कोलकाता,1 जून (युआईटीवी)- पश्चिम बंगाल की राजनीति में एक बार फिर टकराव और आरोप-प्रत्यारोप का दौर तेज हो गया है। तृणमूल कांग्रेस के राष्ट्रीय महासचिव और लोकसभा सांसद अभिषेक बनर्जी पर हुए कथित हमले के बाद राज्य का राजनीतिक माहौल गरमा गया है। इस घटना को लेकर तृणमूल कांग्रेस और भारतीय जनता पार्टी के बीच तीखी बयानबाजी देखने को मिल रही है। अभिषेक बनर्जी ने इस पूरे मामले में भाजपा पर गंभीर आरोप लगाते हुए कहा है कि डराने-धमकाने और हिंसा की राजनीति के जरिए लोकतांत्रिक आवाजों को दबाया नहीं जा सकता। उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा कि उनकी पार्टी और उसके कार्यकर्ता जनता की आवाज उठाना जारी रखेंगे तथा किसी भी प्रकार के दबाव के आगे झुकेंगे नहीं।
सोमवार को सोशल मीडिया मंच ‘एक्स’ पर साझा किए गए एक विस्तृत संदेश में अभिषेक बनर्जी ने अपने समर्थन में सामने आए राज्यसभा सांसद कपिल सिब्बल का आभार व्यक्त किया। उन्होंने कहा कि ऐसे समय में जब लोकतांत्रिक मूल्यों और राजनीतिक शिष्टाचार की परीक्षा हो रही है,तब सच का साथ देने वालों की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण हो जाती है। उन्होंने कपिल सिब्बल को धन्यवाद देते हुए कहा कि उन्होंने सही समय पर अपनी बात रखी और लोकतांत्रिक मूल्यों की रक्षा के पक्ष में खड़े हुए।
अपने संदेश में अभिषेक बनर्जी ने भाजपा पर तीखा हमला बोलते हुए कहा कि पार्टी सार्वजनिक मंचों पर शांति और लोकतंत्र की बात करती है,लेकिन उसके कार्य और व्यवहार कुछ और ही तस्वीर पेश करते हैं। उनके अनुसार हाल के वर्षों में राजनीतिक हिंसा,डराने-धमकाने की रणनीति और विरोधियों के खिलाफ आक्रामक रवैया भाजपा की कार्यशैली का हिस्सा बन गया है। उन्होंने आरोप लगाया कि जो लोग स्वयं को लोकतांत्रिक व्यवस्था का संरक्षक बताते हैं,उनके व्यवहार और दावों के बीच बड़ा अंतर दिखाई देता है।
तृणमूल कांग्रेस नेता ने कहा कि देश ने हाल की घटना के माध्यम से राजनीति में गिरते स्तर का एक और उदाहरण देखा है। उन्होंने कहा कि लोकतांत्रिक व्यवस्था में असहमति और विरोध की जगह होती है,लेकिन हिंसा और हमले किसी भी स्थिति में स्वीकार्य नहीं हो सकते। उनके अनुसार राजनीतिक मतभेदों को लोकतांत्रिक तरीके से सुलझाया जाना चाहिए,न कि हिंसक तरीकों के जरिए।
अभिषेक बनर्जी ने अपने बयान में यह भी कहा कि चाहे कितनी भी हिंसा या धमकी दी जाए,उनकी पार्टी संविधान और लोकतांत्रिक मूल्यों के प्रति अपनी प्रतिबद्धता से पीछे नहीं हटेगी। उन्होंने कहा कि जनता के अधिकारों और लोकतंत्र की रक्षा के लिए आवाज उठाना उनका कर्तव्य है और यह संघर्ष आगे भी जारी रहेगा। उन्होंने दावा किया कि डराने-धमकाने की कोशिशें उनकी राजनीतिक इच्छाशक्ति को कमजोर नहीं कर सकतीं।
इस पूरे विवाद में राज्यसभा सांसद और वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल भी अभिषेक बनर्जी के समर्थन में सामने आए हैं। उन्होंने घटना की कड़ी निंदा करते हुए कहा कि राजनीतिक हिंसा किसी भी लोकतांत्रिक समाज के लिए चिंता का विषय है। सिब्बल ने आरोप लगाया कि भाजपा की राजनीति में हिंसा का तत्व लगातार दिखाई देता है और अभिषेक बनर्जी पर हुआ हमला इसी प्रवृत्ति का उदाहरण है। उन्होंने कहा कि इस तरह की घटनाएँ लोकतांत्रिक परंपराओं को कमजोर करती हैं और राजनीतिक संवाद के स्तर को नुकसान पहुँचाती हैं।
कपिल सिब्बल ने अपने बयान में यह भी कहा कि जो लोग भारतीय संस्कृति और सनातन मूल्यों की बात करते हैं,उन्हें अपने व्यवहार में भी उन मूल्यों का पालन करना चाहिए। उनके अनुसार हिंसा और असहिष्णुता किसी भी प्रकार से लोकतांत्रिक या सांस्कृतिक आदर्शों के अनुरूप नहीं हैं।
दरअसल,यह पूरा विवाद शनिवार को पश्चिम बंगाल के दक्षिण 24 परगना जिले के सोनारपुर क्षेत्र में हुई एक घटना के बाद शुरू हुआ। जानकारी के अनुसार,अभिषेक बनर्जी एक तृणमूल कांग्रेस कार्यकर्ता के परिवार से मिलने पहुँचे थे,जिसकी चुनाव बाद हुई हिंसा में मौत हो गई थी। इस दौरान वहाँ कुछ लोगों ने उनके काफिले का विरोध किया। प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार विरोध प्रदर्शन धीरे-धीरे उग्र हो गया और कुछ लोगों ने नारेबाजी शुरू कर दी।
रिपोर्टों के मुताबिक,प्रदर्शनकारियों के एक समूह ने अभिषेक बनर्जी के काफिले की ओर अंडे और ईंट के टुकड़े फेंके। घटना के दौरान अफरा-तफरी का माहौल बन गया और सुरक्षा कर्मियों को स्थिति नियंत्रित करने के लिए हस्तक्षेप करना पड़ा। तृणमूल कांग्रेस का आरोप है कि यह हमला पूर्व नियोजित था और इसके पीछे राजनीतिक उद्देश्य था। वहीं विपक्षी दलों की ओर से इस मामले को लेकर अलग-अलग प्रतिक्रियाएँ सामने आ रही हैं।
घटना के बाद राज्य की राजनीति में आरोप-प्रत्यारोप का दौर तेज हो गया है। तृणमूल कांग्रेस इसे लोकतांत्रिक मूल्यों पर हमला बता रही है,जबकि भाजपा की ओर से इन आरोपों को खारिज किए जाने की खबरें भी सामने आई हैं। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह विवाद आने वाले दिनों में और अधिक राजनीतिक रंग ले सकता है,क्योंकि पश्चिम बंगाल में राजनीतिक प्रतिस्पर्धा पहले से ही काफी तीखी बनी हुई है।
पश्चिम बंगाल लंबे समय से राजनीतिक हिंसा और टकराव की घटनाओं को लेकर चर्चा में रहा है। चुनावों के दौरान और उसके बाद विभिन्न दलों के कार्यकर्ताओं के बीच संघर्ष की घटनाएँ समय-समय पर सामने आती रही हैं। ऐसे में सोनारपुर की यह घटना भी राज्य की राजनीतिक बहस का बड़ा विषय बन गई है।
फिलहाल इस मामले को लेकर राजनीतिक बयानबाजी जारी है और सभी पक्ष अपने-अपने तर्क रख रहे हैं। हालाँकि,इस पूरे घटनाक्रम ने एक बार फिर राजनीतिक हिंसा और लोकतांत्रिक मर्यादाओं को लेकर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। आने वाले दिनों में जाँच और राजनीतिक प्रतिक्रियाओं के आधार पर यह मामला किस दिशा में आगे बढ़ेगा,इस पर सभी की नजर बनी हुई है।
