संयुक्त राष्ट्र/ओटावा,10 अक्टूबर (युआईटीवी)- अंतर्राष्ट्रीय अपराध न्यायालय (आईसीसी) पर अमेरिका की ओर से लगाए गए प्रतिबंधों को लेकर अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर विरोध सामने आया है। संयुक्त राष्ट्र महासचिव एंटोनियो गुटेरेस ने इन प्रतिबंधों पर गंभीर चिंता जताते हुए कहा कि इससे अदालत की स्वतंत्रता और अंतरराष्ट्रीय अपराधों के लिए जवाबदेही तय करने की उसकी क्षमता प्रभावित हो सकती है। वहीं, कनाडा, डेनमार्क, जर्मनी, फ्रांस, इटली, जापान, नीदरलैंड और ब्रिटेन के विदेश मंत्रियों ने भी संयुक्त बयान जारी कर अमेरिकी कदम पर खेद जताया और अदालत के प्रति अपना समर्थन दोहराया। इस घटनाक्रम ने अंतर्राष्ट्रीय न्याय व्यवस्था और गंभीर अपराधों के लिए जिम्मेदार लोगों को जवाबदेह बनाने की कोशिशों को लेकर नई बहस शुरू कर दी है।
संयुक्त राष्ट्र महासचिव के प्रवक्ता स्टीफन दुजारिक ने शुक्रवार को बताया कि गुटेरेस अमेरिकी प्रतिबंधों के संभावित प्रभावों को लेकर बेहद चिंतित हैं। उनके अनुसार, इन कदमों का असर केवल अदालत के कुछ अधिकारियों या विशिष्ट गतिविधियों तक सीमित रहने के बजाय उसके व्यापक कामकाज पर पड़ सकता है। विशेष रूप से उन जिम्मेदारियों के प्रभावित होने की आशंका है,जो आईसीसी को संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद और रोम संविधि के सदस्य देशों की ओर से सौंपी गई हैं।
दुजारिक ने कहा कि अंतर्राष्ट्रीय अपराध न्यायालय वैश्विक स्तर पर आपराधिक न्याय सुनिश्चित करने के सामूहिक प्रयासों का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है। अदालत के कामकाज को प्रभावित करने वाले फैसले अंतर्राष्ट्रीय अपराधों की जाँच,जिम्मेदार लोगों की जवाबदेही तय करने और पीड़ितों को न्याय दिलाने की प्रक्रिया पर असर डाल सकते हैं। उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि गंभीर अपराधों के लिए जवाबदेही सुनिश्चित करना वैश्विक शांति, सुरक्षा, मानवाधिकारों और बुनियादी स्वतंत्रताओं की रक्षा से जुड़ा हुआ है।
संयुक्त राष्ट्र महासचिव ने आईसीसी और उसके अधिकारियों की स्वतंत्रता के प्रति अपना समर्थन दोहराया है। उनके प्रवक्ता के अनुसार, गुटेरेस ने सभी देशों से अंतरराष्ट्रीय कानून के तहत अपनी जिम्मेदारियों का पालन करने और गंभीर अंतर्राष्ट्रीय अपराधों के लिए जवाबदेही सुनिश्चित करने के प्रयासों में सहयोग देने की अपील की।
आईसीसी का उद्देश्य नरसंहार, युद्ध अपराध, मानवता के खिलाफ अपराध और आक्रामकता के अपराध जैसे गंभीर मामलों में व्यक्तिगत आपराधिक जिम्मेदारी तय करना है। यह एक स्वतंत्र अंतर्राष्ट्रीय न्यायिक संस्था है,जिसका गठन रोम संविधि के तहत किया गया था। इसकी भूमिका राष्ट्रीय न्याय व्यवस्था से अलग है और यह निर्धारित कानूनी शर्तों के तहत मामलों की सुनवाई करता है।
गुटेरेस की चिंता का प्रमुख आधार यह है कि यदि अदालत के वित्तीय लेन-देन और संसाधनों पर व्यापक प्रतिबंध लगाए जाते हैं, तो उसके नियमित कामकाज पर दबाव पड़ सकता है। ऐसे प्रतिबंध जाँच,अभियोजन और न्यायिक प्रक्रियाओं के संचालन को प्रभावित कर सकते हैं। हालाँकि,इनका वास्तविक प्रभाव प्रतिबंधों के दायरे और उनके लागू किए जाने के तरीके पर निर्भर करेगा।
अमेरिकी कदम के बाद आठ देशों के विदेश मंत्रियों ने भी अपनी प्रतिक्रिया दी। कनाडा, डेनमार्क, जर्मनी, फ्रांस, इटली, जापान, नीदरलैंड और ब्रिटेन के विदेश मंत्रियों ने संयुक्त बयान में आईसीसी पर प्रतिबंध लगाए जाने पर खेद जताया और इसका विरोध किया।
बयान में इन देशों ने कहा कि रोम संविधि के हस्ताक्षरकर्ता देशों के रूप में वे अदालत की स्वतंत्रता, निष्पक्षता और ईमानदारी के प्रति अपना निरंतर समर्थन दोहराते हैं। उनका मानना है कि अंतर्राष्ट्रीय न्याय व्यवस्था के प्रभावी संचालन के लिए अदालत को अपने कानूनी दायित्वों का निर्वहन स्वतंत्र रूप से करने का अवसर मिलना चाहिए।
इन देशों ने यह भी कहा कि वे दिसंबर 2026 में होने वाली सदस्य देशों की बैठक की तैयारियों के दौरान उन देशों के साथ रचनात्मक और समावेशी संवाद जारी रखेंगे,जो रोम संविधि के सदस्य नहीं हैं। इस पहल का उद्देश्य अंतर्राष्ट्रीय न्याय व्यवस्था से जुड़े मुद्दों पर बातचीत बनाए रखना और विभिन्न देशों के बीच सहयोग की संभावनाओं को आगे बढ़ाना है।
आठ देशों का संयुक्त बयान इसलिए महत्वपूर्ण है,क्योंकि इससे पता चलता है कि अमेरिकी प्रतिबंधों को लेकर केवल संयुक्त राष्ट्र महासचिव ने ही चिंता नहीं जताई,बल्कि कई प्रमुख देशों ने भी अदालत की संस्थागत स्वतंत्रता के समर्थन में अपना रुख स्पष्ट किया है। इन देशों ने अपने बयान में न्यायालय की निष्पक्षता और विश्वसनीयता को बनाए रखने पर जोर दिया।
इससे पहले शुक्रवार को अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो ने अंतर्राष्ट्रीय अपराध न्यायालय पर प्रतिबंध लगाने की घोषणा की थी। उनके अनुसार,इन कदमों के तहत अदालत के साथ वित्तीय लेन-देन पर रोक लगाने,उसके संसाधनों को सीमित करने और उसकी काम करने की क्षमता को गंभीर रूप से प्रभावित करने की कार्रवाई की जाएगी।
अमेरिका के इस फैसले से अदालत के कामकाज और उसके साथ जुड़े लोगों तथा संस्थाओं पर संभावित प्रभाव को लेकर सवाल उठे हैं। वित्तीय लेन-देन पर प्रतिबंध किसी संस्था की सेवाओं,संसाधनों और प्रशासनिक गतिविधियों को प्रभावित कर सकते हैं। हालाँकि,इन प्रभावों की वास्तविक सीमा इस बात पर निर्भर करेगी कि प्रतिबंध किन गतिविधियों, व्यक्तियों और लेन-देन पर लागू होते हैं।
इस घटनाक्रम ने अमेरिका और अंतर्राष्ट्रीय अपराध न्यायालय के बीच संबंधों को लेकर भी चर्चा तेज कर दी है। आईसीसी की स्थापना का उद्देश्य गंभीर अंतर्राष्ट्रीय अपराधों के मामलों में जवाबदेही सुनिश्चित करना है,लेकिन अदालत की अधिकारिता और उसके फैसलों को लेकर विभिन्न देशों के रुख अलग-अलग रहे हैं।
अमेरिकी प्रतिबंधों की आलोचना करने वाले देशों और संयुक्त राष्ट्र महासचिव की चिंता का मुख्य केंद्र अदालत की स्वतंत्रता और उसके कामकाज पर पड़ने वाला संभावित असर है। उनका कहना है कि अंतर्राष्ट्रीय अपराधों के लिए जवाबदेही तय करने की व्यवस्था को प्रभावी बनाए रखना वैश्विक शांति और सुरक्षा के लिए महत्वपूर्ण है।
दूसरी ओर,अमेरिका ने प्रतिबंधों की घोषणा करते हुए अदालत के खिलाफ कार्रवाई का फैसला किया है। इन कदमों के पीछे अमेरिकी प्रशासन का विस्तृत तर्क और प्रतिबंधों का पूरा दायरा उनके व्यावहारिक प्रभाव को समझने के लिए महत्वपूर्ण होगा।
फिलहाल,इस मामले पर संयुक्त राष्ट्र महासचिव और आठ देशों के विदेश मंत्रियों की प्रतिक्रिया से अंतर्राष्ट्रीय न्याय व्यवस्था को लेकर मतभेद सामने आए हैं। आने वाले समय में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि अमेरिकी प्रतिबंध आईसीसी की जाँच और न्यायिक प्रक्रियाओं को किस हद तक प्रभावित करते हैं और अंतर्राष्ट्रीय समुदाय इस विवाद के बीच अदालत की स्वतंत्रता तथा जवाबदेही सुनिश्चित करने के प्रयासों को किस तरह आगे बढ़ाता है।
