रोहिणी आचार्य,लालू प्रसाद यादव और तेजस्वी यादव

लालू-राबड़ी की सुरक्षा में कटौती पर बढ़ा सियासी घमासान,रोहिणी आचार्य ने सरकार को दी चेतावनी

पटना,6 जून (युआईटीवी)- बिहार की राजनीति में पूर्व मुख्यमंत्री लालू प्रसाद यादव और पूर्व मुख्यमंत्री राबड़ी देवी की सुरक्षा व्यवस्था को लेकर नया विवाद खड़ा हो गया है। राज्य सरकार द्वारा सुरक्षा में कटौती किए जाने के फैसले के बाद राष्ट्रीय जनता दल और यादव परिवार की ओर से तीखी प्रतिक्रिया सामने आई है। इस मुद्दे पर लालू प्रसाद यादव की बेटी रोहिणी आचार्य ने सरकार पर गंभीर आरोप लगाते हुए कहा है कि सुरक्षा में कटौती का फैसला राजनीतिक बदले की भावना से प्रेरित है। उन्होंने यह भी चेतावनी दी कि यदि परिवार के किसी सदस्य को किसी प्रकार का नुकसान पहुँचता है,तो इसके परिणामों के लिए सरकार जिम्मेदार होगी।

शनिवार को सोशल मीडिया मंच ‘एक्स’ पर किए गए अपने एक पोस्ट में रोहिणी आचार्य ने राज्य सरकार के फैसले पर कड़ी नाराजगी जताई। उन्होंने आरोप लगाया कि लालू प्रसाद यादव और राबड़ी देवी की सुरक्षा में कटौती का उद्देश्य परिवार को शारीरिक और मानसिक रूप से नुकसान पहुँचाना है। रोहिणी ने कहा कि जब सुरक्षा व्यवस्था में इतनी बड़ी कटौती कर दी गई है,तो केवल औपचारिक या दिखावटी सुरक्षा बनाए रखने का कोई मतलब नहीं रह जाता। इसी कारण राबड़ी देवी ने अपने आधिकारिक आवास पर तैनात सुरक्षाकर्मियों को वापस भेजने का निर्णय लिया।

रोहिणी आचार्य ने अपने बयान में सरकार पर निशाना साधते हुए कहा कि सत्ता पक्ष को यह समझ लेना चाहिए कि बिहार की करोड़ों जनता ही लालू प्रसाद यादव,राबड़ी देवी और उनके परिवार की वास्तविक सुरक्षा है। उन्होंने कहा कि यदि परिवार के किसी भी सदस्य को मामूली नुकसान भी पहुँचता है,तो उसके गंभीर राजनीतिक और सामाजिक परिणाम हो सकते हैं। उनके इस बयान को राजनीतिक हलकों में सरकार के प्रति सीधी चेतावनी के रूप में देखा जा रहा है।

इस विवाद को और आगे बढ़ाते हुए रोहिणी आचार्य ने एक अन्य सोशल मीडिया पोस्ट में राष्ट्रीय जनता दल के समर्थकों और कार्यकर्ताओं से अपील की कि वे बड़ी संख्या में राबड़ी देवी के आधिकारिक आवास पर पहुँचे और सरकार को यह संदेश दें कि लालू परिवार अकेला नहीं है। उन्होंने कहा कि जनता ही इस परिवार की असली ढाल और सुरक्षा कवच है। उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि बिहार की पहली महिला मुख्यमंत्री और उनके परिवार को जानबूझकर परेशान किया जा रहा है तथा जनता इस प्रकार की कार्रवाई का लोकतांत्रिक तरीके से जवाब देगी।

इधर सुरक्षा व्यवस्था में कटौती के फैसले को लेकर स्वयं लालू प्रसाद यादव और राबड़ी देवी भी नाराज बताए जा रहे हैं। जानकारी के अनुसार,सुरक्षा श्रेणी में बदलाव के बाद दोनों नेताओं ने अपने आवास पर तैनात शेष पुलिसकर्मियों को भी वापस भेज दिया। इस कदम को सरकार के फैसले के खिलाफ एक प्रतीकात्मक विरोध के रूप में देखा जा रहा है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह केवल सुरक्षा का मुद्दा नहीं है,बल्कि इसके जरिए विपक्ष सरकार पर राजनीतिक दबाव बनाने की कोशिश कर रहा है।

वहीं,बिहार विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष तेजस्वी यादव ने भी इसी प्रकार का कदम उठाते हुए अपने सरकारी आवास के बाहर तैनात सुरक्षाकर्मियों को वापस भेज दिया। वन पोलो रोड स्थित उनके सरकारी आवास पर अब कोई सुरक्षाकर्मी मौजूद नहीं है। तेजस्वी यादव का यह निर्णय भी सुरक्षा व्यवस्था में बदलाव के खिलाफ विरोध के रूप में देखा जा रहा है। इससे स्पष्ट संकेत मिलता है कि यादव परिवार इस मुद्दे को राजनीतिक और सार्वजनिक स्तर पर प्रमुखता से उठाने की रणनीति अपना रहा है।

सुरक्षा व्यवस्था को लेकर पैदा हुए इस विवाद ने बिहार की राजनीति में नई बहस को जन्म दे दिया है। विपक्षी दलों का आरोप है कि सरकार राजनीतिक विरोधियों को निशाना बना रही है और सुरक्षा जैसे संवेदनशील मुद्दे का इस्तेमाल राजनीतिक हथियार के रूप में किया जा रहा है। दूसरी ओर सरकार की ओर से अभी तक इस मुद्दे पर विस्तृत प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है। हालाँकि,प्रशासनिक सूत्रों का कहना है कि सुरक्षा व्यवस्था से जुड़े फैसले सुरक्षा एजेंसियों की समीक्षा और निर्धारित मानकों के आधार पर लिए जाते हैं।

राजनीतिक पर्यवेक्षकों का मानना है कि बिहार में विधानसभा चुनावों से पहले इस प्रकार के मुद्दे राजनीतिक माहौल को और गर्म कर सकते हैं। लालू प्रसाद यादव और उनका परिवार राज्य की राजनीति में लंबे समय से प्रभावशाली भूमिका निभाता रहा है। ऐसे में उनकी सुरक्षा से जुड़ा कोई भी फैसला स्वाभाविक रूप से राजनीतिक चर्चा का विषय बन जाता है।

इस पूरे घटनाक्रम के बीच राष्ट्रीय जनता दल के कार्यकर्ताओं और समर्थकों में भी नाराजगी देखी जा रही है। पार्टी के कई नेताओं ने इसे लोकतांत्रिक मूल्यों और राजनीतिक शिष्टाचार के खिलाफ बताया है। उनका कहना है कि वरिष्ठ नेताओं की सुरक्षा किसी राजनीतिक मतभेद का विषय नहीं होनी चाहिए और इस मामले में सरकार को पुनर्विचार करना चाहिए।

दूसरी ओर,कुछ राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि सुरक्षा श्रेणियों की समीक्षा समय-समय पर की जाती है और यह प्रक्रिया केवल बिहार तक सीमित नहीं है। विभिन्न राज्यों और केंद्र स्तर पर भी सुरक्षा व्यवस्थाओं का मूल्यांकन सुरक्षा एजेंसियों की रिपोर्ट के आधार पर किया जाता है। हालाँकि,जब ऐसे फैसले प्रमुख राजनीतिक हस्तियों से जुड़े होते हैं,तब उनका राजनीतिक प्रभाव भी व्यापक हो जाता है।

फिलहाल लालू प्रसाद यादव,राबड़ी देवी और तेजस्वी यादव द्वारा सुरक्षाकर्मियों को वापस भेजे जाने के बाद यह मुद्दा और अधिक चर्चा में आ गया है। आने वाले दिनों में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि सरकार इस विवाद पर क्या रुख अपनाती है और क्या सुरक्षा व्यवस्था को लेकर कोई नया निर्णय सामने आता है। फिलहाल इतना तय है कि सुरक्षा में कटौती का यह मामला बिहार की राजनीति में एक नए सियासी विवाद के रूप में उभर चुका है,जिसने सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच टकराव को और तेज कर दिया है।