वाशिंगटन,28 जनवरी (युआईटीवी)- अमेरिका के वरिष्ठ और प्रभावशाली सीनेटर तथा सीनेट इंटेलिजेंस कमेटी के अध्यक्ष मार्क वॉर्नर ने भारत और पाकिस्तान के बीच हालिया तनाव को लेकर अमेरिका की भूमिका पर खुलकर सवाल उठाए हैं। उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा है कि इस पूरे घटनाक्रम में अमेरिका की भूमिका को जरूरत से ज्यादा बढ़ा-चढ़ाकर पेश किया गया,जबकि उपलब्ध तथ्यों और जानकारियों से ऐसा नहीं लगता कि वाशिंगटन ने अकेले इस संकट को सुलझाया हो। वॉर्नर के मुताबिक,इस तरह के दावे न केवल वास्तविकता से दूर हैं,बल्कि संवेदनशील कूटनीतिक माहौल को नुकसान पहुँचा सकते हैं और क्षेत्रीय तनाव को और भड़का सकते हैं।
मार्क वॉर्नर ने कहा कि उन्होंने भारतीय सरकार के प्रतिनिधियों,खुफिया समुदाय और अमेरिकी इंटेलिजेंस तंत्र से जो भी जानकारी सुनी और समझी है,उससे यही स्पष्ट होता है कि भारत और पाकिस्तान के बीच पैदा हुआ यह तनाव मुख्य रूप से दोनों देशों के आपसी संवाद और स्थापित तंत्रों के जरिए ही सँभाला गया। उनके अनुसार, इस बात का कोई ठोस आधार नहीं दिखता कि अमेरिका ने निर्णायक या एकमात्र भूमिका निभाकर हालात को काबू में किया हो। वॉर्नर ने यह जरूर माना कि अमेरिका ने सहयोगी भूमिका निभाने की कोशिश की होगी,जैसा कि वह अक्सर क्षेत्रीय स्थिरता के मामलों में करता है,लेकिन उन्होंने सीधे तौर पर राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की ओर से किए गए दखल के दावों को खारिज कर दिया।
भारत और पाकिस्तान के बीच बढ़े तनाव को लेकर पूछे गए एक सवाल के जवाब में वॉर्नर ने कहा कि स्थिति गंभीर जरूर थी,लेकिन यह कोई नई बात नहीं थी। उन्होंने याद दिलाया कि दक्षिण एशिया में भारत और पाकिस्तान के बीच इससे पहले भी कई बार ऐसे तनावपूर्ण हालात बने हैं,जिनमें हालात काफी हद तक नियंत्रण से बाहर जाने की आशंका पैदा हुई थी। उनके मुताबिक,यह टकराव भी एक जाना-पहचाना पैटर्न दिखाता है,जिसमें किसी आतंकी घटना या सुरक्षा से जुड़े मसले के बाद दोनों देशों के बीच तनाव बढ़ता है और फिर कूटनीतिक तथा सैन्य चैनलों के जरिए हालात को सँभालने की कोशिश होती है।
सीनेटर वॉर्नर ने सीमा पार आतंकवाद को भारत की लंबे समय से चली आ रही एक गंभीर चिंता बताया और कहा कि ऐसे मुद्दों पर भारत और पाकिस्तान के बीच संवाद के लिए पहले से तय चैनल मौजूद हैं। उन्होंने यह भी कहा कि इन चैनलों का उपयोग करना ही ऐसे संकटों से निपटने का सबसे व्यावहारिक तरीका रहा है। उनके अनुसार,किसी तीसरे पक्ष की भूमिका को जरूरत से ज्यादा महिमामंडित करना न केवल इस वास्तविकता को नजरअंदाज करता है,बल्कि दोनों देशों की संप्रभुता और उनकी कूटनीतिक क्षमता पर भी सवाल खड़े करता है।
वॉर्नर ने विशेष तौर पर इस बात पर चिंता जताई कि अमेरिका की भूमिका को बढ़ा-चढ़ाकर बताने से सहयोगी देशों के साथ भरोसे का रिश्ता कमजोर हो सकता है। उन्होंने संकेत दिया कि भारत और अमेरिका के बीच मौजूदा टैरिफ विवाद के पीछे भी कहीं न कहीं यही नाराजगी हो सकती है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने संघर्षविराम या तनाव कम होने का श्रेय अमेरिकी राष्ट्रपति को सार्वजनिक रूप से नहीं दिया। वॉर्नर के अनुसार,ऐसा प्रतीत होता है कि इस तरह की उम्मीदें और दावे रिश्तों में अनावश्यक खटास पैदा कर सकते हैं।
उन्होंने कहा कि कूटनीति में भाषा और दावों का बेहद महत्व होता है। जब किसी देश का नेतृत्व किसी जटिल अंतर्राष्ट्रीय मसले में अपनी भूमिका को बढ़ा-चढ़ाकर पेश करता है,तो उसके दूरगामी परिणाम हो सकते हैं। वॉर्नर ने यह भी कहा कि राष्ट्रपति ट्रंप का यह रवैया नया नहीं है। उन्होंने दूसरे विदेशी मामलों का उदाहरण देते हुए बताया कि ट्रंप अक्सर किसी भी घटनाक्रम के नतीजों को वास्तविकता से कहीं ज्यादा प्रभावशाली तरीके से पेश करते हैं।
ईरान के मामले का जिक्र करते हुए वॉर्नर ने कहा कि अमेरिकी सैन्य विमानों और पायलटों ने वहाँ शानदार पेशेवर काम किया,लेकिन यह दावा करना कि ईरान की परमाणु क्षमता को पूरी तरह खत्म कर दिया गया है,सच्चाई से मेल नहीं खाता। उनके अनुसार,ईरान कुछ महीनों के भीतर फिर से अपनी परमाणु गतिविधियों को खड़ा कर सकता है। वॉर्नर ने चेताया कि इस तरह की अतिरंजित भाषा से न केवल अमेरिका की विश्वसनीयता पर सवाल उठते हैं,बल्कि सहयोगी देशों के साथ भरोसे का आधार भी कमजोर पड़ता है।
उन्होंने साफ तौर पर कहा कि ऐसी बयानबाजी से वाशिंगटन और नई दिल्ली के बीच बने मजबूत रिश्तों को नुकसान पहुँच सकता है। खासकर रक्षा सहयोग जैसे संवेदनशील क्षेत्रों में इसका असर देखने को मिल सकता है। वॉर्नर के मुताबिक,भारत जैसे बड़े और आत्मनिर्भर देश रातोंरात किसी एक नए साझेदार पर पूरी तरह निर्भर नहीं हो सकते। अंतर्राष्ट्रीय संबंध भरोसे,निरंतरता और पारस्परिक सम्मान पर टिके होते हैं,न कि तात्कालिक श्रेय लेने की राजनीति पर।
पाकिस्तान को लेकर वॉर्नर ने कहा कि वह अक्सर भारत पर जरूरत से ज्यादा ध्यान केंद्रित करता है और अपनी आंतरिक आर्थिक और राजनीतिक चुनौतियों के लिए भी भारत को जिम्मेदार ठहराने की प्रवृत्ति दिखाता है। इसके उलट, उन्होंने कहा कि भारत अब इस तरह की प्रतिस्पर्धा से काफी हद तक आगे बढ़ चुका है। भारत की नई पीढ़ी वैश्विक मंच पर अपनी भूमिका को लेकर ज्यादा आत्मविश्वास से भरी है और अमेरिका के साथ मजबूत,स्थिर और दीर्घकालिक रिश्तों के पक्ष में है।
अंत में वॉर्नर ने चेतावनी दी कि अमेरिका की भूमिका को बढ़ा-चढ़ाकर पेश करना न केवल दक्षिण एशिया के नाजुक संतुलन को और जटिल बना सकता है,बल्कि भारत-अमेरिका के लंबे समय के रणनीतिक रिश्तों को स्थिर और मजबूत बनाने की असली जरूरत से भी ध्यान हटा सकता है। उनके मुताबिक,इस समय दोनों देशों के लिए जरूरी है कि वे वास्तविक सहयोग,भरोसे और पारस्परिक सम्मान पर आधारित रिश्तों को आगे बढ़ाएँ,न कि ऐसे दावों में उलझें जो कूटनीतिक नुकसान का कारण बन सकते हैं।
