चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग और रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन (तस्वीर क्रेडिट@NealMarcusMKT)

दो परमाणु शक्तियों से एक साथ मुकाबले की चुनौती,अमेरिकी रक्षा रणनीति नए मोड़ पर

वॉशिंगटन,19 मार्च (युआईटीवी)- वैश्विक सुरक्षा परिदृश्य तेजी से बदल रहा है और इस बदलते माहौल में संयुक्त राज्य अमेरिका को अब एक ऐसी चुनौती का सामना करना पड़ रहा है,जिसे उसके रक्षा अधिकारियों ने “अभूतपूर्व” करार दिया है। अमेरिकी सैन्य और रणनीतिक विशेषज्ञों ने चेतावनी दी है कि देश को अब एक साथ दो परमाणु शक्तियों—चीन और रूस को रोकने की रणनीति पर काम करना होगा। यह बयान ऐसे समय में आया है,जब दुनिया में परमाणु,मिसाइल और अंतरिक्ष क्षेत्र में प्रतिस्पर्धा तेजी से बढ़ रही है।

अमेरिकी कांग्रेस की हाउस आर्म्ड सर्विसेज की स्ट्रैटेजिक फोर्सेज से जुड़ी सुनवाई के दौरान रक्षा विभाग के वरिष्ठ अधिकारियों ने यह स्पष्ट किया कि अमेरिका की मौजूदा रणनीति एक निर्णायक मोड़ पर पहुँच चुकी है। परमाणु निरोधक और रासायनिक एवं जैविक रक्षा के लिए रक्षा विभाग के सहायक सचिव रॉबर्ट कैडलेक ने कहा कि चीन के तेजी से बढ़ते परमाणु कार्यक्रम ने स्थिति को पूरी तरह बदल दिया है।

कैडलेक ने अपने बयान में कहा कि अब अमेरिका को एक साथ दो परमाणु शक्तियों को रोकने की चुनौती का सामना करना पड़ रहा है और यह कोई भविष्य की समस्या नहीं,बल्कि वर्तमान की वास्तविकता है। उनके अनुसार,चीन अपने इतिहास के सबसे तेज और कम पारदर्शी परमाणु विस्तार में जुटा हुआ है,जबकि रूस के पास पहले से ही दुनिया का सबसे बड़ा परमाणु हथियार भंडार है और वह अपनी रणनीतिक ताकत बनाए रखने के लिए इन पर निर्भर बना हुआ है।

उन्होंने यह भी चेतावनी दी कि अमेरिका को “समन्वित या अवसरवादी आक्रामकता” की वास्तविक संभावना के लिए तैयार रहना होगा। इसका मतलब यह है कि भविष्य में चीन और रूस जैसे देश अलग-अलग मोर्चों पर या एक साथ अमेरिका के हितों को चुनौती दे सकते हैं। ऐसे में अमेरिका की रणनीति को केवल पारंपरिक सैन्य शक्ति तक सीमित नहीं रखा जा सकता,बल्कि उसे बहुआयामी और तकनीकी रूप से उन्नत बनाना होगा।

कैडलेक ने इस संदर्भ में अमेरिका की परमाणु क्षमता को मजबूत करने की आवश्यकता पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि अमेरिका को हर स्थिति में अपने विरोधियों पर “अस्वीकार्य लागत” थोपने की क्षमता बनाए रखनी होगी,ताकि कोई भी देश उसके खिलाफ आक्रामक कदम उठाने से पहले कई बार सोचे। हालाँकि,उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि अमेरिका को हर वारहेड के बदले वारहेड रखने की जरूरत नहीं है,बल्कि उसकी रणनीति संतुलित और प्रभावी होनी चाहिए।

उन्होंने अमेरिकी सैन्य आधुनिकीकरण कार्यक्रमों के लिए पूर्ण फंडिंग और तेजी लाने की माँग की। इनमें सेंटिनल अंतरमहाद्वीपीय बैलिस्टिक मिसाइल,कोलंबिया-श्रेणी की पनडुब्बियाँ,बी-21 बॉम्बर और लॉन्ग रेंज स्टैंड-ऑफ क्रूज मिसाइल जैसे महत्वपूर्ण प्रोजेक्ट शामिल हैं। ये सभी परियोजनाएँ अमेरिका की परमाणु त्रिकोणीय क्षमता को मजबूत करने के लिए बेहद अहम मानी जा रही हैं।

सुनवाई के दौरान थिएटर-रेंज परमाणु विकल्पों पर भी चर्चा हुई। कैडलेक ने एसएलसीएम-एन जैसे सिस्टम को आवश्यक बताते हुए कहा कि ये किसी भी समान शक्ति वाले प्रतिद्वंद्वी के साथ संघर्ष के दौरान स्थिति को नियंत्रित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं। उनके अनुसार,ऐसे हथियार अमेरिका को सीमित लेकिन प्रभावी जवाब देने की क्षमता प्रदान करते हैं।

इस सुनवाई में केवल परमाणु हथियारों तक ही चर्चा सीमित नहीं रही,बल्कि अंतरिक्ष क्षेत्र में बढ़ते खतरों पर भी गंभीर चिंता व्यक्त की गई। यूएस स्पेस कमांड के कमांडर जनरल स्टीफन व्हाइटिंग ने कहा कि आधुनिक सैन्य अभियानों में अंतरिक्ष प्रणालियों की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण हो गई है और अमेरिका के विरोधी इन्हें निशाना बनाने की दिशा में तेजी से काम कर रहे हैं।

व्हाइटिंग ने चेतावनी दी कि अमेरिका के प्रतिद्वंद्वी ऐसे हथियार विकसित कर रहे हैं,जो उसके उपग्रहों को निष्क्रिय या नष्ट कर सकते हैं। उन्होंने विशेष रूप से चीन का उल्लेख करते हुए कहा कि उसने अपने सैन्य ढाँचे में अंतरिक्ष आधारित क्षमताओं को पूरी तरह एकीकृत कर लिया है और ऐसे सिस्टम विकसित कर रहा है जो अमेरिकी उपग्रहों को चुनौती दे सकते हैं।

रूस के संदर्भ में उन्होंने कहा कि वह पहले ही अमेरिकी अंतरिक्ष संपत्तियों को बाधित करने वाली क्षमताओं का प्रदर्शन कर चुका है और उसके पास कक्षा में परमाणु हथियार तैनात करने की संभावित योजना भी हो सकती है। यह स्थिति अंतरिक्ष को एक नए युद्धक्षेत्र के रूप में स्थापित कर रही है,जहाँ प्रतिस्पर्धा और टकराव की संभावना लगातार बढ़ रही है।

इसी बीच,अंतरिक्ष नीति के लिए रक्षा विभाग के सहायक सचिव मार्क बर्कोविट्ज़ ने राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की प्रस्तावित “गोल्डन डोम फॉर अमेरिका” योजना का समर्थन किया। उन्होंने इसे एक उन्नत और व्यापक रक्षा प्रणाली बताया,जो बैलिस्टिक मिसाइलों,हाइपरसोनिक हथियारों और आधुनिक क्रूज मिसाइलों से उत्पन्न खतरों का मुकाबला करने में सक्षम होगी।

बर्कोविट्ज़ के अनुसार,यह प्रणाली न केवल अमेरिका की भूमि और नागरिकों की रक्षा करेगी,बल्कि उसकी जवाबी हमले की क्षमता को भी सुरक्षित बनाए रखेगी। उन्होंने इसे वर्तमान और भविष्य के खतरों के खिलाफ एक आवश्यक और व्यावहारिक समाधान बताया।

हालाँकि,इस प्रस्ताव को लेकर अमेरिकी राजनीति में मतभेद भी सामने आए हैं। डेमोक्रेटिक पार्टी के नेता सेठ मौल्टन ने इस योजना और व्यापक रणनीतिक दृष्टिकोण की आलोचना करते हुए कहा कि अमेरिका को ताकत की जरूरत है,लेकिन अराजकता की नहीं। उन्होंने चेतावनी दी कि इस तरह की पहल हथियारों की दौड़ को और तेज कर सकती है,जिससे वैश्विक अस्थिरता बढ़ेगी।

सुनवाई में यूएस नॉर्दर्न कमांड और नोराड के प्रमुख जनरल ग्रेगरी गुइलो ने कहा कि अमेरिका अपनी घरेलू सुरक्षा को मजबूत करने के लिए लगातार अपनी रणनीतियों में बदलाव कर रहा है। उन्होंने बताया कि जनवरी 2026 में एक विशेष टास्क फोर्स का गठन किया गया है, जो “गोल्डन डोम” जैसी बहु-स्तरीय रक्षा प्रणाली के संचालन की तैयारी कर रहा है।

वहीं रिचर्ड कोरेल,जो यूएस स्ट्रैटेजिक कमांड के प्रमुख हैं,ने कहा कि अमेरिका इस समय “दो पीढ़ियों के बीच के संक्रमण काल” से गुजर रहा है,जहाँ उसे अपने पुराने सिस्टम को आधुनिक तकनीकों से बदलना पड़ रहा है। उन्होंने कहा कि यह प्रक्रिया जटिल और चुनौतीपूर्ण है,लेकिन भविष्य की सुरक्षा के लिए जरूरी भी है।

कोरेल ने यह भी कहा कि अमेरिका के सामने सबसे बड़ी चुनौती अब केवल एक प्रतिद्वंद्वी को रोकना नहीं,बल्कि कई परमाणु शक्तियों को एक साथ संतुलित करना है,वह भी ऐसे समय में जब तकनीकी बदलाव बेहद तेजी से हो रहे हैं। इस स्थिति में रणनीतिक संतुलन बनाए रखना और संभावित खतरों का समय रहते जवाब देना बेहद जरूरी हो गया है।

कुल मिलाकर,यह सुनवाई इस बात का स्पष्ट संकेत देती है कि वैश्विक सुरक्षा परिदृश्य एक नए दौर में प्रवेश कर चुका है। जहाँ एक ओर परमाणु हथियारों की होड़ जारी है,वहीं दूसरी ओर अंतरिक्ष और उन्नत तकनीकों के क्षेत्र में भी प्रतिस्पर्धा बढ़ रही है। ऐसे में अमेरिका को अपनी रणनीति को न केवल मजबूत करना होगा,बल्कि उसे लचीला और भविष्य के अनुरूप भी बनाना होगा।

इस बदलते परिदृश्य में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि अमेरिका किस तरह अपने संसाधनों, तकनीकी क्षमता और कूटनीतिक प्रयासों के माध्यम से इस “अभूतपूर्व चुनौती” का सामना करता है। आने वाले वर्षों में यही रणनीति वैश्विक शक्ति संतुलन और अंतर्राष्ट्रीय सुरक्षा की दिशा तय करेगी।