ट्रंप प्रशासन के नए टैरिफ पर 25 अमेरिकी राज्यों का मुकदमा (तस्वीर क्रेडिट@rashtra_press)

ट्रंप प्रशासन के नए टैरिफ पर 25 अमेरिकी राज्यों का मुकदमा,कानूनी अधिकारों के दुरुपयोग का लगाया आरोप

न्यूयॉर्क,4 अगस्त (युआईटीवी)- अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के प्रशासन द्वारा कई देशों से आयात होने वाले सामान पर लगाए गए नए टैरिफ को लेकर कानूनी विवाद और गहरा गया है। अमेरिका के 25 राज्यों के एक समूह ने ट्रंप प्रशासन के खिलाफ संयुक्त रूप से मुकदमा दायर करते हुए आरोप लगाया है कि राष्ट्रपति ने अपने संवैधानिक और वैधानिक अधिकारों की सीमा से बाहर जाकर व्यापक आयात शुल्क लागू किए हैं। राज्यों का कहना है कि इन टैरिफ का सीधा असर आम उपभोक्ताओं,छोटे कारोबारों और स्थानीय अर्थव्यवस्था पर पड़ रहा है तथा इनकी वजह से आवश्यक वस्तुओं की कीमतों में बढ़ोतरी हो रही है।

अमेरिकी अंतर्राष्ट्रीय व्यापार न्यायालय में दायर याचिका में राज्यों ने हाल ही में लागू किए गए उन नए आयात शुल्कों को चुनौती दी है,जिनके तहत लगभग 60 व्यापारिक साझेदार देशों और अर्थव्यवस्थाओं से आने वाले अधिकांश उत्पादों पर 10 प्रतिशत या 12.5 प्रतिशत तक का अतिरिक्त कर लगाया गया है। मुकदमा दायर करने वाले राज्यों का दावा है कि जिन देशों पर यह शुल्क लागू किया गया है,वे अमेरिका के कुल आयात का लगभग 99.4 प्रतिशत हिस्सा रखते हैं। ऐसे में इन टैरिफ का प्रभाव केवल विदेशी व्यापार तक सीमित नहीं रहेगा,बल्कि अमेरिकी उपभोक्ताओं और उद्योगों पर भी व्यापक रूप से पड़ेगा।

याचिका में अदालत से माँग की गई है कि इन टैरिफ को तत्काल प्रभाव से रोका जाए, उन्हें गैर-कानूनी घोषित किया जाए और जिन आयातकों से पहले ही यह अतिरिक्त कर वसूला जा चुका है,उन्हें उसकी वापसी का आदेश दिया जाए। राज्यों का कहना है कि यदि यह व्यवस्था जारी रहती है,तो आयात लागत बढ़ेगी,जिसका बोझ अंततः आम नागरिकों को अधिक कीमतों के रूप में उठाना पड़ेगा।

मुकदमे में ट्रंप प्रशासन की उस रणनीति पर भी सवाल उठाया गया है जिसके तहत पहले अदालतों द्वारा खारिज किए जा चुके टैरिफ ढाँचे को नए कानूनी आधारों के माध्यम से फिर से लागू करने का प्रयास किया गया। राज्यों का आरोप है कि प्रशासन ने वर्ष 1974 के व्यापार अधिनियम की धारा 301 और जबरन श्रम से जुड़े प्रावधानों का उपयोग केवल औपचारिक आधार के रूप में किया है,जबकि वास्तविक उद्देश्य पहले से निरस्त किए जा चुके वैश्विक टैरिफ ढाँचे को दोबारा लागू करना था।

याचिकाकर्ताओं का कहना है कि सर्वोच्च न्यायालय पहले ही व्यापक टैरिफ व्यवस्था के एक पुराने स्वरूप को अमान्य घोषित कर चुका है। इसके बावजूद प्रशासन ने लगभग उसी प्रकार की शुल्क व्यवस्था को अलग कानूनी आधारों के सहारे लागू करने का प्रयास किया है, जो न्यायिक निर्णय की भावना के विपरीत है। राज्यों का तर्क है कि राष्ट्रपति को व्यापार नीति से जुड़े निर्णय लेने का अधिकार अवश्य है,लेकिन वह अधिकार कानून द्वारा निर्धारित सीमाओं के भीतर ही प्रयोग किया जा सकता है।

न्यूयॉर्क की गवर्नर कैथी होचुल ने इस मामले पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि राष्ट्रपति ट्रंप के नए टैरिफ आम मेहनतकश परिवारों पर अतिरिक्त आर्थिक बोझ डालने के समान हैं। उनके अनुसार इन शुल्कों के कारण किराने का सामान,घरेलू उपयोग की वस्तुएँ,निर्माण सामग्री और रोजमर्रा की जरूरत के कई उत्पाद महँगे हो रहे हैं। उन्होंने कहा कि इन बढ़ी हुई कीमतों का सीधा असर उन परिवारों पर पड़ेगा जो पहले से ही महँगाई का सामना कर रहे हैं।

ओरेगन के अटॉर्नी जनरल डैन रेफील्ड ने भी मुकदमे का समर्थन करते हुए कहा कि यह केवल व्यापार नीति का मुद्दा नहीं है,बल्कि स्थानीय व्यवसायों और उपभोक्ताओं की आर्थिक सुरक्षा का भी प्रश्न है। उन्होंने कहा कि यह ट्रंप प्रशासन के खिलाफ इस विषय पर तीसरा मुकदमा है और उनका उद्देश्य उन नीतियों को चुनौती देना है,जिनसे छोटे व्यापारियों और आम नागरिकों पर अतिरिक्त आर्थिक दबाव पड़ रहा है। उन्होंने कहा कि यदि टैरिफ इसी प्रकार लागू रहे तो स्थानीय उद्योगों की लागत बढ़ेगी और प्रतिस्पर्धा प्रभावित होगी।

न्यूयॉर्क की अटॉर्नी जनरल लेटिटिया जेम्स ने भी प्रशासन पर निशाना साधते हुए कहा कि न्यायालय में पहले मिली कानूनी चुनौती के बावजूद सरकार एक बार फिर नए शुल्कों के माध्यम से परिवारों और व्यवसायों पर अतिरिक्त कर का बोझ डालने का प्रयास कर रही है। उनके अनुसार यह कदम न केवल कानूनी रूप से संदिग्ध है,बल्कि आर्थिक दृष्टि से भी नुकसानदायक साबित हो सकता है।

हालाँकि,व्हाइट हाउस ने इन आरोपों को पूरी तरह खारिज कर दिया है। प्रशासन का कहना है कि व्यापार अधिनियम की धारा 301 के तहत लगाए गए टैरिफ पूरी तरह कानूनी हैं और इनका उद्देश्य अमेरिकी उद्योगों तथा राष्ट्रीय आर्थिक हितों की रक्षा करना है। व्हाइट हाउस के अनुसार राष्ट्रपति के पहले कार्यकाल में भी इसी कानूनी प्रावधान के तहत लगाए गए शुल्क प्रभावी साबित हुए थे और वर्तमान प्रशासन भी उसी वैधानिक अधिकार के तहत कार्रवाई कर रहा है।

ट्रंप प्रशासन का तर्क है कि वैश्विक व्यापार में अमेरिका के हितों की रक्षा करना उसकी प्राथमिक जिम्मेदारी है। प्रशासन का मानना है कि कुछ व्यापारिक साझेदारों की नीतियों के कारण अमेरिकी उद्योगों को नुकसान हुआ है और ऐसे में आयात शुल्क लगाना घरेलू उत्पादन को प्रोत्साहन देने तथा निष्पक्ष व्यापार सुनिश्चित करने के लिए आवश्यक कदम है।

इस मुकदमे में न्यूयॉर्क के अलावा एरिज़ोना,कैलिफोर्निया,कोलोराडो,कनेक्टिकट, डेलावेयर,हवाई,इलिनोइस,केंटकी,मैसाचुसेट्स,मैरीलैंड,मेन,मिशिगन,मिनेसोटा,नेवादा,न्यू जर्सी,न्यू मैक्सिको,नॉर्थ कैरोलिना,ओरेगन,पेंसिल्वेनिया,रोड आइलैंड,वर्जीनिया,वर्मोंट, वाशिंगटन और विस्कॉन्सिन सहित कुल 25 राज्य शामिल हैं। इतने बड़े स्तर पर राज्यों का एकजुट होकर अदालत का दरवाजा खटखटाना इस मामले के राजनीतिक और आर्थिक महत्व को भी दर्शाता है।

यह मुकदमा हाल के दिनों में नए टैरिफ के खिलाफ दायर दूसरा बड़ा कानूनी मामला है। इससे पहले छोटे व्यवसायों के एक समूह ने भी ट्रंप प्रशासन के खिलाफ अदालत में याचिका दायर की थी। उस याचिका में भी यही तर्क दिया गया था कि प्रशासन सर्वोच्च न्यायालय के पहले के निर्णयों को दरकिनार करते हुए नई कानूनी शक्तियों का सहारा लेकर व्यापक टैरिफ व्यवस्था लागू नहीं कर सकता।

अब इस मामले पर सबकी नजर अमेरिकी अंतर्राष्ट्रीय व्यापार न्यायालय की सुनवाई पर रहेगी। यदि अदालत राज्यों की दलीलों को स्वीकार करती है,तो ट्रंप प्रशासन की व्यापार नीति को बड़ा झटका लग सकता है। वहीं यदि अदालत प्रशासन के पक्ष में फैसला देती है, तो सरकार को अपनी टैरिफ नीति लागू रखने का कानूनी आधार और मजबूत मिलेगा। फिलहाल यह मामला अमेरिकी व्यापार नीति,संघीय अधिकारों और न्यायिक समीक्षा के बीच एक महत्वपूर्ण कानूनी संघर्ष के रूप में देखा जा रहा है,जिसका असर केवल अमेरिका ही नहीं,बल्कि वैश्विक व्यापार और अंतर्राष्ट्रीय आर्थिक संबंधों पर भी पड़ सकता है।