अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग (तस्वीर क्रेडिट@rashtra_press)

ट्रंप-शी जिनपिंग बैठक के बाद मानवाधिकार मुद्दे पर उठे सवाल,उइगर समुदाय में बढ़ी निराशा

वॉशिंगटन/बीजिंग,26 जून (युआईटीवी)- अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग के बीच हाल ही में हुई उच्चस्तरीय बैठक ने वैश्विक राजनीति और कूटनीति के क्षेत्र में नई चर्चा को जन्म दिया है। दोनों देशों के बीच व्यापार,रणनीतिक सहयोग और द्विपक्षीय संबंधों को लेकर हुई बातचीत के बाद जारी आधिकारिक बयानों में मानवाधिकारों से जुड़े मुद्दों का कोई उल्लेख नहीं किया गया। विशेष रूप से चीन के शिनजियांग क्षेत्र में उइगर समुदाय के साथ कथित व्यवहार और लंबे समय से उठ रहे मानवाधिकार संबंधी आरोपों पर दोनों पक्षों की चुप्पी ने अंतर्राष्ट्रीय मानवाधिकार संगठनों और उइगर समुदाय के कार्यकर्ताओं के बीच चिंता और निराशा बढ़ा दी है।

यह घटनाक्रम ऐसे समय सामने आया है,जब राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने हाल के महीनों में चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग के प्रति अपेक्षाकृत नरम रुख अपनाया है। ट्रंप ने सार्वजनिक रूप से शी जिनपिंग को अपना “दोस्त” और “अच्छा इंसान” बताया है। दोनों नेताओं के बीच व्यक्तिगत संबंधों को लेकर दिए गए इन बयानों ने पहले ही कई राजनीतिक विश्लेषकों का ध्यान आकर्षित किया था। अब बैठक के बाद मानवाधिकार जैसे संवेदनशील मुद्दों पर किसी प्रकार की सार्वजनिक चर्चा न होने से इस विषय पर नई बहस शुरू हो गई है।

ऑनलाइन पत्रिका ‘द डिप्लोमैट’ की एक रिपोर्ट के अनुसार,उइगर समुदाय की प्रमुख कार्यकर्ता रुशान अब्बास को उम्मीद थी कि राष्ट्रपति ट्रंप की बीजिंग यात्रा उनकी बहन गुलशन अब्बास की रिहाई की दिशा में एक महत्वपूर्ण अवसर साबित होगी। गुलशन अब्बास को चीन में लगभग आठ वर्षों से हिरासत में रखा गया है। उनका मामला लंबे समय से अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार संगठनों और अमेरिकी सांसदों के बीच चर्चा का विषय रहा है।

रिपोर्ट के अनुसार,ट्रंप की चीन यात्रा से कुछ दिन पहले अमेरिकी सीनेट और प्रतिनिधि सभा ने अलग-अलग प्रस्ताव पारित किए थे। इन प्रस्तावों में राष्ट्रपति से आग्रह किया गया था कि वह चीन के साथ बातचीत के दौरान उन छह लोगों की रिहाई का मुद्दा उठाएँ जिन्हें चीन की कम्युनिस्ट पार्टी द्वारा हिरासत में रखा गया है। इन छह नामों में गुलशन अब्बास का नाम भी शामिल था। अमेरिकी सांसदों का मानना था कि शीर्ष स्तर की बातचीत इस मामले में सकारात्मक परिणाम ला सकती है।

रुशान अब्बास ने अमेरिकी समाचार पत्र ‘द हिल’ में 14 मई को प्रकाशित अपने लेख में भावनात्मक अपील करते हुए लिखा था कि वह दुनिया के सबसे शक्तिशाली लोकतांत्रिक नेता से केवल इतना चाहती हैं कि वह चीन के सर्वोच्च नेता के सामने उनकी बहन की रिहाई की माँग करें। उन्होंने उम्मीद जताई थी कि अमेरिका अपनी राजनीतिक और कूटनीतिक ताकत का उपयोग कर इस मानवीय मुद्दे को प्राथमिकता देगा।

हालाँकि,ट्रंप और शी जिनपिंग के बीच हुई बैठकों के बाद जारी आधिकारिक वक्तव्यों में इस विषय का कोई उल्लेख नहीं किया गया। न तो वाशिंगटन की ओर से यह बताया गया कि मानवाधिकारों का मुद्दा बातचीत का हिस्सा था और न ही बीजिंग ने इस संबंध में कोई जानकारी साझा की। इसी कारण उइगर समुदाय के अनेक लोगों में यह भावना मजबूत हुई है कि उनकी समस्याएँ फिलहाल दोनों देशों के रणनीतिक और आर्थिक हितों के मुकाबले प्राथमिकता नहीं बन पा रही हैं।

‘द डिप्लोमैट’ की रिपोर्ट के अनुसार, कई उइगर कार्यकर्ताओं ने स्वीकार किया है कि अब उन्हें यह उम्मीद कम होती जा रही है कि केवल अमेरिकी सरकार के प्रयासों से उनके परिवारों और समुदाय की स्थिति में कोई बड़ा बदलाव आएगा। उनका कहना है कि वे अब अपने परिजनों और मित्रों की रिहाई तथा उनके अधिकारों की रक्षा के लिए दूसरे अंतर्राष्ट्रीय मंचों और वैकल्पिक कूटनीतिक प्रयासों की ओर भी देख रहे हैं।

उइगर कार्यकर्ता सालिह हुदयार ने इस घटनाक्रम पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि ट्रंप का शी जिनपिंग से मुलाकात करना,जबकि उनके अनुसार शिनजियांग में गंभीर मानवाधिकार उल्लंघन जारी हैं,समुदाय के लिए निराशाजनक संदेश है। उन्होंने कहा कि बातचीत की पहली शर्त यह होनी चाहिए थी कि चीन पहले कथित दमन और हिरासत की नीतियों को समाप्त करे,उसके बाद ही सामान्य राजनीतिक और आर्थिक संबंधों को आगे बढ़ाया जाए।

उइगर समुदाय लंबे समय से आरोप लगाता रहा है कि चीन के शिनजियांग क्षेत्र में बड़े पैमाने पर लोगों को हिरासत शिविरों में रखा गया है और उनकी धार्मिक,सांस्कृतिक तथा सामाजिक स्वतंत्रताओं पर प्रतिबंध लगाए गए हैं। विभिन्न अंतर्राष्ट्रीय मानवाधिकार संगठनों ने भी समय-समय पर इस संबंध में अपनी रिपोर्टें जारी की हैं। दूसरी ओर चीन लगातार इन आरोपों को खारिज करता रहा है और उसका कहना है कि शिनजियांग में चलाए गए कार्यक्रम आतंकवाद,उग्रवाद और कट्टरपंथ से निपटने के लिए बनाए गए व्यावसायिक प्रशिक्षण और पुनर्वास कार्यक्रम हैं।

रिपोर्ट में यह भी उल्लेख किया गया है कि वर्ष 2017 से चीन की सरकार ने कथित तौर पर तुर्किक मूल के दस लाख से अधिक लोगों को हिरासत में लिया है,जिनमें अधिकांश उइगर समुदाय से संबंधित बताए जाते हैं। उइगर एक मुस्लिम बहुल जातीय समुदाय है,जो मुख्य रूप से चीन के उत्तर-पश्चिमी क्षेत्र शिनजियांग में निवास करता है। यही क्षेत्र लंबे समय से अंतर्राष्ट्रीय मानवाधिकार बहस का केंद्र बना हुआ है।

मानवाधिकार विशेषज्ञों का मानना है कि अमेरिका और चीन के संबंध हमेशा अनेक जटिल मुद्दों से प्रभावित रहे हैं। व्यापार,प्रौद्योगिकी,रक्षा,ताइवान,दक्षिण चीन सागर और वैश्विक आर्थिक प्रतिस्पर्धा जैसे विषय दोनों देशों के बीच प्रमुख एजेंडा बने रहते हैं। ऐसे में मानवाधिकार संबंधी मुद्दे कई बार व्यापक रणनीतिक और आर्थिक हितों के बीच पीछे छूट जाते हैं। हालाँकि,मानवाधिकार संगठनों का कहना है कि किसी भी लोकतांत्रिक देश के लिए इन मुद्दों को लगातार प्राथमिकता देना आवश्यक है।

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि ट्रंप प्रशासन फिलहाल चीन के साथ संबंधों में टकराव के बजाय व्यावहारिक कूटनीति को प्राथमिकता देता दिखाई दे रहा है। इसका उद्देश्य व्यापारिक सहयोग,वैश्विक आर्थिक स्थिरता और अन्य रणनीतिक मुद्दों पर संवाद बनाए रखना हो सकता है,लेकिन इस नीति के कारण मानवाधिकार से जुड़े विषयों पर अमेरिका की पारंपरिक भूमिका को लेकर सवाल भी उठ रहे हैं।

उधर उइगर समुदाय के कार्यकर्ताओं का कहना है कि वे अंतर्राष्ट्रीय संस्थाओं,मानवाधिकार संगठनों और विभिन्न लोकतांत्रिक देशों से समर्थन की उम्मीद बनाए रखेंगे। उनका मानना है कि उनके परिवारों की रिहाई और समुदाय के अधिकारों की रक्षा के लिए वैश्विक स्तर पर लगातार आवाज उठाना आवश्यक है। फिलहाल ट्रंप और शी जिनपिंग की हालिया बैठक के बाद मानवाधिकारों पर सार्वजनिक चर्चा का अभाव इस समुदाय के लिए निराशा का कारण बना हुआ है,जबकि दुनिया की नजर इस बात पर टिकी है कि भविष्य में अमेरिका और चीन के संबंधों में मानवाधिकारों का मुद्दा किस प्रकार स्थान पाता है।