कोलकाता,16 मई (युआईटीवी)- पश्चिम बंगाल की राजनीति में एक नया विवाद खड़ा हो गया है। अभिषेक बनर्जी के खिलाफ बिधाननगर कमिश्नरेट की साइबर क्राइम पुलिस ने कई गंभीर धाराओं के तहत एफआईआर दर्ज की है। यह मामला चुनाव प्रचार के दौरान दिए गए कथित भड़काऊ बयानों से जुड़ा हुआ है। पुलिस सूत्रों के अनुसार,अभिषेक बनर्जी पर भारतीय न्याय संहिता की कई धाराएँ लगाई गई हैं,जिनमें कुछ गैर-जमानती भी शामिल हैं। इस घटनाक्रम ने राज्य की राजनीति में हलचल तेज कर दी है और सत्ता पक्ष तथा विपक्ष के बीच आरोप-प्रत्यारोप का दौर शुरू हो गया है।
जानकारी के मुताबिक,यह एफआईआर चुनाव परिणाम घोषित होने के अगले दिन दर्ज की गई। शिकायत एक सामाजिक कार्यकर्ता राजीव सरकार की ओर से की गई थी। शिकायत में आरोप लगाया गया कि चुनाव प्रचार के दौरान अभिषेक बनर्जी ने कई सार्वजनिक सभाओं और रैलियों में ऐसे बयान दिए,जिनसे समाज में तनाव और वैमनस्य फैल सकता है। शिकायतकर्ता ने अपने आवेदन के साथ कई वीडियो लिंक और भाषणों के अंश भी पुलिस को सौंपे थे। इन वीडियो में कथित तौर पर केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह के खिलाफ की गई टिप्पणियाँ भी शामिल हैं।
पुलिस ने प्रारंभिक जाँच के बाद बिधाननगर साइबर क्राइम थाने में मामला दर्ज किया। अधिकारियों का कहना है कि जांच के दौरान यह पाया गया कि भाषणों की सामग्री संवेदनशील थी और उसके कारण विभिन्न समुदायों के बीच तनाव उत्पन्न हो सकता था। इसी आधार पर भारतीय न्याय संहिता की पाँच अलग-अलग धाराओं के तहत केस दर्ज किया गया।
एफआईआर में भारतीय न्याय संहिता की धारा 192 के तहत अशांति फैलाने का आरोप लगाया गया है। यह धारा जमानती मानी जाती है। हालाँकि,धारा 196 के तहत अलग-अलग समूहों के बीच दुश्मनी और नफरत फैलाने का आरोप भी शामिल किया गया है,जिसे गैर-जमानती श्रेणी में रखा गया है। इसके अलावा धारा 351(2) के तहत डराने-धमकाने और सामाजिक सौहार्द बिगाड़ने से जुड़े आरोप लगाए गए हैं। यह धारा भी गैर-जमानती मानी जाती है।
इतना ही नहीं,पुलिस ने धारा 353(1)(c) के तहत झूठी या भ्रामक जानकारी और अफवाहें फैलाने के आरोप भी जोड़े हैं। इसके साथ-साथ जनप्रतिनिधित्व अधिनियम 1951 की धारा 123(2) और 125 के तहत भी मामला दर्ज किया गया है। इन धाराओं का संबंध चुनाव प्रचार के दौरान अनुचित प्रभाव डालने और विभिन्न समुदायों के बीच तनाव फैलाने से माना जाता है।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह मामला आने वाले दिनों में और बड़ा रूप ले सकता है। पश्चिम बंगाल में चुनावी राजनीति पहले से ही काफी आक्रामक रही है और नेताओं के बयान अक्सर विवादों का कारण बनते रहे हैं,लेकिन इस बार मामला सीधे तौर पर एक बड़े विपक्षी चेहरे के खिलाफ दर्ज एफआईआर तक पहुँच गया है,जिससे राजनीतिक माहौल और गरमा गया है।
विपक्षी दलों ने इस मामले को लेकर तृणमूल कांग्रेस पर निशाना साधा है। विपक्ष का कहना है कि चुनाव प्रचार के दौरान नेताओं ने राजनीतिक मर्यादा की सीमाएँ पार कर दी थीं। उनका आरोप है कि धार्मिक और सामाजिक भावनाओं को भड़काने वाले भाषण देकर वोटरों को प्रभावित करने की कोशिश की गई। विपक्षी नेताओं का कहना है कि कानून के अनुसार कार्रवाई होना जरूरी है और किसी भी नेता को कानून से ऊपर नहीं माना जा सकता।
दूसरी ओर तृणमूल कांग्रेस के नेताओं और समर्थकों का एक बड़ा वर्ग इस कार्रवाई को राजनीतिक साजिश बता रहा है। पार्टी के कई नेताओं का कहना है कि चुनावी हार के बाद विपक्ष अब राजनीतिक बदले की भावना से काम कर रहा है। उनका आरोप है कि अभिषेक बनर्जी की बढ़ती लोकप्रियता और संगठन में मजबूत पकड़ से विरोधी दल परेशान हैं और इसी कारण उन्हें कानूनी मामलों में उलझाने की कोशिश की जा रही है।
हालाँकि,इस पूरे मामले पर अभी तक अभिषेक बनर्जी की ओर से कोई आधिकारिक बयान सामने नहीं आया है। राजनीतिक हलकों में यह चर्चा जरूर तेज है कि आने वाले दिनों में वह इस मुद्दे पर अपनी प्रतिक्रिया दे सकते हैं। पार्टी के करीबी सूत्रों का कहना है कि कानूनी टीम मामले का अध्ययन कर रही है और आगे की रणनीति तैयार की जा रही है।
कानूनी विशेषज्ञों का कहना है कि गैर-जमानती धाराएँ लगने के कारण यह मामला गंभीर माना जाएगा। हालाँकि,अदालत में आरोपों को साबित करना जांच एजेंसियों की जिम्मेदारी होगी। विशेषज्ञों के अनुसार,चुनावी भाषणों से जुड़े मामलों में अदालतें आमतौर पर भाषण के पूरे संदर्भ और उसके वास्तविक प्रभाव को भी ध्यान में रखती हैं। ऐसे मामलों में वीडियो रिकॉर्डिंग,भाषण की प्रमाणिकता और शिकायतकर्ता द्वारा प्रस्तुत साक्ष्य महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
इस घटनाक्रम ने पश्चिम बंगाल की राजनीति में एक बार फिर तनावपूर्ण माहौल पैदा कर दिया है। राज्य में पहले भी चुनावी हिंसा,विवादित भाषण और राजनीतिक संघर्ष को लेकर कई मामले सामने आते रहे हैं,लेकिन इस बार मामला सीधे तौर पर तृणमूल कांग्रेस के राष्ट्रीय स्तर पर उभरते चेहरे से जुड़ने के कारण और अधिक चर्चाओं में आ गया है।
अब सबकी नजरें पुलिस जाँच और अदालत की अगली कार्रवाई पर टिकी हुई हैं। राजनीतिक जानकार मानते हैं कि यह मामला केवल कानूनी विवाद तक सीमित नहीं रहेगा,बल्कि आने वाले समय में बंगाल की राजनीति और चुनावी रणनीतियों पर भी इसका असर देखने को मिल सकता है।
