डोनाल्ड ट्रंप (तस्वीर क्रेडिट@wsyx6)

ईरान पर दबाव की नीति जारी रखेगा अमेरिका,डोनाल्ड ट्रंप बोले- परमाणु हथियार हासिल करने नहीं देंगे,जरूरत पड़ी तो सैन्य कार्रवाई होगी

वाशिंगटन,1 अगस्त (युआईटीवी)- अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने एक बार फिर ईरान के प्रति अपने प्रशासन की सख्त नीति को दोहराते हुए स्पष्ट कर दिया है कि जब तक तेहरान अमेरिकी हितों और सैनिकों के लिए खतरा बना रहेगा या परमाणु हथियार विकसित करने की दिशा में आगे बढ़ेगा,तब तक अमेरिका उस पर सैन्य और रणनीतिक दबाव बनाए रखेगा। ट्रंप ने कहा कि उनकी सरकार ईरान को किसी भी स्थिति में परमाणु हथियार हासिल नहीं करने देगी और यदि आवश्यकता पड़ी तो सैन्य कार्रवाई का विकल्प भी खुला रहेगा। उन्होंने यह भी स्वीकार किया कि ईरानी नेतृत्व के साथ चल रही कूटनीतिक बातचीत को लेकर उनका भरोसा पहले की तुलना में कम हो गया है।

मैरीलैंड स्थित कैंप डेविड में आयोजित कैबिनेट बैठक के बाद पत्रकारों से बातचीत करते हुए राष्ट्रपति ट्रंप ने ईरान,मध्य पूर्व,यूक्रेन और वैश्विक सुरक्षा से जुड़े कई महत्वपूर्ण मुद्दों पर अपनी सरकार का दृष्टिकोण रखा। व्हाइट हाउस के अनुसार,यह कैंप डेविड में आयोजित पहली ऐसी कैबिनेट बैठक थी जिसका सीधा प्रसारण टेलीविजन पर किया गया। बैठक में अर्थव्यवस्था,रक्षा,स्वास्थ्य सेवा,विदेश नीति और राष्ट्रीय सुरक्षा जैसे विषयों पर भी विस्तार से चर्चा हुई।

ईरान के संदर्भ में ट्रंप ने कहा कि अमेरिका का उद्देश्य युद्ध को बढ़ावा देना नहीं है,बल्कि यह सुनिश्चित करना है कि तेहरान परमाणु हथियार बनाने की क्षमता हासिल न कर सके। उन्होंने दोहराया कि यदि ईरान इस दिशा में आगे बढ़ता है या अमेरिकी सैन्य बलों और सहयोगी देशों के लिए खतरा उत्पन्न करता है,तो अमेरिका आवश्यक कदम उठाने से पीछे नहीं हटेगा।

राष्ट्रपति ने कहा कि उनकी सरकार कूटनीतिक बातचीत जारी रखे हुए है,लेकिन केवल बातचीत के भरोसे राष्ट्रीय सुरक्षा को खतरे में नहीं डाला जा सकता। उन्होंने कहा कि अमेरिका समानांतर रूप से आर्थिक,सैन्य और कूटनीतिक तीनों स्तरों पर ईरान पर दबाव बनाए हुए है। उनके अनुसार,यही रणनीति भविष्य में भी जारी रहेगी।

पत्रकारों द्वारा आने वाले सप्ताहों में अमेरिका की रणनीति के बारे में पूछे जाने पर ट्रंप ने कहा कि यदि ईरान अपने रुख में बदलाव नहीं करता,तो उस पर और अधिक दबाव डाला जाएगा। उन्होंने कहा कि अमेरिका ऐसे कदम उठाएगा,जिससे अंततः ईरान को यह स्वीकार करना पड़े कि वह इस दबाव को अधिक समय तक सहन नहीं कर सकता। उनके अनुसार,दबाव की यह नीति ईरान को अपनी नीतियों पर पुनर्विचार करने के लिए मजबूर करेगी।

ट्रंप ने अपने बयान में सबसे अधिक जोर इस बात पर दिया कि ईरान के पास किसी भी परिस्थिति में परमाणु हथियार नहीं होने चाहिए। उन्होंने कहा कि यदि ईरान परमाणु हथियार हासिल कर लेता,तो पूरे मध्य पूर्व की स्थिति कहीं अधिक विनाशकारी हो सकती थी। उनके अनुसार,क्षेत्रीय स्थिरता बनाए रखने के लिए यह आवश्यक है कि ईरान की परमाणु महत्वाकांक्षाओं को रोका जाए।

उन्होंने कहा कि अमेरिका का मानना है कि परमाणु हथियारों का प्रसार केवल क्षेत्रीय ही नहीं,बल्कि वैश्विक सुरक्षा के लिए भी गंभीर खतरा है। इसलिए अमेरिकी प्रशासन इस विषय पर किसी प्रकार का समझौता करने के पक्ष में नहीं है। ट्रंप ने स्पष्ट किया कि ईरान की परमाणु क्षमता को सीमित करना उनकी विदेश नीति की सर्वोच्च प्राथमिकताओं में शामिल है।

राष्ट्रपति ने यह भी दावा किया कि हालिया सैन्य अभियानों में ईरान को भारी नुकसान पहुँचा है। उन्होंने कहा कि ईरान की सैन्य क्षमताएँ पहले की तुलना में काफी कमजोर हो चुकी हैं। हालाँकि,उन्होंने यह भी स्वीकार किया कि तेहरान के पास अभी कुछ सीमित सैन्य क्षमता मौजूद है और इसी कारण अमेरिका पूरी तरह सतर्क बना हुआ है।

ट्रंप के अनुसार,ईरान की नौसेना,वायुसेना और वायु रक्षा प्रणाली को गंभीर नुकसान पहुँचा है। उन्होंने दावा किया कि अमेरिका की कार्रवाई के बाद ईरान की अधिकांश नौसैनिक क्षमता समाप्त हो चुकी है और उसके कई सैन्य संसाधन नष्ट हो गए हैं। हालाँकि,उन्होंने यह भी कहा कि किसी भी प्रतिद्वंद्वी को पूरी तरह कमजोर मानना उचित नहीं होगा,क्योंकि सीमित क्षमता भी कभी-कभी गंभीर चुनौती बन सकती है।

जब पत्रकारों ने पूछा कि क्या अमेरिका ने अपने सैन्य अभियान को और तेज कर दिया है, तो ट्रंप ने कहा कि पहले ही बड़े पैमाने पर कार्रवाई की जा चुकी है। उन्होंने दावा किया कि ईरान की नौसैनिक शक्ति को व्यापक नुकसान पहुँचाया गया और उसके अनेक सैन्य संसाधन नष्ट कर दिए गए। उनके अनुसार,यह अमेरिका की सबसे प्रभावशाली सैन्य कार्रवाइयों में से एक रही है।

हालाँकि,सैन्य दबाव के साथ-साथ अमेरिका ईरान के साथ बातचीत भी जारी रखे हुए है। इसके बावजूद ट्रंप ने तेहरान की विश्वसनीयता पर गंभीर सवाल उठाए। उन्होंने कहा कि बातचीत तभी सफल हो सकती है जब दोनों पक्ष ईमानदारी से आगे बढ़ें। उनके अनुसार, ईरान ने कई बार ऐसे बयान दिए हैं,जो वास्तविक परिस्थितियों से मेल नहीं खाते।

जब उनसे पूछा गया कि क्या अब भी किसी कूटनीतिक समझौते की संभावना है,तो ट्रंप ने कहा कि संभावना पूरी तरह समाप्त नहीं हुई है,लेकिन उनका भरोसा पहले जैसा नहीं रहा। उन्होंने कहा कि ईरानी नेतृत्व पर विश्वास करना कठिन होता जा रहा है,क्योंकि वह कई बार तथ्यों को अलग तरीके से प्रस्तुत करता है। उनके अनुसार,यही कारण है कि अमेरिका केवल बातचीत पर निर्भर रहने के बजाय अन्य विकल्पों को भी तैयार रखे हुए है।

ट्रंप ने दावा किया कि बातचीत के दौरान भी ईरान ने अमेरिकी हितों को निशाना बनाने की कोशिश की। उन्होंने बताया कि उन्हें रक्षा अधिकारियों से सूचना मिली थी कि जॉर्डन में स्थित एक अमेरिकी सैन्य अड्डे की ओर पाँच मिसाइलें दागी गई थीं। उनके अनुसार, अमेरिकी वायु रक्षा प्रणाली ने सभी मिसाइलों को सफलतापूर्वक रोक लिया और किसी प्रकार का नुकसान नहीं होने दिया। उन्होंने कहा कि इस तरह की घटनाएँ यह दिखाती हैं कि बातचीत के साथ-साथ सुरक्षा तैयारियाँ भी उतनी ही जरूरी हैं।

राष्ट्रपति ने ईरान के खिलाफ चल रहे अभियान को हमास के हथियार छोड़ने से जुड़े प्रस्तावित समझौते से भी जोड़ा। उन्होंने कहा कि मध्य पूर्व में हाल के घटनाक्रम यह संकेत देते हैं कि अमेरिका की रणनीति प्रभावी साबित हो रही है। उनके अनुसार,यदि कुछ महीने पहले किसी से पूछा जाता कि हमास के हथियार छोड़ने जैसी स्थिति बनेगी,तो शायद कोई भी इस संभावना पर विश्वास नहीं करता।

ट्रंप ने कहा कि इजराइल के साथ अमेरिका का समन्वय मजबूत बना हुआ है और दोनों देश क्षेत्रीय सुरक्षा को लेकर लगातार सहयोग कर रहे हैं। उन्होंने संकेत दिया कि ईरान पर बढ़ते दबाव का असर क्षेत्र के अन्य संगठनों और समूहों पर भी पड़ा है। उनके अनुसार,यह बदलाव अमेरिका की रणनीति की सफलता को दर्शाता है।

जब उनसे पूछा गया कि क्या आने वाले समय में अमेरिका और ईरान के बीच और टकराव देखने को मिल सकते हैं,तो ट्रंप ने कहा कि इसकी संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता। उन्होंने कहा कि कुछ समय तक तनाव बना रह सकता है,लेकिन उनका मानना है कि लगातार दबाव के कारण ईरान की स्थिति धीरे-धीरे कमजोर होगी। उन्होंने यह भी कहा कि किसी भी परिस्थिति में सतर्क रहना आवश्यक है क्योंकि अंतर्राष्ट्रीय सुरक्षा वातावरण तेजी से बदलता रहता है।

ईरान के अलावा ट्रंप ने रूस और यूक्रेन के बीच जारी युद्ध पर भी अपनी राय रखी। उन्होंने कहा कि अमेरिका यूक्रेन को उन्नत रक्षा प्रणालियों,जिनमें पैट्रियट वायु रक्षा प्रणाली और टॉमहॉक मिसाइल जैसी तकनीकें शामिल हैं,उपलब्ध कराने के विकल्पों पर विचार कर रहा है। हालाँकि,उन्होंने स्पष्ट किया कि ऐसी अत्याधुनिक तकनीक साझा करने का निर्णय अत्यंत सावधानी के साथ लिया जाएगा क्योंकि इसका रणनीतिक महत्व बहुत अधिक है।

रूस-यूक्रेन संघर्ष के बारे में ट्रंप ने कहा कि अंततः इस युद्ध का समाधान केवल बातचीत और समझौते से ही निकल सकता है। उन्होंने कहा कि दोनों पक्षों को किसी न किसी स्तर पर समझौता करना होगा क्योंकि लगातार जारी संघर्ष में बड़ी संख्या में युवा अपनी जान गंवा रहे हैं। उनके अनुसार,हर महीने हजारों सैनिकों और नागरिकों की मौत इस युद्ध को जल्द समाप्त करने की आवश्यकता को और अधिक महत्वपूर्ण बना देती है।

कैंप डेविड में आयोजित कैबिनेट बैठक के दौरान प्रशासन के विभिन्न विभागों ने भी अपनी-अपनी प्राथमिकताओं को सामने रखा। रक्षा,विदेश नीति,स्वास्थ्य सेवा और आर्थिक मुद्दों पर सरकार की रणनीति की समीक्षा की गई। बैठक के बाद ट्रंप ने कहा कि उनकी सरकार राष्ट्रीय सुरक्षा और वैश्विक स्थिरता दोनों को समान महत्व देती है तथा मित्र देशों के साथ सहयोग को आगे बढ़ाने के लिए प्रतिबद्ध है।

ट्रंप लंबे समय से यह कहते रहे हैं कि ईरान को कभी भी परमाणु हथियार विकसित करने की अनुमति नहीं दी जानी चाहिए। उनके प्रशासन की ईरान नीति तीन प्रमुख आधारों पर टिकी हुई बताई जाती है। पहला,कठोर आर्थिक प्रतिबंधों के माध्यम से ईरान पर वित्तीय दबाव बनाए रखना। दूसरा,आवश्यक होने पर सैन्य शक्ति का उपयोग कर उसके रणनीतिक और सैन्य ढाँचे को कमजोर करना। तीसरा,कूटनीतिक बातचीत के जरिए ऐसा समाधान तलाशना जिससे क्षेत्रीय सुरक्षा सुनिश्चित हो सके।

इसी नीति के तहत अमेरिकी प्रशासन ने ईरान के सैन्य और वित्तीय नेटवर्क पर लगातार प्रतिबंध लगाए हैं। साथ ही उसने मध्य पूर्व में अपने सहयोगी देशों,विशेष रूप से इजराइल, के साथ सुरक्षा सहयोग को भी मजबूत किया है। ट्रंप प्रशासन का मानना है कि क्षेत्रीय साझेदारों के साथ मिलकर काम करने से न केवल ईरान पर दबाव बढ़ाया जा सकता है, बल्कि व्यापक क्षेत्रीय सुरक्षा व्यवस्था को भी मजबूत किया जा सकता है।

विश्लेषकों का मानना है कि ट्रंप के हालिया बयान से यह स्पष्ट संकेत मिलता है कि अमेरिका फिलहाल ईरान के प्रति अपनी सख्त नीति में किसी प्रकार की नरमी लाने के मूड में नहीं है। हालाँकि,कूटनीतिक बातचीत जारी रहने की संभावना बनी हुई है,लेकिन उसके साथ-साथ सैन्य और आर्थिक दबाव भी अमेरिकी रणनीति का महत्वपूर्ण हिस्सा बना रहेगा। आने वाले समय में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि क्या दोनों देशों के बीच बातचीत किसी ठोस समझौते तक पहुँचती है या फिर तनाव और अधिक बढ़ता है। फिलहाल इतना स्पष्ट है कि अमेरिका ने ईरान को लेकर अपनी नीति में सुरक्षा,दबाव और कूटनीति—तीनों को समान रूप से आगे बढ़ाने का फैसला किया है और इसी रणनीति के तहत भविष्य की दिशा तय की जाएगी।