स्टैनफोर्ड में सुंदर पिचाई के भाषण के दौरान छात्रों का वॉकआउट (तस्वीर क्रेडिट@DeccanHerald)

स्टैनफोर्ड में सुंदर पिचाई के भाषण के दौरान छात्रों का वॉकआउट,200 ग्रेजुएट्स ने किया वॉकआउट,गूगल के इजरायल संबंधों को लेकर उठा विरोध

नई दिल्ली,16 जून (युआईटीवी)- दुनिया की सबसे बड़ी प्रौद्योगिकी कंपनियों में से एक गूगल के मुख्य कार्यकारी अधिकारी सुंदर पिचाई को स्टैनफोर्ड यूनिवर्सिटी के दीक्षांत समारोह में उस समय अप्रत्याशित स्थिति का सामना करना पड़ा,जब उनके भाषण के दौरान करीब 200 छात्रों ने विरोध स्वरूप समारोह से बाहर निकलने का फैसला किया। यह घटना ऐसे समय हुई,जब पिचाई विश्वविद्यालय के स्नातक छात्रों को संबोधित कर रहे थे और अपने जीवन के अनुभवों,संघर्षों तथा सफलता की यात्रा को साझा कर रहे थे। हालाँकि,समारोह का उद्देश्य छात्रों को प्रेरित करना था,लेकिन कार्यक्रम के दौरान छात्रों के विरोध ने पूरे आयोजन का ध्यान अपनी ओर खींच लिया।

रिपोर्टों के अनुसार,समारोह में मौजूद छात्रों का एक बड़ा समूह गूगल के इजरायल के साथ कारोबारी संबंधों और कंपनी की कुछ नीतियों का विरोध कर रहा था। प्रदर्शनकारियों का आरोप था कि गूगल ने इजरायली सरकार के साथ ऐसे समझौते किए हैं,जिनका विरोध लंबे समय से मानवाधिकार कार्यकर्ताओं और फिलिस्तीन समर्थक समूहों द्वारा किया जाता रहा है। इसी मुद्दे को लेकर छात्रों ने अपने असंतोष को सार्वजनिक रूप से व्यक्त करने का निर्णय लिया।

दिलचस्प बात यह रही कि स्टैनफोर्ड जैसे तकनीकी और नवाचार केंद्रित विश्वविद्यालय में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस आमतौर पर दीक्षांत समारोहों के प्रमुख विषयों में शामिल रहता है। हाल के वर्षों में तकनीकी क्षेत्र में हो रहे तेजी से बदलावों के कारण अधिकांश वक्ता इस विषय पर विस्तार से चर्चा करते रहे हैं,लेकिन इस बार सुंदर पिचाई ने अपने भाषण में कृत्रिम बुद्धिमत्ता पर कोई विशेष टिप्पणी नहीं की। इसके बजाय उन्होंने अपने व्यक्तिगत जीवन और पेशेवर यात्रा पर ध्यान केंद्रित किया।

अपने संबोधन में उन्होंने भारत में बिताए गए बचपन,सीमित संसाधनों के बीच शिक्षा प्राप्त करने के अनुभव,अमेरिका आने के निर्णय और तकनीकी क्षेत्र में आगे बढ़ने के संघर्षों का उल्लेख किया। उन्होंने बताया कि कैसे उन्होंने कैलिफोर्निया में उच्च शिक्षा प्राप्त करने का फैसला किया और बाद में अपने करियर को नई दिशा देने के लिए कुछ कठिन निर्णय लिए। उन्होंने यह भी साझा किया कि गूगल में शामिल होने के शुरुआती वर्षों में उन्हें कई चुनौतियों का सामना करना पड़ा,लेकिन लगातार प्रयास और धैर्य ने उन्हें सफलता दिलाई।

हालाँकि,उनके भाषण की शुरुआत होते ही विरोध का माहौल स्पष्ट दिखाई देने लगा। रिपोर्टों के अनुसार,जैसे ही सुंदर पिचाई मंच पर पहुँचे,लगभग 200 छात्र अपनी सीटों से उठकर बाहर निकल गए। कई छात्रों ने अपने हाथों में बैनर और पोस्टर लिए हुए थे। कुछ छात्रों ने सीटी बजाकर विरोध जताया,जबकि कुछ ने फिलिस्तीनी झंडे लहराए। इसके बाद वे भाषण के बीच में ही समारोह स्थल से बाहर चले गए।

विरोध करने वाले छात्रों का कहना था कि उनका उद्देश्य केवल एक व्यक्ति का विरोध करना नहीं था,बल्कि उन नीतियों और कारोबारी संबंधों के खिलाफ आवाज उठाना था,जिन्हें वे अनुचित मानते हैं। उनका विशेष विरोध उस बहुचर्चित क्लाउड कंप्यूटिंग परियोजना को लेकर था,जिसके तहत गूगल और अन्य तकनीकी कंपनियों ने इजरायली सरकार के साथ बड़े पैमाने पर तकनीकी सेवाओं से संबंधित समझौते किए थे। फिलिस्तीन समर्थक समूह लंबे समय से इस परियोजना का विरोध करते रहे हैं और उनका आरोप है कि इस प्रकार के समझौते क्षेत्रीय संघर्षों को प्रभावित कर सकते हैं।

हालाँकि,शुरुआती विरोध के बावजूद समारोह पूरी तरह बाधित नहीं हुआ। अधिकांश छात्र अपनी सीटों पर बने रहे और सुंदर पिचाई का भाषण जारी रहा। कार्यक्रम के दौरान कई मौकों पर दर्शकों ने तालियाँ भी बजाईं और उनके कुछ अनुभवों पर हँसी-मजाक के साथ प्रतिक्रिया भी दी। इससे यह स्पष्ट हुआ कि विरोध एक विशेष समूह तक सीमित था,जबकि कई छात्र अभी भी उनके अनुभवों और संदेशों को सुनने में रुचि रखते थे।

विश्लेषकों का मानना है कि यह घटना केवल गूगल या सुंदर पिचाई तक सीमित नहीं है,बल्कि अमेरिकी विश्वविद्यालय परिसरों में पिछले कुछ वर्षों से चल रही व्यापक राजनीतिक और सामाजिक बहस का हिस्सा है। गाजा संघर्ष और उससे जुड़े अंतर्राष्ट्रीय मुद्दों ने विश्वविद्यालयों में छात्रों के बीच गहरी चर्चा और सक्रियता को जन्म दिया है। कई परिसरों में फिलिस्तीन समर्थक प्रदर्शनों का आयोजन किया गया है और विश्वविद्यालय प्रशासन की नीतियों को लेकर भी लगातार सवाल उठाए गए हैं।

स्टैनफोर्ड यूनिवर्सिटी में भी पिछले कुछ वर्षों के दौरान ऐसे कई प्रदर्शन देखने को मिले हैं। छात्रों का एक वर्ग मानता है कि विश्वविद्यालयों और बड़ी कंपनियों को वैश्विक मानवाधिकार मुद्दों पर अधिक जिम्मेदार भूमिका निभानी चाहिए। इसी सोच के तहत कई छात्र दीक्षांत समारोह जैसे बड़े मंचों का उपयोग अपने विचार व्यक्त करने के लिए कर रहे हैं।

इसी क्रम में प्रदर्शनकारियों ने मुख्य समारोह के समानांतर एक वैकल्पिक कार्यक्रम का भी आयोजन किया,जिसे “पीपल्स कमेंसमेंट” नाम दिया गया। इस कार्यक्रम में फिलिस्तीन समर्थक आंदोलन से जुड़े प्रमुख कार्यकर्ताओं को आमंत्रित किया गया था। आयोजकों का उद्देश्य उन मुद्दों पर चर्चा करना था जिन्हें वे मुख्यधारा के मंचों पर पर्याप्त स्थान नहीं मिलने का आरोप लगाते हैं।

यह भी उल्लेखनीय है कि हाल के वर्षों में तकनीकी क्षेत्र से जुड़े कई प्रमुख व्यक्तियों को विश्वविद्यालयों में छात्रों की नाराजगी का सामना करना पड़ा है। पिछले वर्ष एक अन्य अमेरिकी विश्वविद्यालय के दीक्षांत समारोह में भी तकनीकी उद्योग के एक वरिष्ठ नेता को कृत्रिम बुद्धिमत्ता पर टिप्पणी करने के बाद छात्रों के विरोध का सामना करना पड़ा था। इससे यह संकेत मिलता है कि नई पीढ़ी केवल तकनीकी प्रगति से प्रभावित नहीं है,बल्कि वह कंपनियों की सामाजिक और राजनीतिक जिम्मेदारियों को लेकर भी सवाल पूछ रही है।

स्टैनफोर्ड में हुई यह घटना आधुनिक विश्वविद्यालय परिसरों में बदलते माहौल को दर्शाती है,जहाँ छात्र केवल शिक्षा और करियर तक सीमित नहीं रहना चाहते,बल्कि वैश्विक मुद्दों पर अपनी आवाज भी बुलंद करना चाहते हैं। सुंदर पिचाई का भाषण भले ही व्यक्तिगत संघर्ष और सफलता की कहानी पर केंद्रित रहा हो,लेकिन समारोह में हुआ विरोध यह दिखाता है कि आज के छात्र तकनीकी कंपनियों की भूमिका और उनकी वैश्विक नीतियों पर भी गंभीर चर्चा चाहते हैं। यही कारण है कि यह घटना केवल एक दीक्षांत समारोह की खबर नहीं,बल्कि तकनीक,राजनीति और युवा पीढ़ी के बदलते दृष्टिकोण की एक महत्वपूर्ण झलक बनकर सामने आई है।