फ्रेंच ओपन 2026 से पहले पुरस्कार राशि बँटवारे पर टेनिस जगत में बवाल (तस्वीर क्रेडिट@rashtra_press)

फ्रेंच ओपन 2026 से पहले टेनिस जगत में बवाल,पुरस्कार राशि के बँटवारे पर खिलाड़ियों की नाराजगी

नई दिल्ली,5 मई (युआईटीवी)- फ्रेंच ओपन 2026 के शुरू होने से पहले टेनिस जगत में एक बड़ा विवाद खड़ा हो गया है। दुनिया के शीर्ष खिलाड़ी जैनिक सिनर,आर्यना सबलेंका और कोको गॉफ सहित कई दिग्गजों ने ग्रैंड स्लैम टूर्नामेंट में पुरस्कार राशि के बँटवारे को लेकर गंभीर चिंता जताई है। खिलाड़ियों का कहना है कि टूर्नामेंट की बढ़ती कमाई के मुकाबले उन्हें मिलने वाला हिस्सा लगातार कम होता जा रहा है,जो न केवल असंतुलित है बल्कि उनके योगदान के साथ भी न्याय नहीं करता।

इस विवाद के बीच टूर्नामेंट आयोजकों ने रोलैंड गैरोस 2026 के लिए कुल पुरस्कार राशि में 10 प्रतिशत की बढ़ोतरी की घोषणा की है। इसके बाद कुल पुरस्कार राशि बढ़कर 6.17 करोड़ यूरो हो गई है,जो कि पिछले वर्षों की तुलना में अधिक है। हालाँकि,खिलाड़ियों का मानना है कि यह बढ़ोतरी केवल दिखावटी है और असल समस्या का समाधान नहीं करती। उनका कहना है कि जब टूर्नामेंट की कुल कमाई तेजी से बढ़ रही है,तब पुरस्कार राशि में इतनी सीमित बढ़ोतरी स्वीकार्य नहीं है।

खिलाड़ियों ने अपने संयुक्त बयान में स्पष्ट किया कि रोलैंड गैरोस ने वर्ष 2025 में लगभग 395 मिलियन यूरो की कमाई की थी,जो पिछले वर्ष की तुलना में 14 प्रतिशत अधिक थी। इसके बावजूद पुरस्कार राशि में केवल 5.4 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई,जिससे खिलाड़ियों का हिस्सा घटकर लगभग 14.3 प्रतिशत रह गया। यह आँकड़ा खिलाड़ियों के लिए चिंता का विषय बन गया है,क्योंकि यह उनके प्रदर्शन और मेहनत के अनुपात में काफी कम है।

खिलाड़ियों का यह भी कहना है कि इस वर्ष टूर्नामेंट की कुल कमाई 400 मिलियन यूरो से अधिक होने की संभावना है,लेकिन इसके बावजूद पुरस्कार राशि का हिस्सा कुल राजस्व के 15 प्रतिशत से भी कम रहेगा। उन्होंने इस स्थिति को असंतुलित बताते हुए कहा कि यह उस 22 प्रतिशत हिस्सेदारी से काफी नीचे है,जिसकी माँग वे लंबे समय से कर रहे हैं। उनका तर्क है कि एटीपी और डब्ल्यूटीए के संयुक्त 1000 स्तर के टूर्नामेंट्स में खिलाड़ियों को अधिक न्यायसंगत हिस्सा मिलता है,जबकि ग्रैंड स्लैम जैसे बड़े मंच पर यह अंतर और अधिक दिखाई देता है।

इस पूरे विवाद में खिलाड़ियों ने सिर्फ पुरस्कार राशि ही नहीं,बल्कि खेल के प्रशासन और निर्णय लेने की प्रक्रिया पर भी सवाल उठाए हैं। उनका कहना है कि पिछले एक साल से वे लगातार अपनी चिंताओं को सामने रख रहे हैं,लेकिन अब तक कोई ठोस कदम नहीं उठाया गया है। विशेष रूप से खिलाड़ियों की भलाई,स्वास्थ्य और कार्य परिस्थितियों जैसे मुद्दों पर कोई गंभीर चर्चा नहीं हुई है,जो कि खेल के भविष्य के लिए चिंता का विषय है।

खिलाड़ियों ने यह भी आरोप लगाया कि ग्रैंड स्लैम टूर्नामेंट्स के फैसलों में खिलाड़ियों की भागीदारी लगभग नगण्य है। उनका कहना है कि ऐसी कोई औपचारिक व्यवस्था नहीं है,जिसमें खिलाड़ियों की राय को व्यवस्थित रूप से शामिल किया जाए। इससे निर्णय लेने की प्रक्रिया एकतरफा हो जाती है,जिसका असर सीधे खिलाड़ियों पर पड़ता है।

फ्रेंच ओपन,जिसे रोलैंड गैरोस के नाम से भी जाना जाता है,24 मई से पेरिस में शुरू होने जा रहा है। इस प्रतिष्ठित टूर्नामेंट में सिंगल्स विजेता को 2.8 मिलियन यूरो की पुरस्कार राशि मिलेगी,जबकि उपविजेता को 1.4 मिलियन यूरो दिए जाएँगे। सेमीफाइनल में पहुँचने वाले खिलाड़ियों को 7,50,000 यूरो मिलेंगे और पहले राउंड में हारने वाले खिलाड़ियों को 87,000 यूरो की राशि दी जाएगी। डबल्स विजेताओं को 6,00,000 यूरो और मिक्स्ड डबल्स विजेताओं को 1,22,000 यूरो मिलेंगे।

हालाँकि,ये रकम सुनने में बड़ी लगती हैं,लेकिन खिलाड़ियों का कहना है कि जब इन्हें टूर्नामेंट की कुल कमाई के संदर्भ में देखा जाता है,तो तस्वीर बिल्कुल अलग नजर आती है। उनका तर्क है कि टूर्नामेंट की आय और खिलाड़ियों की कमाई के बीच का अंतर लगातार बढ़ता जा रहा है,जो लंबे समय में असंतोष का कारण बन सकता है।

इस मुद्दे पर खिलाड़ियों का एक बड़ा समूह एकजुट नजर आ रहा है। उन्होंने स्पष्ट किया है कि वे न केवल पुरस्कार राशि के बेहतर बँटवारे की माँग कर रहे हैं,बल्कि खेल के प्रशासन में भी सुधार चाहते हैं। उनका मानना है कि यदि खिलाड़ियों को निर्णय प्रक्रिया में उचित प्रतिनिधित्व दिया जाए,तो कई समस्याओं का समाधान आसानी से किया जा सकता है।

इस विवाद के बीच एक दिलचस्प पहलू यह भी है कि टेनिस के दिग्गज नोवाक जोकोविच इस बार जारी किए गए बयान पर हस्ताक्षर करने वालों में शामिल नहीं थे। इससे यह संकेत मिलता है कि खिलाड़ियों के बीच इस मुद्दे पर पूरी तरह एकमत नहीं है,हालाँकि,अधिकांश शीर्ष खिलाड़ी इस मुद्दे पर एकजुट दिखाई दे रहे हैं।

विशेषज्ञों का मानना है कि यह विवाद केवल टेनिस तक सीमित नहीं है,बल्कि यह पूरे खेल उद्योग में आर्थिक असंतुलन की ओर इशारा करता है। जैसे-जैसे खेलों की व्यावसायिकता बढ़ रही है,वैसे-वैसे खिलाड़ियों और आयोजकों के बीच राजस्व के बँटवारे को लेकर सवाल भी उठ रहे हैं। ऐसे में यह जरूरी हो जाता है कि सभी पक्ष मिलकर एक संतुलित और न्यायसंगत समाधान निकालें।

फिलहाल,फ्रेंच ओपन के आयोजन की तैयारियाँ जोरों पर हैं,लेकिन इस विवाद ने टूर्नामेंट की चमक को कुछ हद तक फीका कर दिया है। आने वाले दिनों में यह देखना दिलचस्प होगा कि क्या आयोजक और खिलाड़ी इस मुद्दे पर किसी सहमति तक पहुँच पाते हैं या यह विवाद और गहराता है।

यह मामला टेनिस जगत के लिए एक महत्वपूर्ण मोड़ साबित हो सकता है। यदि खिलाड़ियों की माँगों पर गंभीरता से विचार किया जाता है,तो इससे खेल के भविष्य को एक नई दिशा मिल सकती है। वहीं,यदि इस मुद्दे को नजरअंदाज किया गया,तो यह असंतोष आगे चलकर और बड़े विवाद का रूप ले सकता है।