वाशिंगटन,6 नवंबर (युआईटीवी)- ईरान के खिलाफ जारी संघर्ष के बीच अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के रुख में बदलाव के संकेत दिखाई देने लगे हैं। अमेरिकी मिडटर्म चुनाव में रिपब्लिकन पार्टी को मिले झटके के बाद ट्रंप ने कहा है कि वह ईरान को पूरी तरह तबाह नहीं करना चाहते। हालाँकि,उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि अगर परिस्थितियां ऐसी बनीं कि सैन्य कार्रवाई जरूरी हो जाए,तो अमेरिका इससे पीछे नहीं हटेगा। ट्रंप के इस बयान को ईरान के खिलाफ उनकी पहले की सख्त चेतावनियों से अलग माना जा रहा है। इससे यह सवाल भी उठने लगा है कि क्या अमेरिकी प्रशासन अब सैन्य दबाव के साथ बातचीत का रास्ता भी तलाश रहा है।
गुरुवार को व्हाइट हाउस के ओवल ऑफिस में पत्रकारों से बातचीत करते हुए ट्रंप ने कहा कि ईरान के खिलाफ युद्ध को आगे जारी रखना है या नहीं,इस पर जल्द फैसला लिया जाएगा। उन्होंने कहा कि अगर संभव हुआ तो वह ईरान के बाकी हिस्से को बर्बाद नहीं करना चाहेंगे,लेकिन परिस्थितियों के मुताबिक ऐसा करना पड़ सकता है। उनके मुताबिक, अमेरिका को यह भी देखना होगा कि आगे ऐसी स्थिति दोबारा पैदा न हो,जिसमें ईरान फिर से क्षेत्रीय और अंतर्राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए चुनौती बन सके।
ट्रंप ने बातचीत के दौरान ईरान के भविष्य को लेकर भी एक अनुमान जाहिर किया। उन्होंने कहा कि यदि देश के मौजूदा ढांचे को पूरी तरह नष्ट कर दिया जाता है,तो उसे दोबारा खड़ा होने में लगभग 25 साल लग सकते हैं। उनके इस बयान से संकेत मिलता है कि अमेरिकी प्रशासन के सामने केवल तत्काल सैन्य लक्ष्य हासिल करने का सवाल नहीं है,बल्कि वह ईरान की भविष्य में सैन्य और रणनीतिक क्षमता को भी सीमित करना चाहता है। हालाँकि, ट्रंप ने यह स्पष्ट नहीं किया कि अमेरिका आगे किस तरह की कार्रवाई को प्राथमिकता देगा और क्या इसके लिए कोई समयसीमा तय की गई है।
ट्रंप का ताजा बयान इसलिए महत्वपूर्ण है,क्योंकि इससे पहले वह ईरान के खिलाफ लगातार बेहद आक्रामक भाषा का इस्तेमाल करते रहे हैं। उन्होंने चेतावनी दी थी कि अमेरिकी सेना ने अभी ईरान के बचे हुए हिस्से को नष्ट करना शुरू भी नहीं किया है। उनके निशाने पर ईरान के सैन्य ठिकानों के साथ-साथ ऊर्जा से जुड़ा बुनियादी ढाँचा और पुल भी हो सकते हैं। इन बयानों से यह आशंका बढ़ गई थी कि संघर्ष और व्यापक रूप ले सकता है।
इससे पहले ट्रंप ने यह संकेत भी दिया था कि ईरान के बाकी हिस्से और उसके नेतृत्व को पूरी तरह खत्म करने के बाद ही अमेरिका किसी समझौते पर विचार कर सकता है। उनका रुख उस समय काफी सख्त नजर आ रहा था और ऐसा लग रहा था कि अमेरिकी प्रशासन सैन्य दबाव के जरिए ईरान को अपनी शर्तों पर झुकाना चाहता है,लेकिन अब ट्रंप ने खुद कहा है कि वह पूरे देश को तबाह नहीं करना चाहते। इस बदलाव को मौजूदा हालात और अमेरिकी घरेलू राजनीति के संदर्भ में भी देखा जा रहा है।
हालाँकि,उनके बयान में नरमी के साथ सैन्य कार्रवाई की चेतावनी भी बरकरार है। उन्होंने यह नहीं कहा कि अमेरिका ईरान के खिलाफ अभियान पूरी तरह रोक देगा। इसके बजाय उन्होंने संभावित कार्रवाई को परिस्थितियों से जोड़ते हुए कहा कि जरूरत पड़ने पर कठोर कदम उठाने पड़ सकते हैं। ऐसे में फिलहाल यह स्पष्ट नहीं है कि उनका नया रुख वास्तव में सैन्य तनाव कम करने की दिशा में है या यह ईरान पर दबाव बनाए रखने की रणनीति का हिस्सा है।
ईरान को लेकर ट्रंप के रुख में उतार-चढ़ाव पहले भी देखने को मिला है। गौरतलब है कि 8 अक्टूबर को उन्होंने ईरान के साथ बातचीत को सकारात्मक बताया था। उस दौरान उन्होंने कहा था कि अमेरिका 3 नवंबर को होने वाले मिडटर्म चुनाव से पहले ईरान पर हमला नहीं करेगा। उनके इस बयान से यह संकेत मिला था कि अमेरिकी प्रशासन चुनाव से पहले पश्चिम एशिया में किसी बड़े सैन्य टकराव से बचना चाहता है।
उस समय अमेरिकी मीडिया में भी दोनों देशों के बीच अप्रत्यक्ष बातचीत की खबरें सामने आई थीं। इन खबरों के बाद कूटनीतिक स्तर पर तनाव कम होने की उम्मीद जगी थी। हालाँकि,चुनाव खत्म होने के बाद ट्रंप ने एक बार फिर ईरान के खिलाफ सैन्य कार्रवाई की संभावना जताई। अब उनका ताजा बयान एक अलग संकेत दे रहा है। वह एक तरफ ईरान को पूरी तरह नष्ट करने से बचने की बात कर रहे हैं,वहीं दूसरी तरफ जरूरत पड़ने पर हमले का विकल्प भी खुला रख रहे हैं।
इससे साफ है कि अमेरिकी सरकार के सामने फिलहाल दो रास्ते मौजूद हैं। पहला,सैन्य दबाव बढ़ाकर ईरान की क्षमताओं को कमजोर करना और दूसरा,बातचीत के जरिए संघर्ष को सीमित करने की कोशिश करना। ट्रंप के बयानों से यह तय करना मुश्किल है कि प्रशासन किस विकल्प को अंतिम रूप देगा। आने वाले दिनों में अमेरिकी नेतृत्व की ओर से लिया जाने वाला फैसला इस संघर्ष की दिशा तय कर सकता है।
ईरान के साथ जारी संघर्ष का प्रभाव केवल पश्चिम एशिया तक सीमित नहीं है। इसका असर अमेरिका के भीतर भी महसूस किया जा रहा है। युद्ध के कारण ईंधन की कीमतों में बढ़ोतरी हुई है,जिससे आम अमेरिकी नागरिकों के खर्च पर दबाव बढ़ा है। पेट्रोल और ऊर्जा की लागत में इजाफा होने से परिवहन,कारोबार और रोजमर्रा की जरूरतों से जुड़ी वस्तुओं की कीमतों पर भी असर पड़ सकता है।
ऐसे हालात में विदेश नीति और युद्ध से जुड़े फैसले अमेरिकी घरेलू राजनीति का महत्वपूर्ण मुद्दा बन गए हैं। मिडटर्म चुनाव में रिपब्लिकन पार्टी को लगे झटके के बाद ट्रंप प्रशासन पर अपनी रणनीति को लेकर नए सिरे से विचार करने का दबाव बढ़ सकता है। हालाँकि, केवल चुनावी नतीजों को उनके ताजा बयान की वजह मानना जल्दबाजी होगी,लेकिन यह साफ है कि युद्ध के आर्थिक और राजनीतिक प्रभावों को नजरअंदाज करना अब आसान नहीं है।
अमेरिका के लिए यह संघर्ष सैन्य अभियान से कहीं अधिक जटिल होता जा रहा है। एक ओर उसे अपने रणनीतिक हितों की रक्षा करनी है,वहीं दूसरी ओर युद्ध की लागत और घरेलू स्तर पर बढ़ते असंतोष को भी ध्यान में रखना होगा। यदि संघर्ष लंबे समय तक जारी रहता है,तो इसका असर अमेरिकी अर्थव्यवस्था और अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर उसकी कूटनीतिक स्थिति पर भी पड़ सकता है।
इस संघर्ष का एक बड़ा असर अंतर्राष्ट्रीय ऊर्जा बाजार पर भी दिखाई दे रहा है। होर्मुज जलडमरूमध्य से जहाजों की आवाजाही प्रभावित होने के कारण कच्चे तेल की आपूर्ति को लेकर चिंता बढ़ी है। यह समुद्री मार्ग वैश्विक ऊर्जा कारोबार के लिए बेहद महत्वपूर्ण है। दुनिया के कई देशों तक तेल पहुँचाने के लिए इसी रास्ते का इस्तेमाल किया जाता है। ऐसे में यहां तनाव बढ़ने का असर अंतर्राष्ट्रीय बाजार में तेल की उपलब्धता और कीमतों पर पड़ सकता है।
यदि इस समुद्री मार्ग पर लंबे समय तक आवाजाही बाधित रहती है,तो ऊर्जा आयात पर निर्भर देशों के सामने बड़ी चुनौती खड़ी हो सकती है। तेल की कीमतों में तेजी से वैश्विक महँगाई बढ़ने का खतरा भी पैदा हो सकता है। भारत जैसे देशों के लिए भी यह स्थिति महत्वपूर्ण है,क्योंकि कच्चे तेल की अंतर्राष्ट्रीय कीमतों में बढ़ोतरी का असर घरेलू ईंधन लागत और अर्थव्यवस्था पर पड़ सकता है।
कुल मिलाकर,ट्रंप का ताजा बयान ईरान के खिलाफ अमेरिकी रणनीति में संभावित बदलाव का संकेत देता है, लेकिन इसे संघर्ष समाप्त होने की घोषणा नहीं माना जा सकता। अमेरिकी राष्ट्रपति ने तबाही से बचने की इच्छा जताई है,मगर सैन्य कार्रवाई की संभावना भी बरकरार रखी है। अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या वॉशिंगटन बातचीत के जरिए तनाव कम करने की कोशिश करेगा या फिर सैन्य दबाव को और बढ़ाएगा। आने वाले दिनों में अमेरिकी प्रशासन का फैसला न केवल ईरान और अमेरिका के रिश्तों को प्रभावित करेगा,बल्कि पूरे पश्चिम एशिया और वैश्विक ऊर्जा बाजार पर भी इसका असर पड़ सकता है।
