प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप (तस्वीर क्रेडिट@MadhurYadav214)

ट्रंप ने रूस से तेल खरीदने वाले देशों पर 100% टैरिफ लगाने का आदेश दिया,फिर तुरंत दी छूट; भारत को बड़ी राहत, रुबियो के दौरे से पहले फैसला

वाशिंगटन,17 अक्टूबर (युआईटीवी)- अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने रूस से कच्चा तेल और प्राकृतिक गैस खरीदने वाले देशों पर भारी आयात शुल्क लगाने से जुड़े कानून को लागू करने का आदेश जारी किया है। हालाँकि,इस आदेश में उन्होंने प्रस्तावित दंडात्मक शुल्क को तत्काल प्रभाव से माफ भी कर दिया। इस फैसले से भारत और चीन जैसे देशों को फिलहाल 100 प्रतिशत तक अतिरिक्त आयात शुल्क का सामना करने से राहत मिल गई है। यह घटनाक्रम ऐसे समय में सामने आया है,जब अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो भारत और मध्य एशिया के दौरे पर रवाना हो रहे हैं। ऐसे में अमेरिकी व्यापार नीति, रूस से भारत की ऊर्जा खरीद और भारत-अमेरिका संबंधों को लेकर इस फैसले को महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

व्हाइट हाउस की ओर से शुक्रवार देर रात जारी आदेश के जरिए ‘लिंडसे ओ. ग्राहम सैंक्शन्स रशिया एंड ईरान एक्ट 2026’ को लागू किया गया। ट्रंप ने इस कानून पर 18 सितंबर को हस्ताक्षर किए थे। इसके तहत रूस से तेल और गैस खरीदने वाले प्रमुख देशों पर अतिरिक्त शुल्क लगाने की व्यवस्था की गई थी। कानून में निर्धारित 30 दिनों की समयसीमा 18 अक्टूबर को पूरी हो रही थी। हालाँकि,ट्रंप के नए आदेश ने इन दंडात्मक उपायों को लागू करने के साथ ही तत्काल छूट दे दी,जिससे संभावित शुल्क का प्रभाव फिलहाल टल गया।

इस फैसले की सबसे अहम बात यह है कि अमेरिका ने रूस से ऊर्जा खरीदने वाले देशों पर दबाव बनाने के लिए कानूनी रास्ता खुला रखा है,लेकिन तत्काल आर्थिक कार्रवाई से परहेज किया है। आदेश में किसी देश का नाम लेकर छूट नहीं दी गई है। इसके बजाय शुल्क और संबंधित प्रतिबंधों को व्यापक रूप से निलंबित किया गया है। इसका मतलब है कि भारत को फिलहाल राहत जरूर मिली है,लेकिन भविष्य में अमेरिकी प्रशासन फिर से कार्रवाई करने का विकल्प अपने पास रखता है।

नए कानून के तहत अमेरिकी राष्ट्रपति को रूस से तेल और प्राकृतिक गैस खरीदने वाले पाँच सबसे बड़े आयातक देशों से आने वाले सामान पर 100 प्रतिशत तक अतिरिक्त शुल्क लगाने का अधिकार दिया गया था। यह प्रावधान उन देशों पर आर्थिक दबाव बनाने के उद्देश्य से रखा गया था,जो रूस के ऊर्जा कारोबार से जुड़े हुए हैं और जिनकी खरीद से रूसी सरकार को राजस्व प्राप्त होता है।

आदेश के मुताबिक,यदि कोई देश 18 अक्टूबर 2026 या उसके बाद रूस से नया कच्चा तेल या प्राकृतिक गैस खरीदता है,तो संबंधित प्रावधानों के तहत उसके सामान पर अतिरिक्त आयात शुल्क लगाया जा सकता है। इसके अतिरिक्त,रूस पर लागू तेल प्रतिबंधों से बचने में मदद करने वाले शीर्ष पाँच देशों या संस्थाओं से आने वाले सामान पर भी 100 प्रतिशत तक अतिरिक्त शुल्क लगाने की व्यवस्था की गई थी।

कानून में रूस से आने वाले सामान पर शुल्क को 500 प्रतिशत तक बढ़ाने की संभावना से संबंधित प्रावधान भी शामिल है। इस तरह प्रस्तावित व्यवस्था का दायरा केवल रूसी ऊर्जा खरीदने वाले देशों तक सीमित नहीं था,बल्कि रूस के ऊर्जा व्यापार पर लगे प्रतिबंधों को निष्प्रभावी करने में मदद करने वाले देशों और संस्थाओं को भी निशाना बना सकता था।

ऐसे शुल्क लागू होने की स्थिति में संबंधित देशों से अमेरिका को होने वाले निर्यात की लागत काफी बढ़ सकती थी। 100 प्रतिशत अतिरिक्त शुल्क का अर्थ यह है कि किसी उत्पाद पर लागू अन्य शुल्कों के अलावा उसके सीमा शुल्क मूल्य के बराबर अतिरिक्त शुल्क लगाया जा सकता है। हालाँकि,वास्तविक प्रभाव उत्पादों, लागू नियमों और शुल्क की गणना के आधार पर अलग-अलग हो सकता है।

भारत के लिए यह व्यवस्था विशेष रूप से महत्वपूर्ण थी,क्योंकि वह रूस से कच्चा तेल खरीदने वाले प्रमुख देशों में शामिल है। भारतीय निर्यातकों को अमेरिकी बाजार में संभावित अतिरिक्त शुल्क का सामना करना पड़ सकता था,लेकिन ट्रंप के नए आदेश ने फिलहाल इस आशंका को टाल दिया है।

व्हाइट हाउस के आदेश की धारा चार में दंडात्मक शुल्कों और संबंधित उपायों को तत्काल निलंबित करने का प्रावधान किया गया है। ट्रंप ने आदेश में कहा कि वह ग्राहम कानून की संबंधित धाराओं के तहत लगाए जाने वाले शुल्कों को माफ कर रहे हैं। इस छूट के कारण कानून के तहत प्रस्तावित अतिरिक्त शुल्क फिलहाल लागू नहीं होंगे।

इसके अलावा,कानून के तहत विदेशी व्यक्तियों और संस्थाओं पर लगाए जा सकने वाले अधिकांश प्रतिबंधों से भी छूट दी गई है। आदेश में यह व्यवस्था रखी गई है कि छूट तब तक जारी रहेगी,जब तक राष्ट्रपति या विदेश मंत्री,वित्त मंत्री और अमेरिकी व्यापार प्रतिनिधि से विचार-विमर्श करने के बाद यह फैसला नहीं कर लेते कि आगे कार्रवाई करने की जरूरत है।

इसका अर्थ है कि छूट के लिए कोई निश्चित समाप्ति तिथि निर्धारित नहीं की गई है। प्रशासन भविष्य की परिस्थितियों के आधार पर इसे जारी रख सकता है या संबंधित उपायों को फिर से सक्रिय कर सकता है।

ट्रंप ने यह भी कहा कि उन्होंने कांग्रेस को आवश्यक लिखित प्रमाणन भेज दिया है। इस प्रमाणन में यह बताया गया है कि संबंधित छूट अमेरिकी राष्ट्रीय हित में है। इसके साथ ही फैसले के कारणों को स्पष्ट करने वाली रिपोर्ट भी भेजी गई है। हालाँकि,आदेश जारी होने के समय न तो प्रमाणन और न ही संबंधित रिपोर्ट सार्वजनिक की गई थी।

इसलिए फिलहाल यह स्पष्ट नहीं है कि प्रशासन ने छूट देने के लिए कौन-कौन से विशिष्ट आर्थिक,कूटनीतिक या रणनीतिक कारणों को प्रमुखता दी है,लेकिन आदेश की भाषा से यह जरूर स्पष्ट होता है कि अमेरिकी सरकार ने रूस से ऊर्जा खरीदने वाले देशों पर भविष्य में दबाव बनाने की संभावना समाप्त नहीं की है।

दंडात्मक शुल्कों से राहत मिलने के बावजूद अमेरिकी प्रशासन ने रूस के ऊर्जा कारोबार की निगरानी जारी रखने का फैसला किया है। आदेश के तहत अमेरिकी व्यापार प्रतिनिधि को विदेश विभाग, वित्त विभाग और ऊर्जा विभाग के साथ मिलकर यह पता लगाने का निर्देश दिया गया है कि कौन-कौन से देश रूस से कच्चा तेल और प्राकृतिक गैस खरीद रहे हैं।

व्यापार प्रतिनिधि को उन पाँच प्रमुख देशों की पहचान भी करनी होगी,जो रूस पर लगाए गए तेल प्रतिबंधों से बचने में उसकी मदद कर रहे हैं। इस निगरानी के आधार पर भविष्य में किसी अतिरिक्त कार्रवाई की जरूरत महसूस होने पर राष्ट्रपति को जानकारी दी जाएगी।

यह व्यवस्था बताती है कि तत्काल शुल्क हटाने के बावजूद अमेरिका रूस की ऊर्जा आय को लेकर अपनी चिंता बनाए हुए है। प्रशासन के पास संबंधित देशों की ऊर्जा खरीद, व्यापारिक गतिविधियों और प्रतिबंधों से बचने के कथित प्रयासों की समीक्षा करने का विकल्प रहेगा।

आदेश में यह भी स्पष्ट किया गया है कि इससे रूस पर पहले से लागू अमेरिकी प्रतिबंधों में कोई बदलाव नहीं होगा। रूस से संबंधित मौजूदा प्रतिबंध और अन्य दंडात्मक उपाय पहले की तरह प्रभावी रहेंगे। यानी नए कानून के तहत कुछ शुल्कों और प्रतिबंधों से छूट देने का अर्थ रूस पर लागू सभी अमेरिकी प्रतिबंधों को समाप्त करना नहीं है।

इसके अलावा,कानून के तहत राष्ट्रपति की कुछ शक्तियाँ विदेश मंत्री,वित्त मंत्री,अमेरिकी व्यापार प्रतिनिधि और ऊर्जा मंत्री को सौंप दी गई हैं। इनमें कुछ परिस्थितियों में छूट देने का अधिकार भी शामिल है,जिसे विदेश मंत्री को सौंपने का प्रावधान किया गया है। इससे प्रशासन के भीतर संबंधित निर्णय लेने की प्रक्रिया को आगे बढ़ाने का अधिकार विभिन्न विभागों को मिल सकता है।

भारत रूस से कच्चे तेल का बड़ा आयातक है। यूक्रेन युद्ध के बाद रूस से मिलने वाले तेल की कीमतों और उपलब्धता ने भारत की ऊर्जा खरीद रणनीति में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। भारत अपनी घरेलू जरूरतों को पूरा करने के लिए विभिन्न देशों से तेल खरीदता है और आयात लागत को नियंत्रित रखना उसकी ऊर्जा नीति का अहम हिस्सा है।

रूस से तेल खरीदने के मुद्दे पर भारत और अमेरिका के बीच पहले भी व्यापारिक तनाव सामने आ चुका है। फरवरी में अमेरिका ने भारत पर रूस से तेल खरीदने के कारण लगाया गया अतिरिक्त 25 प्रतिशत शुल्क हटा दिया था। इसके साथ ही,दोनों देशों के बीच हुए समझौते के तहत भारतीय सामान पर अमेरिकी पारस्परिक शुल्क को भी 25 प्रतिशत से घटाकर 18 प्रतिशत कर दिया गया था।

इस पृष्ठभूमि में नया अमेरिकी आदेश भारतीय निर्यातकों के लिए राहत लेकर आया है। यदि 100 प्रतिशत तक अतिरिक्त शुल्क लागू हो जाता,तो अमेरिकी बाजार में भारतीय वस्तुओं की कीमत बढ़ने और उनकी प्रतिस्पर्धात्मक क्षमता प्रभावित होने का जोखिम पैदा हो सकता था। फिलहाल इस तरह की तत्काल अतिरिक्त लागत से बचाव हुआ है।

हालाँकि,यह राहत केवल प्रस्तावित नए शुल्कों से संबंधित है। इससे पहले से लागू अन्य व्यापारिक शुल्कों या रूस से जुड़े मौजूदा अमेरिकी प्रतिबंधों में अपने आप कोई बदलाव नहीं होता। भारतीय कंपनियों के लिए अमेरिकी बाजार में वास्तविक लागत पहले से लागू शुल्कों और संबंधित व्यापार नियमों पर निर्भर करेगी।

भारत और अमेरिका के बीच व्यापार समझौते के पहले चरण को अंतिम रूप देने की कोशिशें भी जारी हैं। ऐसे समय में रूसी तेल खरीदने वाले देशों पर संभावित शुल्कों को निलंबित करने का फैसला दोनों देशों के बीच व्यापारिक बातचीत के लिए महत्वपूर्ण पृष्ठभूमि तैयार करता है। हालाँकि,इस आदेश को दोनों देशों के व्यापार समझौते से सीधे जोड़ने के लिए किसी स्पष्ट आधिकारिक घोषणा का इंतजार करना होगा।

ट्रंप के फैसले से पहले अमेरिकी कांग्रेस के कुछ सांसदों ने रूस के खिलाफ प्रतिबंधों को पूरी तरह लागू करने की माँग की थी। गुरुवार को रिपब्लिकन सांसद माइकल मैककॉल और डेमोक्रेट सांसद जिम कोस्टा ने राष्ट्रपति को संयुक्त पत्र लिखकर ग्राहम कानून को निर्धारित समयसीमा तक पूरी तरह लागू करने का आग्रह किया था।

पत्र में सांसदों ने कहा था कि यदि किसी देश को छूट दी जाती है,तो वह सीमित अवधि के लिए होनी चाहिए और उसका संबंध रूस को मिलने वाले आर्थिक समर्थन में वास्तविक कमी से होना चाहिए। उनका तर्क था कि रूस के ऊर्जा कारोबार पर प्रभावी दबाव बनाए रखने के लिए प्रतिबंधों को स्पष्ट और प्रभावी तरीके से लागू करना जरूरी है।

लेकिन शुक्रवार देर रात जारी आदेश में छूट की कोई निश्चित समयसीमा नहीं रखी गई। इस कारण प्रशासन के फैसले और सांसदों की माँग के बीच अंतर दिखाई देता है। जहाँ कुछ सांसद प्रतिबंधों को लागू करने और छूट को सीमित रखने पर जोर दे रहे थे,वहीं ट्रंप ने फिलहाल दंडात्मक शुल्कों को निलंबित कर दिया।

यह मतभेद अमेरिकी नीति के सामने मौजूद चुनौती को भी दर्शाता है। एक तरफ रूस को ऊर्जा से होने वाली कमाई सीमित करने का लक्ष्य है,तो दूसरी ओर अंतर्राष्ट्रीय व्यापार, ईंधन की आपूर्ति और अमेरिका के आर्थिक हितों को ध्यान में रखना पड़ता है।

ट्रंप का यह फैसला अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो के भारत दौरे से ठीक पहले सामने आया है। रुबियो 17 से 22 अक्टूबर के बीच समरकंद,मुंबई और जामनगर की यात्रा करेंगे। उनके कार्यक्रम में भारत के साथ रणनीतिक और आर्थिक संबंधों से जुड़े मुद्दों पर बातचीत की संभावना है।

20 अक्टूबर को मुंबई में उनकी विदेश मंत्री एस. जयशंकर के साथ बैठक प्रस्तावित है। इसके अलावा,रुबियो दुनिया के सबसे बड़े रिफाइनरी परिसरों में शामिल जामनगर रिफाइनरी परिसर का दौरा भी करेंगे। यह यात्रा ऐसे समय हो रही है,जब रूस से तेल खरीदने,ऊर्जा सुरक्षा और भारत-अमेरिका व्यापार संबंधों को लेकर कई महत्वपूर्ण सवाल चर्चा में हैं।

भारत के लिए रूस से कच्चे तेल की खरीद ऊर्जा जरूरतों और लागत से जुड़ा विषय है, जबकि अमेरिका रूस की ऊर्जा आय और यूक्रेन युद्ध के संदर्भ में प्रतिबंधों की प्रभावशीलता पर जोर देता रहा है। ऐसे में रुबियो की यात्रा के दौरान ऊर्जा सहयोग, व्यापारिक संबंध और रूस से जुड़े मुद्दे व्यापक रणनीतिक चर्चा का हिस्सा बन सकते हैं। हालाँकि,इन विषयों पर किसी विशेष समझौते या निर्णय की पुष्टि संबंधित आधिकारिक घोषणाओं के बाद ही हो सकेगी।

ट्रंप के आदेश का तत्काल प्रभाव यह है कि रूस से तेल और गैस खरीदने वाले प्रमुख देशों पर प्रस्तावित 100 प्रतिशत तक अतिरिक्त शुल्क फिलहाल लागू नहीं होंगे। इससे भारत और चीन सहित संबंधित देशों को अमेरिकी बाजार में संभावित व्यापारिक झटके से अस्थायी राहत मिली है।

लेकिन इस फैसले को रूस के खिलाफ अमेरिकी प्रतिबंध नीति में व्यापक बदलाव के रूप में देखना सही नहीं होगा। आदेश में मौजूदा प्रतिबंधों को बरकरार रखा गया है और भविष्य में कार्रवाई करने का अधिकार भी प्रशासन के पास है। रूस से ऊर्जा खरीदने वाले देशों की निगरानी जारी रहेगी और जरूरत पड़ने पर दंडात्मक उपाय दोबारा लागू किए जा सकते हैं।

भारत के लिए फिलहाल सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि प्रस्तावित भारी शुल्क का तत्काल खतरा टल गया है। इसके बावजूद भारत-अमेरिका व्यापार संबंधों, ऊर्जा खरीद और रूस से जुड़े प्रतिबंधों पर आगे भी बातचीत और निगरानी जारी रहने की संभावना है।

अब नजर मार्को रुबियो के भारत दौरे और दोनों देशों के बीच होने वाली बैठकों पर रहेगी। इन वार्ताओं से यह समझने में मदद मिल सकती है कि अमेरिका रूस से तेल खरीदने के मुद्दे पर आगे किस तरह का रुख अपनाता है और भारत के साथ व्यापारिक संबंधों को लेकर उसकी प्राथमिकताएँ क्या रहती हैं। फिलहाल ट्रंप का फैसला तत्काल राहत जरूर देता है,लेकिन भविष्य की अमेरिकी नीति के बारे में अनिश्चितता पूरी तरह समाप्त नहीं हुई है।