नई दिल्ली,5 नवंबर (युआईटीवी)- वैश्विक कच्चे तेल बाजार में गुरुवार को लगातार चौथे कारोबारी सत्र में गिरावट जारी रही। अंतर्राष्ट्रीय बाजार में ब्रेंट क्रूड की कीमत 94 डॉलर प्रति बैरल से नीचे फिसल गई, जबकि अमेरिकी वेस्ट टेक्सास इंटरमीडिएट (डब्ल्यूटीआई) भी 87 डॉलर प्रति बैरल के स्तर से नीचे पहुँच गया। तेल की कीमतों में इस तेज गिरावट के पीछे अमेरिका के मध्यावधि चुनावों के नतीजे और ईरान के साथ जारी तनाव कम होने की उम्मीदों को प्रमुख वजह माना जा रहा है। निवेशकों को आशंका है कि अमेरिकी राजनीति में आए बदलाव के बाद राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के लिए ईरान के खिलाफ आक्रामक सैन्य कार्रवाई करना आसान नहीं होगा। इससे पश्चिम एशिया में तनाव कम होने और वैश्विक तेल आपूर्ति सामान्य होने की उम्मीद बढ़ी है।
दूसरी ओर, भारतीय मुद्रा रुपये के लिए लगातार पाँचवाँ कारोबारी सत्र मजबूती लेकर आया। बुधवार को डॉलर के मुकाबले 94.64 के स्तर पर बंद होने के बाद गुरुवार को रुपया 29 पैसे की बढ़त के साथ 94.35 प्रति डॉलर पर खुला। अंतर्राष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में गिरावट को रुपये के लिए सकारात्मक संकेत माना जा रहा है,क्योंकि भारत अपनी जरूरत का बड़ा हिस्सा विदेशों से आयात करता है। ऐसे में तेल सस्ता होने से देश के आयात बिल और विदेशी मुद्रा पर पड़ने वाले दबाव में कमी आने की संभावना रहती है।
गुरुवार को कारोबार के दौरान ब्रेंट क्रूड करीब एक प्रतिशत गिरकर 93.65 डॉलर प्रति बैरल पर पहुँच गया। वहीं,अमेरिकी डब्ल्यूटीआई क्रूड की कीमत में 1.36 प्रतिशत की गिरावट दर्ज की गई और यह 86.92 डॉलर प्रति बैरल पर कारोबार करता दिखाई दिया। इससे पहले बुधवार को भी दोनों प्रमुख बेंचमार्क में आठ प्रतिशत से अधिक की भारी गिरावट आई थी। इस गिरावट के बाद ब्रेंट और डब्ल्यूटीआई अगस्त के अंत के बाद अपने सबसे निचले स्तर पर बंद हुए थे।
इस सप्ताह अब तक कच्चे तेल की कीमतों में करीब 16 प्रतिशत की गिरावट आ चुकी है। हाल के वर्षों में किसी एक सप्ताह के दौरान दर्ज की गई यह सबसे तेज गिरावटों में शामिल मानी जा रही है। लगातार चार कारोबारी सत्रों से जारी बिकवाली ने अंतर्राष्ट्रीय ऊर्जा बाजार में हलचल बढ़ा दी है। बाजार विशेषज्ञों के अनुसार,पहले पश्चिम एशिया में सैन्य संघर्ष की आशंका के कारण तेल की कीमतों में जोखिम प्रीमियम बढ़ गया था। अब तनाव कम होने की उम्मीदों ने इस प्रीमियम को घटा दिया है।
तेल की कीमतों में गिरावट की एक बड़ी वजह अमेरिका के मध्यावधि चुनावों के नतीजों को माना जा रहा है। चुनाव में डेमोक्रेटिक पार्टी की बड़ी जीत के बाद अमेरिकी कांग्रेस के दोनों सदनों में राजनीतिक समीकरण बदलने की उम्मीद है। निवेशकों का मानना है कि इससे राष्ट्रपति ट्रंप के लिए ईरान के खिलाफ बड़े सैन्य अभियान को आगे बढ़ाना पहले की तुलना में कठिन हो सकता है।
दरअसल,पश्चिम एशिया में तनाव बढ़ने के दौरान निवेशकों को आशंका थी कि ईरान के खिलाफ सैन्य कार्रवाई से तेल उत्पादन और परिवहन प्रभावित हो सकता है। खासतौर पर होर्मुज जलडमरूमध्य को लेकर चिंता बनी हुई थी। दुनिया के तेल व्यापार का एक बड़ा हिस्सा इसी समुद्री रास्ते से गुजरता है। यदि यहाँ आवाजाही बाधित होती है, तो अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की आपूर्ति प्रभावित हो सकती है।
हालाँकि,अमेरिकी चुनावों के बाद राजनीतिक दबाव बढ़ने और कूटनीतिक समाधान की संभावनाओं ने बाजार की धारणा बदल दी है। निवेशक अब इस संभावना पर दांव लगा रहे हैं कि अमेरिका और ईरान के बीच तनाव कम करने के लिए बातचीत का रास्ता अपनाया जा सकता है।
रिपोर्ट्स के अनुसार,खाड़ी देशों के सरकारी हलकों से जुड़े सूत्रों का मानना है कि ईरान पर बड़े पैमाने पर सैन्य हमले की संभावना पहले के मुकाबले कम हो गई है। राष्ट्रपति ट्रंप ने भी संकेत दिया है कि फिलहाल अमेरिका की ओर से ईरान पर तत्काल हमला करने की कोई योजना नहीं है।
इसके अलावा,अमेरिकी उपराष्ट्रपति जेडी वेंस ने भी युद्ध की उपयोगिता को लेकर सवाल उठाए हैं। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि मध्यावधि चुनावों के नतीजों के बाद अमेरिकी प्रशासन पर कूटनीतिक समाधान तलाशने का दबाव बढ़ सकता है। इससे पश्चिम एशिया में संघर्ष के और अधिक गंभीर होने की आशंका कम हुई है।
बाजार में निवेशकों की प्रतिक्रिया भी इसी बदलाव को दर्शा रही है। पहले संभावित सैन्य टकराव के कारण कच्चे तेल की कीमतों में तेजी आई थी,लेकिन अब तनाव कम होने की उम्मीदों के चलते निवेशक तेल की खरीदारी से दूरी बना रहे हैं। इसका सीधा असर अंतरराष्ट्रीय बाजार में कीमतों पर दिखाई दे रहा है।
कच्चे तेल की कीमतों में गिरावट के पीछे आपूर्ति की स्थिति में सुधार भी एक महत्वपूर्ण कारण है। होर्मुज जलडमरूमध्य से तेल की आवाजाही अब युद्ध से पहले के स्तरों के करीब पहुँचने लगी है। इससे वैश्विक बाजार में तेल की कमी होने की आशंका कम हुई है।
होर्मुज जलडमरूमध्य फारस की खाड़ी को अरब सागर से जोड़ने वाला महत्वपूर्ण समुद्री मार्ग है। सऊदी अरब, इराक, संयुक्त अरब अमीरात, कुवैत और अन्य खाड़ी देशों से बड़ी मात्रा में तेल इसी रास्ते से अंतर्राष्ट्रीय बाजारों तक पहुँचता है। इस क्षेत्र में तनाव बढ़ने पर तेल की आपूर्ति बाधित होने का खतरा पैदा हो जाता है।
अब आपूर्ति बहाल होने के संकेत मिलने से बाजार में राहत देखी जा रही है। रिपोर्ट्स के मुताबिक, खाड़ी क्षेत्र से तेल की आपूर्ति सामान्य होने के बाद वैश्विक बाजार एक बार फिर अतिरिक्त आपूर्ति यानी सरप्लस की स्थिति में पहुँच रहा है।
एक बैंक के अनुमान के अनुसार, सितंबर में वैश्विक तेल बाजार में प्रतिदिन करीब 11 लाख बैरल अतिरिक्त आपूर्ति रही, जबकि अक्टूबर में यह बढ़कर लगभग 14 लाख बैरल प्रतिदिन हो गई। माँग की तुलना में आपूर्ति अधिक होने से कीमतों पर दबाव बढ़ना स्वाभाविक है। यही वजह है कि भू-राजनीतिक तनाव कम होने के साथ-साथ आपूर्ति में सुधार ने भी तेल की कीमतों को नीचे लाने में भूमिका निभाई है।
हालाँकि,ऊर्जा विशेषज्ञ मौजूदा गिरावट को स्थायी मानने से बचने की सलाह दे रहे हैं। उनका कहना है कि पश्चिम एशिया के भू-राजनीतिक हालात बेहद संवेदनशील हैं और इनमें कभी भी बदलाव हो सकता है। इसके अलावा,अमेरिकी कांग्रेस की नई संरचना जनवरी से प्रभावी होगी। इसलिए चुनावी नतीजों के तुरंत बाद अमेरिकी नीतियों में बड़े बदलाव की उम्मीद करना जल्दबाजी होगी।
विशेषज्ञों के मुताबिक,वैश्विक तेल बाजार के सामने कुछ ऐसे जोखिम भी मौजूद हैं, जो कीमतों को दोबारा ऊपर ले जा सकते हैं। प्रमुख तेल उपभोक्ता देशों के वाणिज्यिक भंडार पिछले 15 वर्षों के निचले स्तर के करीब बताए जा रहे हैं। यदि माँग में तेजी आती है और आपूर्ति उसी अनुपात में नहीं बढ़ती, तो कीमतों में फिर उछाल देखने को मिल सकता है।
अमेरिका के ऊर्जा भंडार से जुड़े आँकड़े भी बाजार के लिए महत्वपूर्ण हैं। पिछले सप्ताह अमेरिका में कच्चे तेल, पेट्रोल और डिस्टिलेट के भंडार में गिरावट दर्ज की गई। इसके साथ ही वहाँ तेल की माँग एक साल के उच्च स्तर पर पहुँच गई। इससे संकेत मिलता है कि दुनिया की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में से एक में ईंधन की खपत मजबूत बनी हुई है।
अंतर्राष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में गिरावट भारत के लिए आर्थिक रूप से महत्वपूर्ण है। भारत अपनी पेट्रोलियम जरूरतों का बड़ा हिस्सा आयात के माध्यम से पूरा करता है। ऐसे में कच्चे तेल के दाम कम होने से देश के आयात बिल में कमी आ सकती है। इससे चालू खाते के घाटे और विदेशी मुद्रा भंडार पर पड़ने वाला दबाव भी कम होने की संभावना रहती है।
तेल सस्ता रहने से रुपये को भी समर्थन मिल सकता है। गुरुवार को डॉलर के मुकाबले रुपये में लगातार पाँचवें सत्र मजबूती दर्ज की गई और यह 94.35 प्रति डॉलर पर खुला। हालाँकि,रुपये की चाल पर केवल कच्चे तेल की कीमतों का असर नहीं पड़ता,बल्कि डॉलर की वैश्विक स्थिति,विदेशी निवेशकों की गतिविधियाँ और घरेलू आर्थिक परिस्थितियाँ भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं।
कच्चे तेल की कीमतों में लगातार गिरावट से भारत में पेट्रोल और डीजल की कीमतों को लेकर भी उम्मीदें बढ़ सकती हैं। हालाँकि,अंतर्राष्ट्रीय बाजार में कच्चा तेल सस्ता होने का असर घरेलू ईंधन की खुदरा कीमतों पर तत्काल और उसी अनुपात में दिखाई देना जरूरी नहीं है। इसके लिए आयात लागत, रुपये की विनिमय दर,कर और अन्य खर्चों को भी ध्यान में रखना पड़ता है।
फिलहाल वैश्विक तेल बाजार में निवेशकों की नजर अमेरिका-ईरान संबंधों,होर्मुज जलडमरूमध्य से आपूर्ति और प्रमुख देशों के तेल भंडार पर बनी हुई है। यदि पश्चिम एशिया में तनाव कम रहता है और अतिरिक्त आपूर्ति जारी रहती है,तो कीमतों पर दबाव बना रह सकता है। लेकिन भू-राजनीतिक परिस्थितियों में अचानक बदलाव या माँग में तेज वृद्धि से बाजार का रुख फिर बदल सकता है। ऐसे में आने वाले कारोबारी सत्रों में कच्चे तेल की कीमतों की दिशा काफी हद तक इन कारकों पर निर्भर करेगी।
