पड़ सकता है।

यह मामला कैलिफोर्निया की एक संघीय अदालत में चल रहा था,जिसमें अमेरिका के 29 राज्यों ने मेटा के खिलाफ विभिन्न आरोप लगाए थे। समझौते के साथ बच्चों और किशोरों पर सोशल मीडिया के प्रभाव से जुड़े अमेरिका के सबसे चर्चित कानूनी मामलों में से एक का अंत होने की राह साफ हो गई है। हालाँकि,मेटा ने समझौते पर सहमति जताने के बावजूद किसी भी गलती या कानूनी जिम्मेदारी को स्वीकार नहीं किया है। कंपनी लगातार इन आरोपों से इनकार करती रही है और उसका कहना है कि उसने युवा उपयोगकर्ताओं की सुरक्षा के लिए अपने प्लेटफॉर्म पर कई महत्वपूर्ण कदम उठाए हैं।

समझौते के तहत अमेरिका में फेसबुक और इंस्टाग्राम का इस्तेमाल करने वाले किशोरों के लिए सुरक्षा व्यवस्था को और मजबूत किया जाएगा। इनमें किशोर उपयोगकर्ताओं के लिए रोजाना प्लेटफॉर्म इस्तेमाल करने की समय सीमा निर्धारित करने जैसे उपाय शामिल हैं। इसके अलावा रात के समय सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म तक पहुंच को प्रतिबंधित करने की व्यवस्था भी लागू की जाएगी। इन बदलावों का उद्देश्य किशोरों के अत्यधिक सोशल मीडिया इस्तेमाल को कम करना और उन्हें लंबे समय तक स्क्रीन पर सक्रिय रहने से रोकना है।

मामले में राज्यों ने आरोप लगाया था कि मेटा ने अपने प्लेटफॉर्म की सुरक्षा को लेकर उपभोक्ताओं को पर्याप्त जानकारी नहीं दी और कंपनी के डिजाइन में ऐसे फीचर मौजूद थे, जो बच्चों तथा किशोरों को अधिक समय तक प्लेटफॉर्म पर बनाए रखने के लिए प्रेरित करते थे। राज्यों का कहना था कि कंपनी को अपने प्लेटफॉर्म के युवा उपयोगकर्ताओं पर पड़ने वाले प्रभाव की जानकारी थी,इसके बावजूद उसने ऐसे डिजाइन और सुविधाओं को जारी रखा,जिनसे अत्यधिक उपयोग को बढ़ावा मिल सकता था।

मुकदमे में कैलिफोर्निया,कोलोराडो,केंटकी और न्यू जर्सी समेत कई राज्यों के उपभोक्ता संरक्षण कानूनों के उल्लंघन का आरोप भी लगाया गया था। इसके अलावा राज्यों ने कंपनी पर बाल ऑनलाइन गोपनीयता संरक्षण अधिनियम का उल्लंघन करने का आरोप लगाया। आरोप था कि मेटा ने ऐसे बच्चों की व्यक्तिगत जानकारी एकत्र की,जिनके बारे में कंपनी को पता था कि वे नाबालिग हैं। राज्यों का दावा था कि इस डेटा को एकत्र करने से पहले अभिभावकों को पर्याप्त जानकारी नहीं दी गई और आवश्यक अनुमति भी नहीं ली गई।

मामले में बच्चों के डेटा के इस्तेमाल को लेकर भी गंभीर आरोप लगाए गए। राज्यों की ओर से दावा किया गया कि नाबालिगों से संबंधित एकत्र की गई जानकारी का इस्तेमाल मशीन लर्निंग और जनरेटिव एआई मॉडल को प्रशिक्षित करने के लिए किया गया। इस आरोप ने विवाद को और गंभीर बना दिया,क्योंकि इससे बच्चों की ऑनलाइन गोपनीयता और कृत्रिम बुद्धिमत्ता के विकास के बीच संबंधों को लेकर नई चिंताएँ पैदा हुईं। हालाँकि,मेटा ने पूरे मामले के दौरान इन आरोपों को स्वीकार नहीं किया और अपने प्लेटफॉर्म की नीतियों तथा सुरक्षा उपायों का बचाव किया।

मेटा का एक प्रमुख तर्क यह भी रहा कि कंपनी अपने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म को जानबूझकर ‘लत लगाने वाला’ बताकर उपभोक्ताओं को गुमराह नहीं कर सकती, क्योंकि ‘सोशल मीडिया की लत’ को औपचारिक रूप से मनोरोग संबंधी स्थिति के तौर पर मान्यता नहीं दी गई है। कंपनी ने इस आधार पर राज्यों के आरोपों को चुनौती दी थी। हालाँकि,राज्यों ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म के डिजाइन,उपयोगकर्ता व्यवहार और बच्चों पर इसके संभावित प्रभाव को व्यापक उपभोक्ता संरक्षण के नजरिये से देखा।

मुकदमे की सुनवाई शुरू होने से पहले मेटा ने दावा किया था कि कुछ अमेरिकी राज्य कंपनी से 1.4 ट्रिलियन डॉलर तक के दंड की माँग कर रहे हैं। हालाँकि,बाद में राज्यों की ओर से संकेत दिया गया कि वास्तविक दंड और अन्य आर्थिक दावों की राशि लगभग 200 अरब डॉलर के करीब हो सकती है। इसके अलावा राज्य सरकारें अतिरिक्त मुआवजे की माँग कर रही थीं। वे ऐसे न्यायिक आदेश भी चाहती थीं,जिनके तहत मेटा को अपने प्लेटफॉर्म में बड़े बदलाव करने पड़ते और बच्चों के लिए सोशल मीडिया खाते बनाना और अधिक कठिन हो सकता था।

अब समझौते के तहत किशोरों के सोशल मीडिया इस्तेमाल को नियंत्रित करने और रात के समय उनकी पहुँच सीमित करने जैसे उपायों पर जोर दिया गया है। यह बदलाव इस व्यापक बहस का हिस्सा है कि सोशल मीडिया कंपनियों को नाबालिग उपयोगकर्ताओं के लिए किस स्तर की सुरक्षा और नियंत्रण उपलब्ध कराना चाहिए। खासकर ऐसे समय में जब बच्चों और किशोरों के मानसिक स्वास्थ्य, नींद, ध्यान और सामाजिक व्यवहार पर सोशल मीडिया के संभावित प्रभावों को लेकर दुनिया भर में चर्चा जारी है।

समझौते की खबर सामने आने के बाद निवेशकों की प्रतिक्रिया सकारात्मक रही। बाजार खुलने से पहले के कारोबार में मेटा के शेयरों में लगभग 4.4 प्रतिशत तक की तेजी देखी गई। इससे संकेत मिलता है कि निवेशकों ने संभावित रूप से इस समझौते को कंपनी के लिए लंबे समय से चले आ रहे कानूनी जोखिम को कम करने वाले कदम के रूप में देखा। हालाँकि,समझौते की वित्तीय लागत बहुत बड़ी है,लेकिन मुकदमे से जुड़े संभावित और इससे भी बड़े दंड तथा कारोबारी अनिश्चितता की तुलना में निवेशकों ने इसे राहत के तौर पर लिया।

बच्चों और किशोरों की सुरक्षा को लेकर मेटा अकेली सोशल मीडिया कंपनी नहीं है,जो कानूनी चुनौतियों का सामना कर रही है। स्नैप,अल्फाबेट और बाइटडांस जैसी कंपनियां भी हजारों मुकदमों का सामना कर रही हैं। इन मामलों में आरोप लगाया गया है कि सोशल मीडिया और वीडियो प्लेटफॉर्म को ऐसे फीचर के साथ डिजाइन किया गया,जो बच्चों और किशोरों को अधिक समय तक स्क्रीन पर बनाए रखते हैं। आरोप लगाने वालों का कहना है कि लगातार स्क्रॉलिंग,सिफारिशों और अन्य आकर्षक सुविधाओं के जरिए उपयोगकर्ताओं को बार-बार प्लेटफॉर्म पर लौटने के लिए प्रेरित किया जाता है।

इन कंपनियों के खिलाफ चल रहे मामलों ने सोशल मीडिया उद्योग के कारोबारी मॉडल और बच्चों की सुरक्षा के बीच संतुलन पर भी सवाल खड़े किए हैं। सोशल मीडिया कंपनियाँ आम तौर पर उपयोगकर्ताओं की संख्या और उनके प्लेटफॉर्म पर बिताए गए समय को अपने कारोबार के लिए महत्वपूर्ण मानती हैं। ऐसे में बच्चों और किशोरों को लंबे समय तक प्लेटफॉर्म पर बनाए रखने वाले फीचर व्यावसायिक रूप से फायदेमंद हो सकते हैं, लेकिन आलोचकों का कहना है कि नाबालिगों के मामले में कंपनियों की जिम्मेदारी अलग और अधिक कड़ी होनी चाहिए।

मेटा के साथ हुआ यह समझौता इसी बदलते माहौल का महत्वपूर्ण संकेत माना जा रहा है। एक तरफ कंपनी ने किसी गलती को स्वीकार नहीं किया है,वहीं दूसरी तरफ किशोर उपयोगकर्ताओं के लिए समय सीमा और रात में पहुँच प्रतिबंध जैसे सुरक्षा उपायों को लागू करने पर सहमति जताई गई है। इससे यह संकेत मिलता है कि बच्चों के लिए सोशल मीडिया के इस्तेमाल को लेकर नियामकीय और कानूनी दबाव लगातार बढ़ रहा है।

आने वाले समय में यह विवाद केवल मेटा तक सीमित रहने की संभावना नहीं है। बच्चों की ऑनलाइन गोपनीयता,सोशल मीडिया के अत्यधिक इस्तेमाल और मानसिक स्वास्थ्य पर इसके प्रभाव को लेकर दुनिया के कई देशों में नियमों को कड़ा करने की माँग हो रही है। ऐसे में मेटा और अन्य तकनीकी कंपनियों को अपने प्लेटफॉर्म के डिजाइन,डेटा संग्रह और नाबालिगों की सुरक्षा से जुड़े तौर-तरीकों में और बदलाव करने पड़ सकते हैं।

फिलहाल 16.68 अरब डॉलर तक के संभावित भुगतान वाला यह समझौता मेटा के लिए एक बड़ी कानूनी और वित्तीय चुनौती का समाधान करने की दिशा में अहम कदम है। वहीं, किशोर उपयोगकर्ताओं के लिए समय सीमा और रात के समय पहुँच पर रोक जैसे प्रस्तावित उपाय यह दर्शाते हैं कि सोशल मीडिया कंपनियों पर अब केवल सामग्री की निगरानी ही नहीं,बल्कि प्लेटफॉर्म के डिजाइन और उसके उपयोगकर्ता व्यवहार पर पड़ने वाले प्रभाव की जिम्मेदारी भी बढ़ रही है। बच्चों और किशोरों की ऑनलाइन सुरक्षा को लेकर जारी वैश्विक बहस में यह समझौता आगे की नीतियों और कानूनी मामलों के लिए एक महत्वपूर्ण उदाहरण बन सकता है।