वाशिंगटन,6 मई (युआईटीवी)- अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ते तनाव के बीच एक अहम कूटनीतिक मोड़ सामने आया है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ‘प्रोजेक्ट फ्रीडम’ अभियान को अस्थायी रूप से रोकने की घोषणा की है। यह अभियान अमेरिका के नेतृत्व में शुरू किया गया था,जिसका उद्देश्य होर्मुज जलडमरूमध्य में जहाजों की सुरक्षित आवाजाही सुनिश्चित करना था। ट्रंप ने इस फैसले के पीछे ईरान के साथ जारी बातचीत में सकारात्मक प्रगति को कारण बताया है, जिससे यह संकेत मिलता है कि दोनों देशों के बीच तनाव कम करने की दिशा में कुछ ठोस प्रयास हो रहे हैं।
राष्ट्रपति ट्रंप ने सोशल मीडिया पर जारी अपने बयान में कहा कि ईरान के साथ समझौते की दिशा में अच्छी प्रगति हो रही है और कई सहयोगी देशों के अनुरोध पर ‘प्रोजेक्ट फ्रीडम’ को कुछ समय के लिए रोकने का निर्णय लिया गया है। हालाँकि,उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि यह केवल आंशिक और अस्थायी कदम है,क्योंकि होर्मुज जलडमरूमध्य में समुद्री नाकेबंदी पहले की तरह जारी रहेगी। इसका मतलब यह है कि क्षेत्र में अमेरिकी सैन्य मौजूदगी और निगरानी अभी भी कायम है।
ट्रंप ने अपने बयान में हाल के अमेरिकी सैन्य अभियानों का भी जिक्र किया और दावा किया कि इन कार्रवाइयों में ईरान की नौसेना को भारी नुकसान पहुँचा है। उन्होंने कहा कि ईरान की नौसेना लगभग पूरी तरह तबाह हो चुकी है और उसकी वायुसेना भी गंभीर रूप से कमजोर हो गई है। ट्रंप के अनुसार, इस सैन्य दबाव के चलते ईरान अब समझौते के लिए अधिक इच्छुक नजर आ रहा है। हालाँकि,इस तरह के दावों की स्वतंत्र पुष्टि अभी तक नहीं हो सकी है,लेकिन इससे यह जरूर स्पष्ट होता है कि अमेरिका इस समय कूटनीति और शक्ति प्रदर्शन दोनों का सहारा ले रहा है।
अमेरिका के रक्षा मंत्री पीट हेगसेथ ने भी इस अभियान को लेकर बयान दिया। उन्होंने कहा कि ‘प्रोजेक्ट फ्रीडम’ के जरिए अमेरिका ने इस महत्वपूर्ण समुद्री मार्ग पर अपनी रणनीतिक पकड़ मजबूत की है। उन्होंने यह भी बताया कि यह जलडमरूमध्य वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति के लिए बेहद अहम है और इसकी सुरक्षा सुनिश्चित करना अमेरिका की प्राथमिकता रही है।
होर्मुज जलडमरूमध्य दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण समुद्री मार्गों में से एक है। यह फारस की खाड़ी को अरब सागर से जोड़ता है और इसके जरिए वैश्विक तेल आपूर्ति का एक बड़ा हिस्सा गुजरता है। अनुमान के मुताबिक दुनिया में इस्तेमाल होने वाले कुल पेट्रोलियम का लगभग पाँचवां हिस्सा इसी रास्ते से होकर जाता है। ऐसे में इस क्षेत्र में किसी भी प्रकार की अस्थिरता का असर सीधे वैश्विक अर्थव्यवस्था पर पड़ सकता है।
ट्रंप ने अपने बयान में एशियाई देशों की इस जलमार्ग पर निर्भरता का भी जिक्र किया। उन्होंने कहा कि जापान अपनी करीब 90 प्रतिशत और दक्षिण कोरिया लगभग 43 प्रतिशत तेल जरूरतों को इसी रास्ते से पूरा करता है। इसके अलावा भारत और चीन जैसे बड़े ऊर्जा आयातक देश भी इस मार्ग पर काफी हद तक निर्भर हैं। यही कारण है कि इन देशों की नजर लगातार इस क्षेत्र की स्थिति पर बनी रहती है और वे किसी भी तरह के तनाव को लेकर चिंतित रहते हैं।
यह घोषणा ऐसे समय में हुई है,जब पिछले कुछ हफ्तों से खाड़ी क्षेत्र में तनाव लगातार बढ़ता जा रहा था। अमेरिका ने ईरान के सैन्य और परमाणु ठिकानों को निशाना बनाते हुए कई हमले किए थे,जिसके बाद दोनों देशों के बीच टकराव की स्थिति बन गई थी। वॉशिंगटन ने बार-बार यह चेतावनी दी थी कि होर्मुज जलडमरूमध्य में व्यावसायिक जहाजों की आवाजाही को बाधित करने की किसी भी कोशिश को बर्दाश्त नहीं किया जाएगा।
ट्रंप ने यह घोषणा व्हाइट हाउस में आयोजित एक कार्यक्रम के कुछ घंटों बाद की,जिसमें युवाओं की फिटनेस और ‘प्रेसिडेंशियल फिटनेस टेस्ट’ पर चर्चा की गई थी। हालाँकि,उस कार्यक्रम के दौरान भी उन्होंने कई बार ईरान और होर्मुज जलडमरूमध्य की स्थिति का जिक्र किया,जिससे यह साफ था कि यह मुद्दा उनकी प्राथमिकताओं में शामिल है।
विशेषज्ञों का मानना है कि ‘प्रोजेक्ट फ्रीडम’ को अस्थायी रूप से रोकने का फैसला एक कूटनीतिक संकेत हो सकता है,जिसका उद्देश्य ईरान के साथ बातचीत को आगे बढ़ाना है। यह कदम तनाव कम करने और संभावित समझौते की राह खोलने में मदद कर सकता है। हालाँकि, चूँकि समुद्री नाकेबंदी अभी भी जारी है,इसलिए यह पूरी तरह से तनाव खत्म होने का संकेत नहीं माना जा सकता।
अंतर्राष्ट्रीय समुदाय भी इस घटनाक्रम पर नजर बनाए हुए है। कई देशों ने पहले ही इस क्षेत्र में स्थिरता बनाए रखने की अपील की है,क्योंकि किसी भी प्रकार का सैन्य संघर्ष वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति को प्रभावित कर सकता है। खासतौर पर तेल की कीमतों में उतार-चढ़ाव से विश्व अर्थव्यवस्था पर व्यापक असर पड़ सकता है।
अमेरिका और ईरान के बीच यह नया घटनाक्रम एक महत्वपूर्ण मोड़ का संकेत देता है। जहाँ एक ओर सैन्य दबाव जारी है,वहीं दूसरी ओर कूटनीतिक प्रयास भी तेज हो गए हैं। आने वाले दिनों में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि यह बातचीत किस दिशा में आगे बढ़ती है और क्या दोनों देशों के बीच कोई ठोस समझौता हो पाता है या नहीं।
