भारतीय प्रतिभूति एवं विनिमय बोर्ड (सेबी)

आईपीओ लिस्टिंग नियमों में बड़े बदलाव की तैयारी,शेयर कीमत तय करने की प्रक्रिया बदल सकता है सेबी

नई दिल्ली,22 मई (युआईटीवी)- भारतीय प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड ने आईपीओ और री-लिस्टिंग के दौरान शेयरों की शुरुआती कीमत तय करने की प्रक्रिया में बड़े बदलावों का प्रस्ताव रखा है। गुरुवार को जारी एक परामर्श पत्र में बाजार नियामक ने कहा कि मौजूदा प्राइस डिस्कवरी सिस्टम कई मामलों में वास्तविक बाजार माँग को सही तरीके से प्रतिबिंबित नहीं कर पा रहा है। इसके कारण शेयरों की शुरुआती कीमत कृत्रिम रूप से कम रह जाती है और लिस्टिंग के बाद लगातार अपर सर्किट जैसी स्थितियाँ पैदा होती हैं।

सेबी का मानना है कि मौजूदा व्यवस्था में निवेशकों की मजबूत माँग होने के बावजूद प्राइस बैंड सीमित रहने से शेयरों की वास्तविक कीमत सामने नहीं आ पाती। परिणामस्वरूप प्री-ओपन सत्र के दौरान बड़ी संख्या में खरीद ऑर्डर रिजेक्ट हो जाते हैं और बाजार में असामान्य उतार-चढ़ाव देखने को मिलता है। इसी समस्या को दूर करने के लिए नियामक ने प्राइस बैंड को अधिक लचीला और स्वचालित बनाने का सुझाव दिया है।

प्रस्ताव के अनुसार यदि किसी आईपीओ या री-लिस्टेड शेयर में निवेशकों की माँग अत्यधिक मजबूत दिखाई देती है,तो एक्सचेंजों को प्राइस बैंड को अपने आप बढ़ाने की अनुमति दी जानी चाहिए। सेबी ने कहा कि इस प्रक्रिया में बार-बार मैन्युअल हस्तक्षेप की जरूरत नहीं पड़नी चाहिए और सभी एक्सचेंजों में एक समान प्रणाली लागू होनी चाहिए। नियामक ने सुझाव दिया कि प्राइस बैंड को 10 प्रतिशत के गुणकों में स्वचालित रूप से बढ़ाया जाए,ताकि बाजार की वास्तविक माँग और आपूर्ति के आधार पर शेयर की शुरुआती कीमत तय हो सके।

सेबी ने अपने बयान में कहा कि डमी प्राइस बैंड को बढ़ाने की प्रक्रिया सभी स्टॉक एक्सचेंजों में समान होनी चाहिए और जरूरत पड़ने पर इसे तुरंत लागू किया जाना चाहिए। इसके साथ ही नियामक ने यह भी स्पष्ट किया कि यह व्यवस्था सुबह 9 बजकर 35 मिनट से 9 बजकर 45 मिनट तक चलने वाले रैंडम क्लोजर पीरियड के दौरान भी लागू रहनी चाहिए। विशेषज्ञों का मानना है कि इससे प्री-ओपन सत्र में कीमत तय करने की प्रक्रिया अधिक पारदर्शी और प्रभावी हो सकती है।

बाजार नियामक ने अपने परामर्श पत्र में एक उदाहरण का जिक्र करते हुए बताया कि हाल ही में एक री-लिस्टेड शेयर में लगभग 90 प्रतिशत खरीद ऑर्डर रिजेक्ट हो गए थे,क्योंकि निवेशकों द्वारा लगाई गई बोलियाँ एक्सचेंज द्वारा निर्धारित सीमा से बाहर थीं। सेबी का कहना है कि इस तरह की स्थिति बाजार की वास्तविक माँग को दबा देती है और शेयर की सही कीमत सामने नहीं आ पाती।

विशेषज्ञों के अनुसार,कई बार किसी कंपनी के शेयर को लेकर बाजार में बेहद सकारात्मक माहौल होता है और निवेशक ऊँची कीमत पर भी खरीदारी करने को तैयार रहते हैं,लेकिन यदि प्राइस बैंड सीमित रहता है, तो बड़ी संख्या में ऑर्डर अस्वीकार हो जाते हैं। इससे लिस्टिंग के बाद शेयर अचानक तेज उछाल के साथ अपर सर्किट में पहुँच जाता है। ऐसे उतार-चढ़ाव से छोटे निवेशकों को नुकसान होने की आशंका बढ़ जाती है और बाजार की स्थिरता प्रभावित होती है।

सेबी ने री-लिस्टेड कंपनियों के लिए शुरुआती शेयर मूल्य तय करने की प्रक्रिया में भी बड़े बदलावों का प्रस्ताव रखा है। फिलहाल कई मामलों में पुराने या कृत्रिम रूप से कम रेफरेंस प्राइस का उपयोग किया जाता है,जिससे शेयर की वास्तविक बाजार कीमत सामने नहीं आ पाती। अब नियामक ने सुझाव दिया है कि ऐसे मामलों में हालिया बाजार मूल्य या स्वतंत्र वैल्यूएशन रिपोर्ट को आधार बनाया जाए। इससे कीमत तय करने की प्रक्रिया अधिक यथार्थवादी और पारदर्शी हो सकेगी।

सेबी ने यह भी प्रस्ताव रखा कि कॉल ऑक्शन सत्र को तभी सफल माना जाए जब प्राइस डिस्कवरी कम से कम पाँच अलग-अलग पैन आधारित खरीदारों और विक्रेताओं के ऑर्डर पर आधारित हो। नियामक का मानना है कि इससे कुछ सीमित प्रतिभागियों के जरिए कीमत प्रभावित करने की संभावना कम होगी और बाजार में निष्पक्षता बढ़ेगी।

बाजार विशेषज्ञों का कहना है कि यह प्रस्ताव खास तौर पर एसएमई आईपीओ से जुड़े मामलों में महत्वपूर्ण साबित हो सकता है। वर्तमान में एसएमई आईपीओ के कॉल ऑक्शन सत्र में कोई औपचारिक प्राइस बैंड नहीं होता,लेकिन अधिक उतार-चढ़ाव को नियंत्रित करने के लिए स्टॉक एक्सचेंजों ने 90 प्रतिशत से अधिक का प्राइस बैंड तय कर रखा है। हालाँकि,इसमें फ्लेक्सिंग का कोई स्पष्ट मानदंड नहीं है। ऐसे में कई बार निवेशकों की भारी माँग होने के बावजूद कीमत वास्तविक स्तर तक नहीं पहुँच पाती।

विश्लेषकों का मानना है कि यदि सेबी के प्रस्ताव लागू होते हैं,तो आईपीओ बाजार में कीमत तय करने की प्रक्रिया अधिक आधुनिक और बाजार आधारित हो सकती है। इससे लिस्टिंग के दिन अत्यधिक अस्थिरता को कम करने में मदद मिलेगी। साथ ही निवेशकों को भी अधिक पारदर्शी और निष्पक्ष मूल्य निर्धारण का लाभ मिल सकता है।

हाल के वर्षों में भारत का आईपीओ बाजार तेजी से बढ़ा है और बड़ी संख्या में कंपनियाँ पूँजी जुटाने के लिए शेयर बाजार का रुख कर रही हैं। ऐसे में नियामक लगातार बाजार संरचना को बेहतर बनाने और निवेशकों के हितों की रक्षा के लिए नए कदम उठा रहा है। विशेषज्ञों का कहना है कि बाजार की तेजी और बढ़ती भागीदारी को देखते हुए प्राइस डिस्कवरी सिस्टम को अधिक लचीला बनाना समय की जरूरत बन गई थी।

सेबी के इस प्रस्ताव पर अब बाजार सहभागियों,निवेशकों,स्टॉक एक्सचेंजों और अन्य हितधारकों से सुझाव मांगे गए हैं। परामर्श प्रक्रिया पूरी होने के बाद नियामक अंतिम नियमों को लागू करने पर फैसला करेगा। यदि ये बदलाव लागू होते हैं,तो भारत के आईपीओ और री-लिस्टिंग बाजार में मूल्य निर्धारण की प्रक्रिया में बड़ा परिवर्तन देखने को मिल सकता है।

बाजार विशेषज्ञों का यह भी मानना है कि इन सुधारों से विदेशी निवेशकों का भरोसा मजबूत होगा और भारतीय पूँजी बाजार की विश्वसनीयता बढ़ेगी। पारदर्शी और बाजार आधारित मूल्य निर्धारण व्यवस्था से कंपनियों को भी वास्तविक मूल्यांकन हासिल करने में मदद मिल सकती है। फिलहाल निवेशक और बाजार सहभागियों की नजरें इस बात पर टिकी हैं कि परामर्श प्रक्रिया के बाद सेबी अंतिम नियमों में किन सुझावों को शामिल करता है और यह नया ढाँचा भारतीय शेयर बाजार को किस दिशा में ले जाता है।