मुंबई,29 जून (युआईटीवी)- देश के निजी बैंकिंग क्षेत्र के प्रमुख संस्थानों में शामिल एचडीएफसी बैंक एक बार फिर चर्चा के केंद्र में है। इस बार मामला बैंक के पूर्व पार्ट-टाइम चेयरमैन और स्वतंत्र निदेशक अतानु चक्रवर्ती के इस्तीफे और उसके बाद बैंक द्वारा कराई गई कानूनी समीक्षा से जुड़ा है। चक्रवर्ती ने बैंक की ओर से उनके इस्तीफे की समीक्षा के लिए नियुक्त की गई कानूनी फर्मों की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाए हैं। उनका कहना है कि उन्होंने अपने इस्तीफे के माध्यम से बैंक के भीतर कुछ कारोबारी प्रक्रियाओं और अपने व्यक्तिगत मूल्यों के बीच मौजूद अंतर की ओर ध्यान आकर्षित करने का प्रयास किया था, लेकिन समीक्षा प्रक्रिया का केंद्र बिंदु उन मूल मुद्दों के बजाय केवल अनुपालन संबंधी पहलू बनकर रह गया।
एक बातचीत के दौरान अतानु चक्रवर्ती ने कहा कि बैंक द्वारा नियुक्त कानूनी फर्मों ने अपनी रिपोर्ट में मुख्य रूप से इंटरव्यू, बोर्ड बैठकों की कार्यवाही और विभिन्न प्रशासनिक प्रक्रियाओं पर ध्यान केंद्रित किया। उनके अनुसार,उन्होंने उम्मीद की थी कि समीक्षा के दौरान उन कारणों की गहराई से जाँच की जाएगी,जिनकी वजह से उन्होंने अपने पद से इस्तीफा देने जैसा महत्वपूर्ण फैसला लिया था। हालाँकि,उनके अनुसार ऐसा नहीं हुआ और समीक्षा का दायरा मुख्य रूप से औपचारिक अनुपालन तक सीमित रहा।
चक्रवर्ती ने यह भी दावा किया कि उन्होंने कई अवसरों पर बैंक के निदेशक मंडल से यह जानने की कोशिश की कि आखिर किस कानूनी प्रावधान और किन नियमों के तहत बाहरी कानूनी फर्मों को इस समीक्षा के लिए नियुक्त किया गया। उनका कहना है कि उन्हें इस संबंध में कभी स्पष्ट जानकारी नहीं दी गई। उनके अनुसार,यदि किसी स्वतंत्र निदेशक के इस्तीफे की समीक्षा की जाती है,तो उस प्रक्रिया में पारदर्शिता और स्पष्टता होना बेहद आवश्यक है। उन्होंने कहा कि जब नियुक्ति का आधार ही स्पष्ट नहीं बताया गया,तब पूरी कानूनी प्रक्रिया पर सवाल उठना स्वाभाविक है।
पूर्व चेयरमैन ने इस पूरी कवायद को अनावश्यक बताते हुए कहा कि यदि बैंक वास्तव में उनके इस्तीफे के पीछे की चिंताओं को समझना चाहता,तो समीक्षा का फोकस उन कारोबारी प्रक्रियाओं पर होना चाहिए था,जिनके कारण उन्होंने अपनी असहमति दर्ज कराई थी। उनके अनुसार,केवल प्रक्रियात्मक अनुपालन की जांच से उन मूल सवालों का समाधान नहीं हो सकता,जिन्हें उन्होंने अपने इस्तीफे के माध्यम से सामने रखने की कोशिश की थी।
हालाँकि,जब उनसे यह पूछा गया कि आखिर बैंक की कौन-सी कारोबारी प्रक्रियाएँ उनके व्यक्तिगत मूल्यों और नैतिक सिद्धांतों के खिलाफ थीं,तो उन्होंने इस पर विस्तार से टिप्पणी करने से इनकार कर दिया। उन्होंने कहा कि बोर्डरूम में होने वाली चर्चाएं गोपनीय होती हैं और उन्हें सार्वजनिक मंच पर साझा करना उचित नहीं होगा। उन्होंने यह भी कहा कि उनका उद्देश्य किसी व्यक्ति या संस्था को कटघरे में खड़ा करना नहीं था,बल्कि केवल उन मुद्दों की ओर ध्यान दिलाना था,जिन पर गंभीरता से विचार किए जाने की आवश्यकता थी।
बातचीत के दौरान अतानु चक्रवर्ती ने दुबई में सामने आए एटी-1 बॉन्ड की कथित गलत बिक्री के मामले का भी उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि यह मामला उनके कार्यकाल के दौरान सामने आया था,लेकिन बैंक ने उस समय स्थिति को गंभीरता से लेते हुए तेजी से सुधारात्मक कदम उठाए थे। उनके अनुसार,बैंक ने आवश्यक कार्रवाई कर मामले को संभालने का प्रयास किया और उस समय उपलब्ध परिस्थितियों के अनुरूप निर्णय लिए गए। हालाँकि,उन्होंने इस मामले को अपने इस्तीफे का प्रत्यक्ष कारण नहीं बताया।
गौरतलब है कि अतानु चक्रवर्ती ने 18 मार्च को एचडीएफसी बैंक के पार्ट-टाइम चेयरमैन और स्वतंत्र निदेशक पद से इस्तीफा दिया था। उन्होंने वर्ष 2021 में बैंक के निदेशक मंडल में प्रवेश किया था और बैंक के प्रशासनिक तथा रणनीतिक निर्णयों में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। उनके इस्तीफे ने उस समय बैंकिंग क्षेत्र में व्यापक चर्चा को जन्म दिया था, क्योंकि उन्होंने अपने त्यागपत्र में कुछ गंभीर टिप्पणियां दर्ज कराई थीं।
अपने इस्तीफे में उन्होंने स्पष्ट रूप से लिखा था कि पिछले दो वर्षों के दौरान उन्होंने बैंक के भीतर कुछ ऐसी घटनाएँ और कार्यप्रणालियाँ देखीं,जो उनके व्यक्तिगत मूल्यों और नैतिक सिद्धांतों के अनुरूप नहीं थीं। उन्होंने कहा था कि यही उनके इस्तीफे का मुख्य आधार है। साथ ही उन्होंने यह भी स्पष्ट किया था कि इन कारणों के अलावा उनके इस्तीफे के पीछे कोई अन्य ठोस वजह नहीं थी। इस बयान ने बैंक के कॉरपोरेट गवर्नेंस और आंतरिक कार्यप्रणाली को लेकर कई सवाल खड़े कर दिए थे।
चक्रवर्ती के हालिया बयान से यह स्पष्ट होता है कि वह अब भी मानते हैं कि उनके इस्तीफे के पीछे उठाए गए मुद्दों पर अपेक्षित स्तर की समीक्षा नहीं की गई। उनका कहना है कि यदि किसी वरिष्ठ पदाधिकारी की ओर से संगठन की कार्यप्रणाली को लेकर नैतिक और प्रशासनिक चिंताएँ व्यक्त की जाती हैं,तो उनका समाधान केवल औपचारिक जाँच से नहीं, बल्कि व्यापक संस्थागत आत्ममंथन से होना चाहिए।
कॉरपोरेट प्रशासन के विशेषज्ञों का मानना है कि किसी भी बड़े वित्तीय संस्थान में स्वतंत्र निदेशकों की भूमिका केवल निगरानी तक सीमित नहीं होती,बल्कि वे संगठन के नैतिक मानकों,पारदर्शिता और जवाबदेही को मजबूत बनाने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। ऐसे में यदि कोई स्वतंत्र निदेशक अपने व्यक्तिगत मूल्यों और संस्थागत कार्यप्रणाली के बीच अंतर का उल्लेख करते हुए इस्तीफा देता है,तो उस घटना को केवल प्रशासनिक प्रक्रिया के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।
फिलहाल बैंक की ओर से इस मामले में कोई विस्तृत सार्वजनिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है। हालाँकि,यह पूरा घटनाक्रम एक बार फिर कॉरपोरेट गवर्नेंस,निदेशक मंडल की पारदर्शिता,स्वतंत्र निदेशकों की भूमिका और बड़े वित्तीय संस्थानों में नैतिक मूल्यों के महत्व को लेकर नई बहस छेड़ रहा है। आने वाले समय में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि इस मुद्दे पर बैंक की ओर से कोई अतिरिक्त स्पष्टीकरण दिया जाता है या नहीं तथा क्या इस प्रकरण के बाद कॉरपोरेट प्रशासन से जुड़े मानकों और प्रक्रियाओं में किसी प्रकार के बदलाव देखने को मिलते हैं।
