शशि थरूर और राहुल गांधी (तस्वीर क्रेडिट@ToolsTech4All)

केरल चुनाव से पहले कांग्रेस में फिर उभरी खींचतान,हाईकमान बैठक से शशि थरूर की दूरी ने बढ़ाई सियासी हलचल

तिरुवनंतपुरम,23 जनवरी (युआईटीवी)- केरल विधानसभा चुनावों की तैयारियों के बीच कांग्रेस पार्टी के भीतर एक बार फिर असहजता के संकेत सामने आए हैं। कांग्रेस हाईकमान द्वारा केरल चुनावों को लेकर बुलाई गई एक अहम बैठक में पार्टी के वरिष्ठ सांसद और पूर्व केंद्रीय मंत्री शशि थरूर के शामिल न होने की खबर ने राजनीतिक गलियारों में चर्चा तेज कर दी है। सूत्रों के अनुसार,थरूर हाल ही में कोच्चि में आयोजित कांग्रेस की महापंचायत के दौरान हुए घटनाक्रम से नाराज हैं और इसे उन्होंने अपने अपमान के तौर पर देखा है। इसी नाराजगी के चलते वे हाईकमान की इस महत्वपूर्ण बैठक से दूरी बनाए हुए हैं।

सूत्रों का कहना है कि कोच्चि महापंचायत के दौरान शशि थरूर को बैठने की व्यवस्था को लेकर आपत्ति थी। थरूर का मानना है कि कार्यक्रम में उनके साथ प्रोटोकॉल के अनुरूप व्यवहार नहीं किया गया। बताया जा रहा है कि उन्हें मंच पर बैठने को लेकर असहज स्थिति का सामना करना पड़ा,जिसे वे अपनी वरिष्ठता और पार्टी में भूमिका के हिसाब से उचित नहीं मानते। इस घटना ने उनके मन में गहरी नाराजगी पैदा कर दी।

इतना ही नहीं,कार्यक्रम से पहले थरूर को यह भी निर्देश दिए गए थे कि वे तय समय से लगभग 15 मिनट पहले कार्यक्रम स्थल पर पहुँचें और अपना भाषण अपेक्षाकृत जल्दी समाप्त करें। उन्हें यह जानकारी दी गई थी कि उनके संबोधन के बाद केवल राहुल गांधी ही मंच से बोलेंगे,लेकिन कार्यक्रम के दौरान स्थिति पूरी तरह बदल गई। राहुल गांधी के बाद छह अन्य नेताओं ने भी भाषण दिए,जिनमें से कुछ नेता पार्टी के भीतर प्रोटोकॉल और वरिष्ठता के लिहाज से शशि थरूर से कनिष्ठ बताए जा रहे हैं। इस घटनाक्रम ने थरूर की नाराजगी को और बढ़ा दिया।

सूत्रों के मुताबिक,थरूर को इस बात से भी गहरी आपत्ति हुई कि राहुल गांधी ने अपने भाषण के दौरान उनका नाम तक नहीं लिया। थरूर इसे पार्टी नेतृत्व द्वारा उन्हें नजरअंदाज किए जाने के संकेत के रूप में देख रहे हैं। कांग्रेस जैसे बड़े संगठन में सार्वजनिक मंचों पर नेताओं का उल्लेख और सम्मान पार्टी के भीतर संदेश देने का अहम माध्यम माना जाता है और ऐसे में राहुल गांधी द्वारा नाम न लिए जाने को थरूर ने व्यक्तिगत और राजनीतिक दोनों स्तरों पर अपमानजनक माना है।

यह पहला मौका नहीं है,जब शशि थरूर और कांग्रेस की केरल राज्य इकाई के नेतृत्व के बीच मतभेद सामने आए हों। इससे पहले भी कई अवसरों पर थरूर और राज्य नेतृत्व के बीच रणनीति,नेतृत्व शैली और सार्वजनिक बयानों को लेकर असहमति की खबरें आती रही हैं। हालाँकि,हाल ही में वायनाड में हुई कांग्रेस की एक अहम नेतृत्व बैठक के दौरान इन मतभेदों को सुलझाने की कोशिश की गई थी। उस बैठक के बाद पार्टी नेताओं और खुद शशि थरूर की ओर से सार्वजनिक तौर पर कहा गया था कि कांग्रेस में कोई आंतरिक विवाद नहीं है और सभी नेता एकजुट होकर काम करेंगे।

वायनाड बैठक के बाद थरूर ने यह भी स्पष्ट किया था कि वे केरल कांग्रेस के राज्य नेतृत्व के साथ मिलकर काम करने के लिए तैयार हैं और पार्टी की चुनावी रणनीति को मजबूत करने में अपनी भूमिका निभाएँगे,लेकिन कोच्चि महापंचायत में हुए ताजा घटनाक्रम ने उन दावों पर एक बार फिर सवाल खड़े कर दिए हैं। हाईकमान की बैठक से थरूर की गैरमौजूदगी को अब उसी असंतोष की अगली कड़ी के रूप में देखा जा रहा है।

इस बीच,राजनीतिक हलचल के बीच शशि थरूर शुक्रवार को कोझिकोड में आयोजित केरल लिटरेचर फेस्टिवल में हिस्सा लेने वाले हैं। साहित्यिक मंच पर उनकी मौजूदगी को लेकर उनके समर्थकों का कहना है कि थरूर अपनी बौद्धिक और सार्वजनिक छवि को लेकर हमेशा सक्रिय रहे हैं,लेकिन पार्टी की बैठक से दूरी उनके राजनीतिक असंतोष को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह दूरी कांग्रेस के लिए केरल जैसे अहम राज्य में एक असहज स्थिति पैदा कर सकती है।

केरल में कांग्रेस पहले से ही मजबूत विपक्ष के तौर पर अपनी रणनीति को धार देने की कोशिश कर रही है। ऐसे में शशि थरूर जैसे राष्ट्रीय स्तर के नेता की नाराजगी और उनकी बैठक से अनुपस्थिति पार्टी के भीतर एकता के दावों को कमजोर कर सकती है। हालाँकि,कांग्रेस नेतृत्व की ओर से फिलहाल इस पूरे मामले पर कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है। न तो थरूर की नाराजगी को लेकर और न ही उनकी बैठक से गैरहाजिरी को लेकर पार्टी की तरफ से कोई बयान जारी किया गया है।

फिलहाल,शशि थरूर की चुप्पी और कांग्रेस हाईकमान की खामोशी के बीच यह सवाल बना हुआ है कि क्या यह नाराजगी अस्थायी है या केरल कांग्रेस की आंतरिक राजनीति में एक बड़े सियासी बदलाव का संकेत है। आने वाले दिनों में यह साफ होगा कि पार्टी नेतृत्व इस असंतोष को कैसे सँभालता है और क्या थरूर को मनाने की कोई ठोस कोशिश की जाती है या फिर यह मामला कांग्रेस के लिए एक नई चुनौती बनकर उभरेगा।