ओस्लो/पेरिस,28 मई (युआईटीवी)- यूरोप की बदलती सुरक्षा परिस्थितियों के बीच नॉर्वे ने एक बड़ा रणनीतिक फैसला लिया है। नॉर्वे के प्रधानमंत्री जोनास गहर स्टोरे ने घोषणा की है कि उनका देश फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों की परमाणु निवारण पहल में शामिल होगा। हालाँकि,उन्होंने यह भी साफ कर दिया कि इस निर्णय का मतलब यह नहीं है कि नॉर्वे अपनी पुरानी परमाणु नीति में बदलाव कर रहा है। उन्होंने कहा कि नॉर्वे अब भी शांति काल में अपने क्षेत्र में परमाणु हथियारों की तैनाती की अनुमति नहीं देगा और न ही फ्रांस के परमाणु हथियार कार्यक्रम को आर्थिक सहायता प्रदान करेगा।
जोनास गहर स्टोरे बुधवार को फ्रांस की राजधानी पेरिस पहुँचे,जहाँ उन्होंने राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों के साथ यूरोप की सुरक्षा,रक्षा सहयोग और क्षेत्रीय चुनौतियों पर चर्चा की। बातचीत के बाद नॉर्वे की मीडिया से बात करते हुए स्टोरे ने कहा कि वर्तमान वैश्विक हालात और यूरोप में बढ़ती सुरक्षा चिंताओं को देखते हुए यह फैसला लिया गया है। उन्होंने कहा कि यूरोप को अब अपनी सुरक्षा की जिम्मेदारी पहले से अधिक उठानी होगी और इसके लिए सहयोगी देशों के बीच सामूहिक रणनीति जरूरी है।
स्टोरे ने दोहराया कि नॉर्वे की परमाणु नीति में कोई बदलाव नहीं किया जा रहा है। उन्होंने कहा कि नॉर्वे की लंबे समय से यह नीति रही है कि शांति काल में उसके क्षेत्र में परमाणु हथियारों की तैनाती नहीं होगी। उन्होंने स्पष्ट किया कि फ्रांस की परमाणु निवारण पहल में शामिल होने का उद्देश्य यूरोप की सामूहिक सुरक्षा को मजबूत करना है,न कि परमाणु हथियारों की होड़ को बढ़ावा देना।
दरअसल मार्च महीने में फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों ने अपने देश के परमाणु शस्त्रागार को मजबूत करने और परमाणु हथियारों की संख्या बढ़ाने की योजना का ऐलान किया था। उन्होंने यह भी कहा था कि फ्रांस अपनी परमाणु प्रतिरोधक क्षमता को केवल राष्ट्रीय सुरक्षा तक सीमित नहीं रखना चाहता,बल्कि उसे पूरे यूरोप की सामूहिक सुरक्षा रणनीति का हिस्सा बनाना चाहता है। फ्रांस का मानना है कि यूरोप को अपनी सुरक्षा के लिए अमेरिका पर पूरी तरह निर्भर रहने के बजाय खुद मजबूत रक्षा ढाँचा तैयार करना चाहिए।
यूरोप में जारी भू-राजनीतिक तनाव और रूस-यूक्रेन संघर्ष के बाद से यूरोपीय देशों के बीच सुरक्षा और रक्षा सहयोग को लेकर चर्चाएँ तेज हुई हैं। ऐसे माहौल में फ्रांस की यह पहल काफी महत्वपूर्ण मानी जा रही है। नॉर्वे के इस फैसले को भी उसी दिशा में एक अहम कदम माना जा रहा है।
फ्रांस की परमाणु निवारण पहल में अब तक कई यूरोपीय देशों ने रुचि दिखाई है। इनमें स्वीडन,ब्रिटेन,जर्मनी,पोलैंड,नीदरलैंड,बेल्जियम,ग्रीस और डेनमार्क जैसे देश शामिल हैं। इन देशों का मानना है कि यूरोप को भविष्य की सुरक्षा चुनौतियों से निपटने के लिए अधिक संगठित और आत्मनिर्भर रक्षा व्यवस्था की जरूरत है।
नॉर्वे और फ्रांस के बीच बुधवार को पेरिस में एक नए रक्षा समझौते पर भी हस्ताक्षर किए गए। इस समझौते के तहत दोनों देश जरूरत पड़ने पर एक-दूसरे को सैन्य सहायता उपलब्ध कराएंगे। विशेषज्ञों के अनुसार यह समझौता यूरोप में बढ़ते सामरिक सहयोग का संकेत है और आने वाले समय में क्षेत्रीय सुरक्षा ढांचे को और मजबूत कर सकता है।
इसी बीच एक समाचार वेबसाइट ओनेट की रिपोर्ट में दावा किया गया कि पिछले महीने फ्रांस और पोलैंड के बीच भी संयुक्त सैन्य अभ्यास को लेकर बातचीत हुई थी। बताया गया कि फ्रांस चाहता है कि उसके यूरोपीय सहयोगी देश परमाणु निवारण ढाँचे में सक्रिय भागीदारी निभाएँ। अप्रैल में पोलैंड के शहर ग्दान्स्क में हुई बैठक के दौरान राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों और पोलैंड के प्रधानमंत्री डोनाल्ड टस्क ने इस विषय पर विस्तार से चर्चा की थी।
बैठक के दौरान दोनों नेताओं ने केवल रक्षा सहयोग ही नहीं बल्कि व्यापार,निवेश और आर्थिक साझेदारी को बढ़ाने पर भी विचार किया। यूरोप में मौजूदा परिस्थितियों को देखते हुए रक्षा क्षेत्र में सहयोग बढ़ाना दोनों देशों की प्राथमिकता बनता जा रहा है।
संयुक्त प्रेस कॉन्फ्रेंस में जब मैक्रों से परमाणु सहयोग को लेकर सवाल पूछा गया तो उन्होंने कहा कि जिन विकल्पों पर विचार किया जा रहा है, उनमें सूचना साझा करना,संयुक्त सैन्य अभ्यास और सैन्य बलों की संभावित तैनाती जैसे कदम शामिल हैं। उन्होंने कहा कि यूरोप की सामूहिक सुरक्षा को मजबूत करने के लिए सहयोगी देशों के बीच भरोसे और तालमेल की जरूरत है।
पोलैंड के प्रधानमंत्री डोनाल्ड टस्क ने भी कहा था कि परमाणु सुरक्षा सहयोग को लेकर बातचीत गोपनीय रूप से जारी है। उन्होंने माना कि फ्रांस का निमंत्रण स्वीकार करना पोलैंड के लिए रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण है। टस्क के अनुसार,यह उन देशों के समूह का हिस्सा बनने जैसा है,जो यूरोपीय एकजुटता और संप्रभुता की आवश्यकता को समझते हैं।
विशेषज्ञों का मानना है कि यूरोप की सुरक्षा नीति में यह बदलाव आने वाले वर्षों में वैश्विक राजनीति पर भी असर डाल सकता है। अब तक यूरोप की सुरक्षा काफी हद तक अमेरिका और नाटो की सैन्य शक्ति पर निर्भर रही है,लेकिन मौजूदा परिस्थितियों में कई यूरोपीय देश अपनी स्वतंत्र रक्षा क्षमता को मजबूत करने की दिशा में आगे बढ़ रहे हैं।
नॉर्वे का फ्रांस की परमाणु पहल में शामिल होना इस बात का संकेत माना जा रहा है कि यूरोप अब सामूहिक सुरक्षा के नए मॉडल की ओर बढ़ रहा है। हालाँकि,नॉर्वे ने साफ कर दिया है कि वह अपनी मूल परमाणु नीति से पीछे नहीं हटेगा,लेकिन यूरोपीय सुरक्षा ढाँचे में उसकी भागीदारी आने वाले समय में और मजबूत हो सकती है।
फिलहाल यूरोप में बढ़ती सुरक्षा चिंताओं के बीच फ्रांस की पहल को लेकर लगातार चर्चाएँ हो रही हैं। आने वाले महीनों में यह साफ हो सकेगा कि कितने देश इस रणनीति में सक्रिय रूप से शामिल होते हैं और यूरोप अपनी सामूहिक सुरक्षा व्यवस्था को किस दिशा में आगे बढ़ाता है।
