यरूशलम,10 जुलाई (युआईटीवी)- मिडिल ईस्ट में लगातार गहराते सुरक्षा संकट और बढ़ते सैन्य तनाव के बीच इजरायल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू और अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के बीच एक महत्वपूर्ण टेलीफोन वार्ता हुई। ऐसे समय में हुई यह बातचीत बेहद अहम मानी जा रही है,जब क्षेत्र में ईरान,इजरायल और अमेरिका के बीच तनाव लगातार बढ़ रहा है और कई मोर्चों पर सैन्य गतिविधियाँ तेज हो गई हैं। दोनों नेताओं ने मौजूदा हालात की समीक्षा करने के साथ-साथ क्षेत्रीय सुरक्षा,सामरिक सहयोग और विभिन्न मोर्चों पर आपसी तालमेल बनाए रखने पर सहमति व्यक्त की।
प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू के कार्यालय की ओर से जारी आधिकारिक बयान के अनुसार,बातचीत के दौरान अमेरिका और इजरायल के बीच रणनीतिक समन्वय को और मजबूत बनाने पर विशेष जोर दिया गया। बयान में कहा गया कि दोनों नेताओं ने इस बात पर सहमति जताई कि मौजूदा परिस्थितियों में दोनों देशों के बीच निरंतर संवाद और सुरक्षा सहयोग अत्यंत आवश्यक है। बदलते हालात को देखते हुए दोनों पक्ष भविष्य में भी करीबी संपर्क बनाए रखेंगे।
समाचार एजेंसी शिन्हुआ की रिपोर्ट के अनुसार,बातचीत के दौरान अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने प्रधानमंत्री नेतन्याहू को खाड़ी क्षेत्र में अमेरिका की सैन्य और रणनीतिक गतिविधियों की जानकारी भी दी। हालाँकि,बयान में इन गतिविधियों का विस्तृत विवरण साझा नहीं किया गया,लेकिन माना जा रहा है कि दोनों नेताओं ने ईरान की गतिविधियों, समुद्री सुरक्षा और क्षेत्रीय स्थिरता से जुड़े महत्वपूर्ण मुद्दों पर विस्तार से चर्चा की।
बातचीत के दौरान प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने तुर्की के राष्ट्रपति रेसेप तैयप एर्दोगन और उनके सहयोगियों की ओर से इजरायल के संबंध में की गई टिप्पणियों का मुद्दा भी उठाया। नेतन्याहू के कार्यालय ने इसे गंभीर विषय बताया,हालाँकि,यह स्पष्ट नहीं किया गया कि किन विशेष बयानों का उल्लेख किया गया। हाल के दिनों में इजरायल और तुर्की के बीच बयानबाजी तेज हुई है,जिससे दोनों देशों के संबंधों में तनाव और बढ़ गया है।
तुर्की के राष्ट्रपति रेसेप तैयप एर्दोगन ने हाल ही में इजरायल पर अमेरिका और ईरान के बीच चल रही कूटनीतिक प्रक्रिया को कमजोर करने का आरोप लगाया था। उन्होंने इजरायली सरकार को “युद्ध की आदी” बताते हुए उसके सैन्य रुख की भी आलोचना की थी। एर्दोगन के इन बयानों के बाद इजरायल के कई वरिष्ठ अधिकारियों ने कड़ी प्रतिक्रिया व्यक्त की और तुर्की के रुख पर गंभीर चिंता जताई।
इजरायल ने तुर्की को संभावित रूप से एफ-35 लड़ाकू विमान बेचे जाने की संभावना पर भी अपनी चिंता व्यक्त की है। इजरायली नेतृत्व का मानना है कि यदि तुर्की को इस प्रकार की आधुनिक सैन्य तकनीक उपलब्ध कराई जाती है,तो इससे क्षेत्रीय शक्ति संतुलन प्रभावित हो सकता है। हालाँकि,इस विषय पर अभी कोई अंतिम निर्णय सामने नहीं आया है,लेकिन यह मुद्दा भी दोनों देशों के बीच बढ़ते तनाव का कारण बना हुआ है।
प्रधानमंत्री नेतन्याहू और राष्ट्रपति ट्रंप के बीच यह बातचीत ऐसे समय में हुई है,जब अमेरिका और ईरान के बीच सैन्य तनाव एक बार फिर गंभीर रूप ले चुका है। मंगलवार रात से गुरुवार तक दोनों देशों के बीच नए सिरे से सैन्य कार्रवाई की घटनाएँ सामने आई हैं। इन घटनाओं ने पूरे मिडिल ईस्ट में सुरक्षा संबंधी चिंताओं को और बढ़ा दिया है तथा अंतर्राष्ट्रीय समुदाय की नजरें इस क्षेत्र पर टिक गई हैं।
रिपोर्टों के अनुसार,होर्मुज जलडमरूमध्य से गुजरने वाले जहाजों पर ईरान की ओर से किए गए हालिया हमलों के जवाब में अमेरिका ने ईरान के भीतर कई ठिकानों को निशाना बनाया। इन हमलों में विभिन्न सैन्य और रणनीतिक ठिकानों को नुकसान पहुँचा है। साथ ही जान-माल की हानि और बुनियादी ढाँचे को भी क्षति पहुँचने की खबरें सामने आई हैं। इन घटनाओं के बाद पूरे क्षेत्र में तनाव और अधिक बढ़ गया है तथा किसी बड़े संघर्ष की आशंका भी व्यक्त की जा रही है।
होर्मुज जलडमरूमध्य दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण समुद्री व्यापार मार्गों में से एक माना जाता है। यहाँ से बड़ी मात्रा में कच्चे तेल और ऊर्जा संसाधनों का परिवहन होता है। इस क्षेत्र में बढ़ती सैन्य गतिविधियाँ वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति और अंतर्राष्ट्रीय व्यापार के लिए भी चिंता का विषय बन गई हैं। कई देशों ने स्थिति पर नजर बनाए रखते हुए संयम बरतने की अपील की है।
इस बीच इजरायल ने भी अपनी सुरक्षा तैयारियों को और मजबूत कर दिया है। इजरायली सेना के प्रमुख एयाल जमीर ने कहा कि सेना ईरान और लेबनान में हो रही गतिविधियों पर लगातार और बारीकी से नजर रख रही है। उन्होंने स्पष्ट किया कि यदि राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए किसी प्रकार का खतरा उत्पन्न होता है तो सेना तत्काल कार्रवाई करने के लिए पूरी तरह तैयार है। उनके अनुसार इजरायल किसी भी संभावित चुनौती का सामना करने के लिए अपनी सैन्य क्षमता और सतर्कता बनाए हुए है।
इजरायल के रक्षा मंत्री इजरायल काट्ज ने भी सेना की तैयारियों को लेकर स्पष्ट संदेश दिया। उन्होंने कहा कि इजरायली सेना पूरी तरह सतर्क है और आवश्यकता पड़ने पर सैन्य अभियान दोबारा शुरू करने के लिए तैयार है। उन्होंने यह भी दोहराया कि राष्ट्रीय सुरक्षा के मुद्दे पर इजरायल किसी भी प्रकार का समझौता नहीं करेगा और अपने नागरिकों की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए हर आवश्यक कदम उठाएगा।
रक्षा मंत्री इजरायल काट्ज ने लेबनान में इजरायली सैन्य उपस्थिति को लेकर भी सरकार का रुख स्पष्ट किया। उन्होंने कहा कि इजरायली सेना तब तक लेबनान में बनी रहेगी,जब तक हिज्बुल्लाह के सभी हथियार पूरी तरह जब्त नहीं कर लिए जाते। उनके अनुसार यह कदम केवल इजरायल की सुरक्षा सुनिश्चित करने के उद्देश्य से उठाया गया है और इसमें किसी प्रकार का राजनीतिक दबाव स्वीकार नहीं किया जाएगा।
काट्ज के कार्यालय की ओर से जारी बयान में कहा गया कि इजरायल ने लेबनान में प्रवेश करने के लिए किसी से अनुमति नहीं माँगी थी और वहाँ अपनी सैन्य मौजूदगी बनाए रखने के लिए भी उसे किसी की अनुमति की आवश्यकता नहीं है। इस बयान को इजरायल की कठोर सुरक्षा नीति का स्पष्ट संकेत माना जा रहा है। इससे यह भी स्पष्ट होता है कि सरकार फिलहाल अपनी सैन्य रणनीति में किसी प्रकार का बदलाव करने के पक्ष में नहीं है।
मिडिल ईस्ट में तेजी से बदलते घटनाक्रमों के बीच अमेरिका और इजरायल के बीच बढ़ता समन्वय क्षेत्रीय राजनीति का महत्वपूर्ण पहलू बनकर उभरा है। दूसरी ओर ईरान,तुर्की और लेबनान से जुड़े मुद्दों ने सुरक्षा स्थिति को और अधिक जटिल बना दिया है। लगातार हो रही सैन्य गतिविधियाँ और तीखी बयानबाजी यह संकेत दे रही हैं कि क्षेत्र में तनाव अभी जल्द कम होने की संभावना नहीं है।
अंतर्राष्ट्रीय समुदाय की निगाहें अब आने वाले दिनों के घटनाक्रम पर टिकी हुई हैं। कूटनीतिक प्रयासों और सैन्य तैयारियों के बीच यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि संबंधित देश तनाव कम करने की दिशा में आगे बढ़ते हैं या फिर क्षेत्र में टकराव का दायरा और व्यापक होता है। फिलहाल इजरायल,अमेरिका और उनके सहयोगी देश सुरक्षा स्थिति पर लगातार नजर बनाए हुए हैं,जबकि पूरे मिडिल ईस्ट में हालात बेहद संवेदनशील बने हुए हैं।
