तमिलनाडु के मुख्यमंत्री सी. जोसेफ विजय (तस्वीर क्रेडिट@rashtra_press)

कावेरी जल विवाद के बीच टला तमिलनाडु के मुख्यमंत्री विजय का बेंगलुरु दौरा,बढ़ते तनाव ने रोकी दोनों राज्यों की अहम वार्ता

चेन्नई,1 अगस्त (युआईटीवी)- कावेरी नदी के जल-बंटवारे को लेकर तमिलनाडु और कर्नाटक के बीच लंबे समय से चला आ रहा विवाद एक बार फिर राजनीतिक और सार्वजनिक चर्चा के केंद्र में है। इसी बीच तमिलनाडु के मुख्यमंत्री सी. जोसेफ विजय ने 3 अगस्त को प्रस्तावित अपना बेंगलुरु दौरा स्थगित करने का निर्णय लिया है। यह फैसला ऐसे समय में लिया गया है,जब कर्नाटक में कावेरी जल छोड़ने के आदेश के बाद विरोध-प्रदर्शन तेज हो गए हैं और राज्य सरकार पर विभिन्न संगठनों तथा राजनीतिक दलों का दबाव लगातार बढ़ रहा है। इस दौरे के दौरान तमिलनाडु और कर्नाटक के मुख्यमंत्रियों के बीच पहली बार आमने-सामने बातचीत होने वाली थी,जिससे वर्षों पुराने जल विवाद के समाधान की दिशा में सकारात्मक पहल की उम्मीद जताई जा रही थी। हालाँकि,मौजूदा परिस्थितियों ने इस बहुप्रतीक्षित बैठक को फिलहाल टालने पर मजबूर कर दिया।

जानकारी के अनुसार,कर्नाटक के मुख्यमंत्री डी.के. शिवकुमार ने तमिलनाडु सरकार से अनुरोध किया था कि वर्तमान परिस्थितियों को देखते हुए बैठक को कुछ समय के लिए स्थगित कर दिया जाए। कर्नाटक सरकार का मानना है कि राज्य में कावेरी जल विवाद को लेकर राजनीतिक माहौल अत्यधिक संवेदनशील बना हुआ है और ऐसे समय में उच्चस्तरीय बैठक से अपेक्षित सकारात्मक परिणाम मिलने की संभावना कम है। इसी अनुरोध के बाद तमिलनाडु के मुख्यमंत्री ने अपने अधिकारियों के साथ विस्तृत विचार-विमर्श कर दौरा टालने का निर्णय लिया।

दरअसल,हाल ही में कावेरी जल विनियमन समिति ने कर्नाटक को निर्देश दिया था कि वह 29 जुलाई से अगले 15 दिनों तक प्रतिदिन 3,500 क्यूसेक पानी तमिलनाडु के लिए छोड़े। इस आदेश के बाद कर्नाटक के कई जिलों,विशेषकर मांड्या और कावेरी बेसिन से जुड़े इलाकों में किसानों,सामाजिक संगठनों और विभिन्न राजनीतिक दलों ने विरोध-प्रदर्शन शुरू कर दिए। प्रदर्शनकारियों का कहना है कि राज्य में पर्याप्त वर्षा नहीं हुई है और जलाशयों में उपलब्ध पानी पहले स्थानीय किसानों तथा पेयजल आवश्यकताओं के लिए सुरक्षित रखा जाना चाहिए। ऐसे में तमिलनाडु के लिए अतिरिक्त पानी छोड़ना राज्य के हितों के खिलाफ होगा।

कावेरी जल विवाद दक्षिण भारत के सबसे पुराने अंतरराज्यीय विवादों में से एक है। यह विवाद मुख्य रूप से कर्नाटक और तमिलनाडु के बीच कावेरी नदी के जल के उपयोग और बंटवारे को लेकर है। समय-समय पर न्यायाधिकरणों,न्यायालयों और विभिन्न प्राधिकरणों द्वारा आदेश जारी किए जाते रहे हैं,लेकिन मानसून की स्थिति और जल उपलब्धता के आधार पर यह मुद्दा अक्सर फिर से विवाद का रूप ले लेता है। इस बार भी जल विनियमन समिति के आदेश के बाद दोनों राज्यों में राजनीतिक हलचल तेज हो गई है।

सूत्रों के अनुसार,मुख्यमंत्री विजय ने दौरे को लेकर अंतिम निर्णय लेने से पहले तमिलनाडु के जल संसाधन विभाग के वरिष्ठ अधिकारियों के साथ लंबी बैठक की। इस दौरान कर्नाटक की ओर से मौजूदा हालात की जानकारी साझा की गई और बताया गया कि राज्य में जनभावनाएं बेहद संवेदनशील हैं। अधिकारियों ने इस बात पर भी विचार किया कि यदि वर्तमान माहौल में बैठक आयोजित की जाती है,तो उससे अपेक्षित सकारात्मक परिणाम मिलने की संभावना कम हो सकती है। इन सभी पहलुओं पर विचार करने के बाद यह तय किया गया कि फिलहाल बातचीत को स्थगित करना ही उचित रहेगा।

यह बैठक केवल कावेरी नदी के जल-बंटवारे तक सीमित नहीं रहने वाली थी। दोनों राज्यों के बीच मेकेदातु जलाशय परियोजना सहित कई महत्वपूर्ण अंतरराज्यीय मुद्दों पर भी चर्चा प्रस्तावित थी। मेकेदातु परियोजना लंबे समय से विवाद का विषय रही है। कर्नाटक का कहना है कि इस परियोजना से राज्य में पेयजल और बिजली उत्पादन की जरूरतें पूरी होंगी,जबकि तमिलनाडु को आशंका है कि इससे कावेरी नदी के प्रवाह पर असर पड़ेगा और उसके हिस्से का पानी कम हो सकता है। इसी कारण यह परियोजना दोनों राज्यों के बीच लगातार मतभेद का कारण बनी हुई है।

मुख्यमंत्री विजय की पहल पर शुरू हुई इस प्रस्तावित बैठक को दोनों राज्यों के संबंधों में नई शुरुआत के रूप में देखा जा रहा था। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना था कि यदि दोनों मुख्यमंत्री सीधे बातचीत करते तो कई लंबित मुद्दों पर संवाद का रास्ता खुल सकता था। हालाँकि,मौजूदा परिस्थितियों ने इस संभावना को फिलहाल टाल दिया है,लेकिन दोनों पक्षों ने भविष्य में अनुकूल वातावरण बनने पर बातचीत जारी रखने की इच्छा भी व्यक्त की है।

विवाद उस समय और गहरा गया,जब कर्नाटक ने कावेरी जल प्रबंधन प्राधिकरण के समक्ष जल विनियमन समिति के आदेश पर रोक लगाने की अपील की। राज्य सरकार का तर्क था कि जलाशयों में उपलब्ध पानी सीमित है और वर्तमान परिस्थितियों में तमिलनाडु के लिए निर्धारित मात्रा में पानी छोड़ना संभव नहीं है। हालाँकि,प्राधिकरण ने कर्नाटक की अपील स्वीकार नहीं की और समिति के आदेश को बरकरार रखा। इसके बाद राज्य में विरोध-प्रदर्शन और तेज हो गए।

मांड्या सहित कई इलाकों में किसानों ने सड़कों पर उतरकर प्रदर्शन किए और सरकार से तमिलनाडु के लिए पानी छोड़ने के फैसले का विरोध करने की माँग की। प्रदर्शनकारियों का कहना है कि यदि जलाशयों का पानी दूसरे राज्य को दिया गया,तो स्थानीय कृषि गतिविधियाँ प्रभावित होंगी। वहीं दूसरी ओर तमिलनाडु का कहना है कि कावेरी जल बँटवारे से जुड़े आदेशों का पालन किया जाना चाहिए,ताकि राज्य के किसानों को सिंचाई के लिए पर्याप्त पानी मिल सके।

राजनीतिक दृष्टि से भी यह मुद्दा दोनों राज्यों में बेहद संवेदनशील माना जाता है। कावेरी जल विवाद अक्सर चुनावी राजनीति का भी अहम विषय बन जाता है। ऐसे में दोनों सरकारें एक ओर न्यायिक और वैधानिक आदेशों का पालन करने की बाध्यता में हैं,वहीं दूसरी ओर उन्हें अपने-अपने राज्यों की जनभावनाओं का भी ध्यान रखना पड़ रहा है।

विशेषज्ञों का मानना है कि कावेरी जैसे अंतरराज्यीय जल विवादों का स्थायी समाधान केवल न्यायालयों के आदेशों से नहीं,बल्कि आपसी विश्वास, वैज्ञानिक जल प्रबंधन और नियमित संवाद से ही संभव है। जलवायु परिवर्तन,अनियमित मानसून और बढ़ती जल मांग ने इस विवाद को और जटिल बना दिया है। इसलिए दोनों राज्यों के बीच सहयोग की भावना और पारदर्शी बातचीत भविष्य में बेहद महत्वपूर्ण होगी।

फिलहाल मुख्यमंत्री विजय का बेंगलुरु दौरा स्थगित होने से प्रत्यक्ष वार्ता का अवसर टल गया है,लेकिन दोनों राज्यों ने संवाद का रास्ता पूरी तरह बंद नहीं किया है। राजनीतिक पर्यवेक्षकों का मानना है कि जैसे ही कर्नाटक में मौजूदा तनाव कम होगा और परिस्थितियाँ सामान्य होंगी,दोनों मुख्यमंत्री फिर से बैठक कर कावेरी जल विवाद सहित अन्य लंबित मुद्दों पर चर्चा कर सकते हैं। ऐसे प्रयास न केवल दोनों राज्यों के संबंधों को बेहतर बनाएँगे, बल्कि लाखों किसानों और आम नागरिकों के हित में भी महत्वपूर्ण साबित हो सकते हैं।