सुप्रीम कोर्ट

नीट-यूजी 2026 विवाद पर सुप्रीम कोर्ट सख्त,कहा- जवाबदेही तय किए बिना नहीं रुकेंगी गड़बड़ियाँ,केंद्र ने बताया प्रधानमंत्री कर रहे निगरानी

नई दिल्ली,30 मई (युआईटीवी)- देश की सबसे महत्वपूर्ण प्रवेश परीक्षाओं में शामिल नीट-यूजी 2026 को लेकर उठे विवादों के बीच शुक्रवार को सुप्रीम कोर्ट में हुई सुनवाई ने परीक्षा प्रणाली और राष्ट्रीय परीक्षा एजेंसी की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए। सर्वोच्च न्यायालय ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि केवल संस्थागत जिम्मेदारी तय करना पर्याप्त नहीं है,बल्कि यह भी सुनिश्चित किया जाना चाहिए कि किसी भी गड़बड़ी या लापरवाही के लिए व्यक्तिगत स्तर पर कौन जिम्मेदार है। अदालत ने कहा कि जब तक वास्तविक और व्यक्तिगत जवाबदेही तय नहीं होगी,तब तक परीक्षा व्यवस्था में बार-बार सामने आने वाली समस्याओं का समाधान संभव नहीं है।

सुनवाई के दौरान केंद्र सरकार ने भी इस मामले को अत्यंत गंभीर बताते हुए कहा कि इसका सीधा संबंध देश के लाखों छात्रों और उनके भविष्य से है। केंद्र की ओर से पेश सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने अदालत को बताया कि सरकार इस पूरे मामले पर लगातार नजर बनाए हुए है और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी स्वयं इसकी निगरानी कर रहे हैं। उन्होंने कहा कि सरकार परीक्षा प्रणाली को अधिक पारदर्शी,सुरक्षित और विश्वसनीय बनाने के लिए आवश्यक कदम उठाने के प्रति प्रतिबद्ध है।

मामले की सुनवाई न्यायमूर्ति पी. एस. नरसिम्हा और न्यायमूर्ति आलोक अराधे की पीठ कर रही थी। अदालत के समक्ष कई याचिकाएँ दायर की गई हैं जिनमें नीट-यूजी परीक्षा प्रणाली में व्यापक सुधार की माँग की गई है। याचिकाकर्ताओं ने परीक्षा को पूरी तरह कंप्यूटर आधारित टेस्ट यानी सीबीटी प्रणाली में बदलने,सुरक्षा तंत्र को मजबूत करने तथा परीक्षा प्रबंधन में आधुनिक तकनीक के व्यापक उपयोग की माँग की है।

सुनवाई के दौरान न्यायालय ने पिछले कुछ वर्षों में सामने आए परीक्षा विवादों पर गहरी चिंता व्यक्त की। अदालत ने कहा कि लाखों छात्र वर्षों तक कठिन परिश्रम कर इन परीक्षाओं की तैयारी करते हैं। उनके साथ-साथ उनके परिवार भी इस प्रक्रिया से भावनात्मक रूप से जुड़े होते हैं। ऐसे में यदि परीक्षा प्रणाली में किसी प्रकार की गड़बड़ी या अनियमितता सामने आती है तो इसका प्रभाव केवल छात्रों तक सीमित नहीं रहता,बल्कि पूरे परिवार की उम्मीदों और सपनों पर पड़ता है।

अदालत ने कहा कि परीक्षा प्रणाली में विश्वास बनाए रखना किसी भी लोकतांत्रिक और शैक्षणिक व्यवस्था के लिए अत्यंत आवश्यक है। यदि छात्रों को यह महसूस होने लगे कि उनकी मेहनत के बावजूद प्रणाली निष्पक्ष और पारदर्शी नहीं है,तो इससे शिक्षा व्यवस्था की विश्वसनीयता प्रभावित हो सकती है। न्यायालय ने टिप्पणी करते हुए कहा कि देश के युवाओं को निराश नहीं किया जा सकता और उनके भविष्य के साथ किसी भी प्रकार का समझौता स्वीकार्य नहीं होगा।

सुप्रीम कोर्ट ने राष्ट्रीय परीक्षा एजेंसी की कार्यशैली पर भी तीखी टिप्पणी की। अदालत ने एजेंसी की कार्यप्रणाली को ‘एड-हॉक’ अर्थात अस्थायी और तदर्थ प्रकृति का बताते हुए कहा कि इतनी बड़ी और महत्वपूर्ण परीक्षाओं का संचालन करने वाली संस्था को मजबूत और स्थायी ढाँचे के साथ काम करना चाहिए। न्यायालय का मानना है कि परीक्षा प्रणाली को ऐसे संस्थागत ढाँचे की आवश्यकता है,जो केवल तत्काल समस्याओं का समाधान न करे,बल्कि भविष्य में संभावित चुनौतियों का भी प्रभावी ढंग से सामना कर सके।

सुनवाई के दौरान अदालत ने संघ लोक सेवा आयोग का उदाहरण भी दिया। न्यायालय ने कहा कि देश में कई ऐसी संस्थाएँ हैं,जो बड़े स्तर पर परीक्षाओं का सफल संचालन कर रही हैं और जहाँ विवाद अपेक्षाकृत कम देखने को मिलते हैं। अदालत ने संकेत दिया कि राष्ट्रीय परीक्षा एजेंसी को ऐसी संस्थाओं के अनुभवों और कार्यप्रणाली से सीख लेकर अपनी व्यवस्था को और अधिक सुदृढ़ बनाना चाहिए।

न्यायालय ने तकनीकी और शैक्षणिक विशेषज्ञता के उपयोग पर भी जोर दिया। अदालत ने सुझाव दिया कि भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थानों और अन्य विशेषज्ञ संस्थानों के साथ लगातार सहयोग बढ़ाया जाना चाहिए,ताकि परीक्षा सुरक्षा,डेटा प्रबंधन,प्रश्नपत्र संरक्षण और परीक्षा संचालन की प्रक्रियाओं को आधुनिक तकनीक के अनुरूप विकसित किया जा सके। अदालत का मानना है कि डिजिटल युग में परीक्षा सुरक्षा केवल प्रशासनिक उपायों से सुनिश्चित नहीं की जा सकती,बल्कि इसके लिए उन्नत तकनीकी समाधान भी आवश्यक हैं।

सुनवाई के दौरान सर्वोच्च न्यायालय ने मानव संसाधन विकास मंत्रालय को महत्वपूर्ण निर्देश भी जारी किए। अदालत ने मंत्रालय से कहा कि वह राष्ट्रीय परीक्षा एजेंसी की संगठनात्मक क्षमता,मानव संसाधन,तकनीकी बुनियादी ढाँचे और प्रशासनिक संसाधनों को मजबूत करने के लिए प्रस्तावित कदमों पर विस्तृत हलफनामा दाखिल करे। न्यायालय यह जानना चाहता है कि सरकार भविष्य में परीक्षा प्रणाली को अधिक प्रभावी और सुरक्षित बनाने के लिए क्या ठोस कदम उठाने जा रही है।

अदालत ने स्पष्ट किया कि उसका उद्देश्य केवल वर्तमान विवादों की समीक्षा करना नहीं है,बल्कि ऐसी व्यवस्था सुनिश्चित करना है,जिसमें भविष्य में 2024 और 2026 जैसी परिस्थितियाँ दोबारा उत्पन्न न हों। न्यायालय ने कहा कि परीक्षा प्रणाली में सुधार केवल एक बार की प्रक्रिया नहीं हो सकती,बल्कि इसे लगातार विकसित और मजबूत किया जाना चाहिए,ताकि छात्रों का भरोसा कायम रहे।

विशेषज्ञों का मानना है कि सुप्रीम कोर्ट की यह टिप्पणी देश की परीक्षा प्रणाली में व्यापक सुधारों की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम साबित हो सकती है। पिछले कुछ वर्षों में विभिन्न प्रतियोगी परीक्षाओं को लेकर उठे विवादों ने परीक्षा संचालन एजेंसियों की कार्यप्रणाली पर सवाल खड़े किए हैं। ऐसे में सर्वोच्च न्यायालय का हस्तक्षेप और जवाबदेही पर दिया गया जोर भविष्य में अधिक पारदर्शी और विश्वसनीय परीक्षा व्यवस्था के निर्माण में अहम भूमिका निभा सकता है।

फिलहाल इस मामले की अगली सुनवाई जुलाई में निर्धारित की गई है। तब तक केंद्र सरकार और संबंधित मंत्रालयों को अदालत के समक्ष अपने प्रस्तावित सुधारों और कार्ययोजनाओं का विस्तृत विवरण प्रस्तुत करना होगा। देशभर के लाखों छात्र और अभिभावक अब इस मामले में होने वाले अगले घटनाक्रम पर नजर बनाए हुए हैं,क्योंकि इसका सीधा संबंध देश की उच्च शिक्षा व्यवस्था और युवाओं के भविष्य से जुड़ा हुआ है।