तमिलनाडु विधानसभा में विजय सरकार ने जीता विश्वास मत (तस्वीर क्रेडिट@rashtra_press)

तमिलनाडु में बढ़ा सियासी संग्राम,एआईएडीएमके ने टीवीके सरकार पर लगाया विधायकों की खरीद-फरोख्त का आरोप

चेन्नई,27 मई (युआईटीवी)- तमिलनाडु की राजनीति में मंगलवार को उस समय नया विवाद खड़ा हो गया,जब विपक्षी ऑल इंडिया अन्ना द्रविड़ मुनेत्र कड़गम ने सत्ताधारी तमिलगा वेट्री कझगम सरकार पर गंभीर आरोप लगाए। एआईएडीएमके ने दावा किया कि राज्य सरकार सक्रिय रूप से दलबदल को बढ़ावा दे रही है और विधानसभा में अपनी राजनीतिक स्थिति मजबूत करने के लिए विधायकों की खरीद-फरोख्त में शामिल है। इन आरोपों के बाद राज्य की राजनीति में टकराव और तेज हो गया है।

यह पूरा विवाद विधानसभा में हाल ही में हुए विश्वास प्रस्ताव और उसके बाद सामने आए राजनीतिक घटनाक्रमों से जुड़ा हुआ है। एआईएडीएमके का आरोप है कि उसके कई विधायकों ने पार्टी के आधिकारिक निर्देशों के खिलाफ जाकर सत्ताधारी टीवीके सरकार के पक्ष में मतदान किया। पार्टी का कहना है कि यह केवल व्यक्तिगत फैसला नहीं था,बल्कि इसके पीछे सत्ता पक्ष की सक्रिय भूमिका रही है।

सचिवालय में विधानसभा अध्यक्ष जेसीडी प्रभाकर से मुलाकात के बाद एआईएडीएमके नेताओं ने मीडिया के सामने सरकार पर तीखा हमला बोला। पार्टी के महासचिव एडप्पाडी के. पलानीस्वामी के नेतृत्व वाले गुट के वरिष्ठ विधायक अग्रि कृष्णमूर्ति ने कहा कि एआईएडीएमके नेतृत्व ने अपने सभी विधायकों को स्पष्ट निर्देश दिया था कि वे विश्वास प्रस्ताव के दौरान टीवीके सरकार के खिलाफ मतदान करें। इसके बावजूद पार्टी के 25 विधायकों ने कथित रूप से निर्देशों का उल्लंघन करते हुए सरकार के पक्ष में वोट दिया।

कृष्णमूर्ति ने कहा कि यह मामला केवल अनुशासनहीनता तक सीमित नहीं है,बल्कि लोकतांत्रिक व्यवस्था और दलबदल विरोधी कानून से भी जुड़ा हुआ है। उन्होंने बताया कि मतदान के तुरंत बाद एआईएडीएमके ने विधानसभा अध्यक्ष को याचिका देकर उन विधायकों के खिलाफ कार्रवाई की माँग की थी,जिन्होंने पार्टी लाइन के खिलाफ मतदान किया।

उन्होंने कहा कि पार्टी ने दलबदल विरोधी कानून के तहत इन विधायकों को अयोग्य घोषित करने की माँग की थी,लेकिन अब तक इस मामले में कोई अंतिम फैसला नहीं लिया गया है। कृष्णमूर्ति के अनुसार विधानसभा अध्यक्ष ने पार्टी को सूचित किया कि याचिका अभी विचाराधीन है और इस पर फैसला लिया जाना बाकी है।

एआईएडीएमके नेताओं ने इस दौरान तीन विधायकों के इस्तीफे स्वीकार किए जाने पर भी गंभीर सवाल उठाए। पार्टी का कहना है कि जिन विधायकों के खिलाफ अयोग्यता की कार्यवाही लंबित थी,उनके इस्तीफे स्वीकार करना नियमों और लोकतांत्रिक प्रक्रिया के खिलाफ है। कृष्णमूर्ति ने दावा किया कि पार्टी ने विधानसभा अध्यक्ष से स्पष्ट रूप से अनुरोध किया था कि दलबदल विरोधी याचिका पर निर्णय होने तक किसी भी विधायक का इस्तीफा स्वीकार न किया जाए।

उन्होंने कहा कि ऐसी परिस्थितियों में इस्तीफों को मंजूरी देना बेहद गंभीर विषय है और इससे विधानसभा की प्रक्रियाओं पर सवाल खड़े होते हैं। उनके अनुसार यह कदम भविष्य में एक खतरनाक राजनीतिक परंपरा को जन्म दे सकता है,जहाँ निर्वाचित प्रतिनिधि आसानी से दल बदलकर सत्ता पक्ष का हिस्सा बन सकते हैं।

एआईएडीएमके नेता ने सत्ताधारी टीवीके सरकार पर हमला बोलते हुए कहा कि राज्य सचिवालय अब प्रशासनिक मुख्यालय कम और राजनीतिक गतिविधियों का केंद्र अधिक दिखाई देने लगा है। उन्होंने सवाल उठाया कि क्या सचिवालय तमिलनाडु सरकार का प्रशासनिक केंद्र है या फिर टीवीके पार्टी कार्यालय का विस्तार बन चुका है।

कृष्णमूर्ति ने आरोप लगाया कि राज्य में विधायकों की खरीद-फरोख्त बेहद तेज गति से हो रही है। उन्होंने दावा किया कि कुछ विधायक जैसे ही इस्तीफा देकर बाहर आए,उन्हें कुछ ही मिनटों के भीतर टीवीके के पहचान पत्र जारी कर दिए गए। उनके अनुसार यह इस बात का संकेत है कि पूरी प्रक्रिया पहले से तय थी।

उन्होंने कहा कि यदि इस तरह निर्वाचित प्रतिनिधियों को राजनीतिक निष्ठा बदलने और इस्तीफा देने के लिए प्रोत्साहित किया जाएगा,तो इससे तमिलनाडु की राजनीति में अस्थिरता बढ़ेगी। उन्होंने चेतावनी दी कि ऐसी स्थिति लोकतंत्र के लिए खतरनाक साबित हो सकती है और इससे जनता का राजनीतिक व्यवस्था पर भरोसा कमजोर हो सकता है।

तमिलनाडु की राजनीति में दलबदल का मुद्दा हमेशा संवेदनशील रहा है। राज्य में लंबे समय से द्रविड़ राजनीति का प्रभाव रहा है और राजनीतिक दलों के बीच सत्ता संघर्ष अक्सर काफी तीखा रहा है। ऐसे में वर्तमान विवाद ने राज्य की राजनीति को और गर्म कर दिया है।

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि एआईएडीएमके इस मुद्दे को बड़ा राजनीतिक अभियान बनाने की कोशिश कर रही है। पार्टी का उद्देश्य अपने विधायकों में असंतोष और दलबदल की घटनाओं को जनता के सामने सत्ता पक्ष की साजिश के रूप में पेश करना है। वहीं दूसरी ओर सत्ताधारी टीवीके अब तक इन आरोपों पर कोई विस्तृत आधिकारिक प्रतिक्रिया नहीं दे पाई है।

हालाँकि,राजनीतिक हलकों में यह चर्चा तेज है कि आने वाले दिनों में यह विवाद और गहरा सकता है। यदि दलबदल विरोधी कानून के तहत कार्रवाई होती है तो विधानसभा की संख्या संतुलन पर भी असर पड़ सकता है। दूसरी ओर यदि कार्रवाई नहीं होती तो विपक्ष सरकार और विधानसभा अध्यक्ष दोनों पर दबाव बढ़ा सकता है।

विशेषज्ञों का कहना है कि दलबदल विरोधी कानून का उद्देश्य राजनीतिक स्थिरता बनाए रखना और निर्वाचित प्रतिनिधियों को पार्टी अनुशासन का पालन करने के लिए बाध्य करना है,लेकिन कई बार इस्तीफे और राजनीतिक पुनर्गठन के जरिए इस कानून की भावना को चुनौती दी जाती रही है। तमिलनाडु में मौजूदा विवाद भी उसी तरह के संवैधानिक और राजनीतिक सवाल खड़े कर रहा है।

एआईएडीएमके का आरोप है कि सत्ताधारी दल लोकतांत्रिक संस्थाओं का उपयोग राजनीतिक लाभ के लिए कर रहा है। वहीं सरकार समर्थकों का मानना है कि विधायक अपनी राजनीतिक सोच के आधार पर फैसले लेने के लिए स्वतंत्र हैं। इस बहस ने राज्य की राजनीति को नई दिशा दे दी है।

फिलहाल तमिलनाडु में राजनीतिक माहौल बेहद गर्म बना हुआ है। विधानसभा अध्यक्ष की अगली कार्रवाई और दलबदल विरोधी याचिकाओं पर फैसला अब पूरे विवाद का केंद्र बन गया है। आने वाले दिनों में यह स्पष्ट होगा कि यह मामला केवल राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप तक सीमित रहता है या फिर राज्य की राजनीति में बड़ा बदलाव लेकर आता है।