नई दिल्ली,27 अक्टूबर (युआईटीवी)- दिल्ली में एक नवंबर को प्रस्तावित इंडिया गठबंधन की रैली को लेकर राजनीतिक सरगर्मी तेज हो गई है। राजधानी के व्यापारिक संगठनों ने एक बार फिर इस कार्यक्रम को स्थगित करने की माँग उठाई है। व्यापारियों का कहना है कि रैली ऐसे समय आयोजित की जा रही है,जब दिवाली के आसपास बाजारों में खरीदारी का सबसे महत्वपूर्ण दौर चल रहा है। ऐसे में बड़े राजनीतिक कार्यक्रम के कारण यातायात व्यवस्था प्रभावित होने,सड़कों पर प्रतिबंध लगने और ग्राहकों की आवाजाही बाधित होने से कारोबार को भारी नुकसान हो सकता है। व्यापारिक संगठन चैंबर ऑफ ट्रेड एंड इंडस्ट्री (सीटीआई) ने आशंका जताई है कि यदि रैली निर्धारित तारीख पर होती है, तो पुरानी दिल्ली और मध्य दिल्ली के प्रमुख बाजारों में व्यावसायिक गतिविधियां बुरी तरह प्रभावित हो सकती हैं। संगठन के मुताबिक, संभावित नुकसान का आँकड़ा 10 हजार करोड़ रुपये तक पहुँच सकता है।
यह माँग उस समय सामने आई है,जब कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने सोशल मीडिया पर स्पष्ट किया है कि रामलीला मैदान में प्रस्तावित रैली आयोजित करने की योजना बरकरार है। उनके बयान के बावजूद व्यापारियों की चिंताएँ कम नहीं हुई हैं। सीटीआई ने कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे को भी पत्र की प्रति भेजकर अनुरोध किया है कि वह इंडिया गठबंधन के अन्य सहयोगी दलों के साथ इस विषय पर चर्चा करें और व्यापारिक समुदाय की समस्याओं को ध्यान में रखते हुए रैली की तारीख या स्थान बदलने पर विचार करें।
राहुल गांधी ने सोमवार को सोशल मीडिया मंच एक्स पर दिल्ली के व्यापारियों को संबोधित करते हुए कहा था कि उनकी समस्याओं को सुना जा रहा है और उनकी चिंताओं को गंभीरता से लिया जाता है। उन्होंने आरोप लगाया कि सरकार ने मेट्रो सेवाएँ बंद कर दीं, सड़कों को सील कर दिया और राजधानी में ऐसी स्थिति पैदा कर दी,जो लॉकडाउन जैसी दिखाई देती है। राहुल गांधी ने यह भी कहा कि यदि मुख्य निर्वाचन आयुक्त ज्ञानेश कुमार को पद से हटा दिया जाए,तो विरोध प्रदर्शन 30 सेकंड में समाप्त हो सकता है।
हालाँकि,कांग्रेस नेता के इस बयान से व्यापारिक संगठनों को राहत नहीं मिली है। व्यापारियों का कहना है कि राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप से अलग,उनके सामने सबसे बड़ा सवाल यह है कि रैली के दिन बाजारों तक ग्राहकों की पहुँच कैसे सुनिश्चित होगी। त्योहारी मौसम में दुकानों पर ग्राहकों की संख्या बढ़ जाती है और व्यापारियों की कमाई का बड़ा हिस्सा इसी अवधि पर निर्भर रहता है। यदि मुख्य सड़कों पर बैरिकेडिंग की जाती है या वाहनों की आवाजाही पर रोक लगती है,तो इसका सीधा असर दुकानों और थोक बाजारों के कारोबार पर पड़ेगा।
सीटीआई के चेयरमैन बृजेश गोयल के अनुसार,रामलीला मैदान के आसपास स्थित लगभग 20 प्रमुख बाजारों के व्यापारी रैली की घोषणा के बाद से चिंतित हैं। व्यापारिक समुदाय के बीच इस बात को लेकर असमंजस है कि कार्यक्रम के लिए प्रशासन किस तरह की व्यवस्था करेगा और उसका स्थानीय बाजारों पर कितना असर पड़ेगा। संगठन का कहना है कि व्यापारी किसी राजनीतिक दल के कार्यक्रम का विरोध करने के उद्देश्य से यह माँग नहीं कर रहे,बल्कि वे अपने कारोबार और ग्राहकों की सुविधा को लेकर चिंतित हैं।
सीटीआई ने रैली की तैयारियों और संभावित यातायात व्यवस्था को लेकर कई सवाल उठाए हैं। व्यापारियों को आशंका है कि कार्यक्रम से एक दिन पहले,यानी 31 अक्टूबर से ही रामलीला मैदान और उसके आसपास के इलाकों में बैरिकेडिंग शुरू की जा सकती है। यदि ऐसा होता है,तो बाजारों में माल की आवाजाही,दुकानदारों और कर्मचारियों के आवागमन तथा ग्राहकों के पहुँचने में परेशानी हो सकती है।
संगठन ने यह भी पूछा है कि क्या राजधानी की प्रमुख सड़कों पर यातायात प्रतिबंध लगाए जाएंगे और क्या आम लोगों को बाजारों तक पहुँचने के लिए वैकल्पिक मार्गों का इस्तेमाल करना पड़ेगा। दिल्ली के पुराने व्यापारिक क्षेत्रों में पहले से ही सड़कें संकरी हैं और कई जगहों पर पार्किंग की सुविधा सीमित है। ऐसे में किसी बड़े राजनीतिक आयोजन के कारण वाहनों का दबाव बढ़ने से यातायात व्यवस्था बिगड़ने की आशंका है।
व्यापारियों की चिंता इसलिए भी बढ़ गई है,क्योंकि रैली में बड़ी संख्या में लोगों के शामिल होने का अनुमान लगाया जा रहा है। यदि कांग्रेस नेताओं के आकलन के अनुसार कार्यक्रम में लगभग 10 लाख लोग पहुँचते हैं और उनके साथ 15 हजार से 20 हजार वाहन आते हैं, तो इतनी बड़ी संख्या में वाहनों को खड़ा करने की व्यवस्था करना प्रशासन के लिए चुनौतीपूर्ण हो सकता है। सीटीआई का दावा है कि रामलीला मैदान के आसपास 200 वाहनों के लिए भी पर्याप्त अधिकृत पार्किंग उपलब्ध नहीं है। ऐसे में हजारों वाहनों को कहाँ खड़ा किया जाएगा,यह बड़ा सवाल है।
सीटीआई का कहना है कि रामलीला मैदान के आसपास दिल्ली के कई बड़े थोक और खुदरा बाजार मौजूद हैं। यहाँ रोजाना बड़ी संख्या में व्यापारी, ग्राहक, कारोबारी प्रतिनिधि और माल ढुलाई से जुड़े वाहन पहुँचते हैं। संगठन के मुताबिक,रैली के कारण लगभग 21 प्रमुख बाजार सीधे तौर पर प्रभावित हो सकते हैं।
पुरानी दिल्ली और मध्य दिल्ली के बाजारों में त्योहारी सीजन के दौरान कारोबार सामान्य दिनों की तुलना में अधिक रहता है। दुकानदारों को उम्मीद होती है कि दिवाली और उससे जुड़े त्योहारों के दौरान बिक्री में तेजी आएगी। इस समय ग्राहकों की आवाजाही बाधित होने या माल की आपूर्ति में देरी होने से व्यापारियों को आर्थिक नुकसान उठाना पड़ सकता है। बाजारों तक पहुँचने के रास्ते बंद होने की स्थिति में ग्राहक खरीदारी के लिए दूसरे इलाकों का रुख भी कर सकते हैं।
व्यापारिक संगठन का तर्क है कि किसी बड़े सार्वजनिक कार्यक्रम के लिए जगह और तारीख तय करते समय आसपास के व्यावसायिक क्षेत्रों की स्थिति का भी आकलन किया जाना चाहिए। यदि आयोजन के कारण बड़ी संख्या में दुकानों का कारोबार प्रभावित होता है,तो इसका असर केवल दुकानदारों तक सीमित नहीं रहेगा। परिवहन, माल आपूर्ति, गोदामों, छोटे कारोबारियों और बाजारों में काम करने वाले कर्मचारियों की आय पर भी इसका प्रभाव पड़ सकता है।
अपनी माँग के समर्थन में सीटीआई ने 10 अक्टूबर को जंतर-मंतर पर हुए एक प्रदर्शन का उदाहरण भी दिया है। संगठन के मुताबिक,उस कार्यक्रम में लगभग तीन से चार हजार लोग शामिल हुए थे,लेकिन इसके बावजूद मध्य दिल्ली के बड़े हिस्से में यातायात प्रतिबंध लगाए गए थे। सीटीआई का दावा है कि उस प्रदर्शन के कारण व्यापारियों को करीब तीन हजार करोड़ रुपये का नुकसान उठाना पड़ा था।
व्यापारियों का कहना है कि जब अपेक्षाकृत कम लोगों की मौजूदगी वाले कार्यक्रम से भी यातायात और बाजारों की गतिविधियाँ प्रभावित हो सकती हैं,तो लाखों लोगों की संभावित भागीदारी वाली रैली का असर कहीं अधिक व्यापक हो सकता है। इसी आधार पर संगठन ने एक नवंबर के कार्यक्रम को लेकर गंभीर चिंता जताई है।
हालाँकि,कारोबार को हुए नुकसान के इन आंकड़ों को सीटीआई के दावे के रूप में ही देखा जाना चाहिए। वास्तविक आर्थिक प्रभाव का आकलन यातायात प्रतिबंधों की अवधि, प्रभावित बाजारों की संख्या,ग्राहकों की आवाजाही और प्रशासन की व्यवस्था पर निर्भर करेगा। इसके बावजूद व्यापारियों का कहना है कि संभावित जोखिम को नजरअंदाज करने के बजाय पहले से ऐसी व्यवस्था की जानी चाहिए,जिससे कारोबार और सार्वजनिक कार्यक्रम दोनों प्रभावित न हों।
सीटीआई ने इंडिया गठबंधन के नेताओं से आग्रह किया है कि जनहित और व्यापारिक हितों को ध्यान में रखते हुए रैली की तारीख आगे बढ़ाई जाए। संगठन ने सुझाव दिया है कि कार्यक्रम भाई दूज के बाद, यानी 10 नवंबर के बाद आयोजित किया जा सकता है। व्यापारियों के अनुसार,इससे त्योहारी खरीदारी के महत्वपूर्ण दौर में बाजारों पर पड़ने वाले दबाव को कम करने में मदद मिलेगी।
संगठन ने यह भी कहा है कि यदि रैली की तारीख बदलना संभव नहीं है,तो आयोजन स्थल पर पुनर्विचार किया जाना चाहिए। इसके लिए बुराड़ी ग्राउंड या जवाहरलाल नेहरू स्टेडियम जैसे खुले स्थानों का विकल्प सुझाया गया है। सीटीआई का मानना है कि ऐसे स्थानों पर बड़ी भीड़ के प्रबंधन और वाहनों की पार्किंग की व्यवस्था करना अपेक्षाकृत आसान हो सकता है। साथ ही,रामलीला मैदान के आसपास स्थित व्यस्त बाजारों पर पड़ने वाला असर भी कम किया जा सकता है।
व्यापारियों का कहना है कि उनका उद्देश्य किसी राजनीतिक कार्यक्रम को रोकना नहीं, बल्कि ऐसी व्यवस्था सुनिश्चित करना है,जिसमें लोकतांत्रिक गतिविधियों के साथ आर्थिक गतिविधियाँ भी सामान्य रूप से चलती रहें। संगठन चाहता है कि रैली के आयोजक,प्रशासन और व्यापारिक प्रतिनिधि मिलकर ऐसा समाधान निकालें,जिससे आम लोगों को परेशानी न हो और कारोबार को नुकसान से बचाया जा सके।
इस मामले में कन्फेडरेशन ऑफ ऑल इंडिया ट्रेडर्स (कैट) के महासचिव और भाजपा सांसद प्रवीण खंडेलवाल ने भी राहुल गांधी के बयान को व्यापारियों की चिंताओं का पर्याप्त समाधान नहीं बताया है। उन्होंने कहा कि जब राहुल गांधी खुद यह स्वीकार कर रहे हैं कि मेट्रो सेवाएँ बंद हुईं और सड़कों को सील किया गया,तो इस बात पर भी विचार किया जाना चाहिए कि प्रशासन को ऐसे कदम उठाने की जरूरत क्यों पड़ी।
खंडेलवाल के अनुसार,व्यापारियों की प्रमुख चिंता राजनीतिक विवाद नहीं,बल्कि त्योहारों के दौरान कारोबार को सामान्य बनाए रखना है। उनका कहना है कि बड़े राजनीतिक कार्यक्रमों के चलते यदि बाजारों तक पहुँचना मुश्किल हो जाता है,तो इसका सीधा असर दुकानदारों और ग्राहकों पर पड़ता है। त्योहारी सीजन में पहले से तय खरीदारी, माल की आपूर्ति और दुकानों की बिक्री यातायात व्यवस्था पर काफी हद तक निर्भर करती है।
व्यापारिक संगठनों की माँग के बीच अब रैली की तारीख और स्थान को लेकर राजनीतिक नेतृत्व के रुख पर नजरें टिकी हैं। राहुल गांधी के बयान से फिलहाल यह संकेत मिला है कि कांग्रेस कार्यक्रम आयोजित करने के अपने फैसले पर कायम है,जबकि सीटीआई और कैट जैसे संगठन व्यापारियों की परेशानी का हवाला देकर बदलाव की माँग कर रहे हैं।
दिल्ली में एक नवंबर को रैली होती है या इसे आगे बढ़ाया जाता है,यह आने वाले दिनों में स्पष्ट होगा। फिलहाल व्यापारियों की माँग है कि अंतिम निर्णय लेते समय संभावित भीड़, पार्किंग,यातायात प्रतिबंध और त्योहारी खरीदारी को प्राथमिकता दी जाए। उनका तर्क है कि राजनीतिक आयोजन कुछ समय के लिए होता है,लेकिन उसके कारण बाजारों की गतिविधियाँ प्रभावित होने पर हजारों व्यापारियों को बड़ा आर्थिक नुकसान उठाना पड़ सकता है। इसलिए आयोजन की योजना ऐसी होनी चाहिए,जिससे लोकतांत्रिक कार्यक्रम भी हो सके और दिल्ली का व्यापार भी सामान्य रूप से चलता रहे।
