नई दिल्ली,22 अप्रैल (युआईटीवी)- दिल्ली उच्च न्यायालय ने एक महत्वपूर्ण फैसले में हॉकी इंडिया और उसके महासचिव भोला नाथ सिंह को अदालत की अवमानना का दोषी ठहराया है। न्यायालय ने स्पष्ट किया कि संगठन ने जानबूझकर अपने एक निर्वाचित पदाधिकारी को कार्यकारी बोर्ड की बैठकों में शामिल होने से वंचित किया,जो कि अदालत के पूर्व आदेश का सीधा उल्लंघन है। इस मामले की सुनवाई न्यायमूर्ति पुरुषेंद्र कुमार कौरव की पीठ ने की।
मामले की पृष्ठभूमि में जनवरी 2025 का वह आदेश है,जिसमें अदालत ने निर्देश दिया था कि सईद असीमा अली,जिन्हें संगठन की उपाध्यक्ष के रूप में चुना गया था,उन्हें कार्यकारी बोर्ड की सभी बैठकों में भाग लेने का पूरा अवसर दिया जाए। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया था कि यदि बैठकें ऑनलाइन माध्यम से आयोजित होती हैं,तो उन्हें समय पर वर्चुअल लिंक उपलब्ध कराना अनिवार्य होगा। इस आदेश का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना था कि निर्वाचित पदाधिकारी अपने अधिकारों का पूर्ण उपयोग कर सकें और संगठन के कामकाज में भागीदारी कर सकें।
हालाँकि,अदालत के सामने पेश किए गए तथ्यों से यह सामने आया कि 4 जुलाई और 27 जुलाई 2025 को आयोजित बैठकों के लिए असीमा अली को कोई वर्चुअल लिंक उपलब्ध नहीं कराया गया। न्यायालय ने इसे अपने आदेश का ‘जानबूझकर और अपमानजनक उल्लंघन’ माना। अदालत ने कहा कि यह केवल एक तकनीकी चूक नहीं,बल्कि एक सोची-समझी कार्रवाई प्रतीत होती है,जिससे एक निर्वाचित प्रतिनिधि को उनके अधिकारों से वंचित किया गया।
हॉकी इंडिया की ओर से इस मामले में सफाई दी गई कि बाद में असीमा अली को उनकी यूनिट से संबंधित कारणों के चलते अयोग्य घोषित कर दिया गया था,इसलिए उन्हें बैठकों में शामिल नहीं किया गया,लेकिन न्यायालय ने इस दलील को पूरी तरह अस्वीकार कर दिया। अदालत ने कहा कि जब तक पूर्व आदेश प्रभावी है,तब तक किसी भी प्रकार की आंतरिक कार्रवाई उस आदेश को निष्प्रभावी नहीं बना सकती। संगठन को अदालत के निर्देशों का पालन करना ही होगा,चाहे उसके आंतरिक निर्णय कुछ भी हों।
सुनवाई के दौरान महासचिव भोला नाथ सिंह ने अदालत से माफी भी माँगी,लेकिन न्यायमूर्ति कौरव ने इसे नाकाफी और विलंबित बताते हुए स्वीकार करने से इनकार कर दिया। अदालत ने यह भी पाया कि माफी के हलफनामे में कई महत्वपूर्ण कमियाँ थीं,जिससे यह स्पष्ट हुआ कि यह माफी केवल औपचारिकता के तौर पर दी गई है,न कि वास्तविक पश्चाताप के भाव से।
न्यायालय ने अपने आदेश में कहा कि इस प्रकार का व्यवहार न केवल न्यायिक आदेशों की अवहेलना है,बल्कि यह कानून के शासन और न्याय व्यवस्था के सम्मान को भी कमजोर करता है। अदालत ने जोर देकर कहा कि यदि न्यायालय के आदेशों का इस तरह उल्लंघन किया जाता है,तो यह एक खतरनाक प्रवृत्ति को जन्म देता है,जिसे किसी भी स्थिति में स्वीकार नहीं किया जा सकता।
इसी आधार पर अदालत ने इसे सिविल अवमानना का स्पष्ट मामला मानते हुए हॉकी इंडिया और उसके महासचिव को दोषी करार दिया। न्यायालय ने कहा कि संगठन जैसे महत्वपूर्ण खेल निकाय से यह अपेक्षा की जाती है कि वह कानून और न्यायालय के आदेशों का पूरी निष्ठा से पालन करेगा,लेकिन इस मामले में ऐसा नहीं हुआ।
फिलहाल अदालत ने सजा के मुद्दे पर अंतिम निर्णय सुरक्षित रखते हुए अगली सुनवाई की तारीख 4 मई निर्धारित की है। साथ ही,अदालत ने यह भी संकेत दिया कि यदि दोषी पक्ष अपनी गलती को सुधारने के लिए ठोस कदम उठाते हैं,तो उन्हें इस पर विचार करने का अवसर दिया जा सकता है।
इस फैसले को खेल संगठनों के लिए एक महत्वपूर्ण संदेश के रूप में देखा जा रहा है,जिसमें यह स्पष्ट किया गया है कि किसी भी संस्था को न्यायालय के आदेशों की अनदेखी करने की छूट नहीं है। यह मामला न केवल एक व्यक्तिगत विवाद तक सीमित है,बल्कि यह संस्थागत जवाबदेही और पारदर्शिता के महत्व को भी उजागर करता है।
कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि इस फैसले से भविष्य में खेल संगठनों और अन्य संस्थाओं के कामकाज में अधिक सावधानी और जवाबदेही देखने को मिल सकती है। अब सभी की नजरें 4 मई की अगली सुनवाई पर टिकी हैं,जब अदालत दोषियों के खिलाफ सजा पर अंतिम फैसला सुना सकती है।
