नई दिल्ली,12 जून (युआईटीवी)- भारतीय खेल जगत से एक बेहद दुखद खबर सामने आई है। देश के पूर्व स्टार निशानेबाज,एशियाई खेलों के स्वर्ण पदक विजेता और भारतीय शूटिंग टीम के प्रतिष्ठित कोच जसपाल राणा का शुक्रवार को 49 वर्ष की उम्र में निधन हो गया। उनके निधन की खबर से खेल जगत में शोक की लहर दौड़ गई है। एक खिलाड़ी, मार्गदर्शक और प्रेरणास्रोत के रूप में उनकी पहचान भारतीय निशानेबाजी के इतिहास में हमेशा याद रखी जाएगी। जसपाल राणा का जाना केवल एक खिलाड़ी का निधन नहीं, बल्कि भारतीय शूटिंग की एक ऐसी शख्सियत का खोना है,जिसने दशकों तक इस खेल को नई ऊँचाइयों तक पहुँचाने में अहम भूमिका निभाई।
रिपोर्टों के अनुसार,जसपाल राणा हाल ही में जर्मनी के म्यूनिख में आयोजित अंतर्राष्ट्रीय निशानेबाजी खेल महासंघ विश्व कप में भारतीय टीम के साथ मौजूद थे। प्रतियोगिता समाप्त होने के बाद जब वह भारत लौट रहे थे,तभी उनकी तबीयत अचानक बिगड़ गई। इसके बाद उन्हें दिल्ली के एक अस्पताल में भर्ती कराया गया,जहाँ उपचार के दौरान उनका निधन हो गया। उनके निधन की खबर सामने आते ही खिलाड़ियों,कोचों,खेल प्रशासकों और खेल प्रेमियों ने गहरा दुख व्यक्त किया।
जसपाल राणा उस समय भारतीय पिस्टल निशानेबाजी टीम के हाई परफॉर्मेंस कोच के रूप में कार्य कर रहे थे। उनकी देखरेख में भारतीय टीम ने हाल के वर्षों में शानदार प्रदर्शन किया था। म्यूनिख विश्व कप में भी भारतीय पिस्टल निशानेबाजों ने दो स्वर्ण और दो रजत पदक जीतकर देश का नाम रोशन किया था। इस सफलता के पीछे जसपाल राणा की रणनीति, अनुभव और खिलाड़ियों को मानसिक रूप से मजबूत बनाने की क्षमता को महत्वपूर्ण माना जाता है।
जसपाल राणा का नाम भारतीय निशानेबाजी के इतिहास में स्वर्ण अक्षरों में दर्ज है। उन्होंने खिलाड़ी के रूप में अपने करियर में अनेक अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिताओं में देश का प्रतिनिधित्व किया और कई यादगार उपलब्धियाँ हासिल कीं। एशियाई खेलों,राष्ट्रमंडल खेलों और एशियाई निशानेबाजी चैंपियनशिप में उन्होंने भारत के लिए कई पदक जीते। अपने शानदार प्रदर्शन के दम पर उन्होंने दुनिया भर में भारतीय निशानेबाजी की पहचान मजबूत की।
राष्ट्रमंडल खेलों में उनका रिकॉर्ड विशेष रूप से उल्लेखनीय रहा। उन्होंने 1994, 1998, 2002 और 2006 के राष्ट्रमंडल खेलों में भारत का प्रतिनिधित्व किया और कुल 15 पदक अपने नाम किए। इनमें 9 स्वर्ण,4 रजत और 2 कांस्य पदक शामिल थे। उस दौर में जब भारत में निशानेबाजी को आज जैसी लोकप्रियता और संसाधन उपलब्ध नहीं थे,तब जसपाल राणा ने अपनी प्रतिभा और मेहनत के बल पर अंतर्राष्ट्रीय मंच पर देश का गौरव बढ़ाया।
एशियाई खेलों में भी उनका प्रदर्शन शानदार रहा। 1994, 1998 और 2006 के एशियाई खेलों में उन्होंने कुल आठ पदक जीतकर भारतीय खेल इतिहास में अपना नाम दर्ज कराया। उनकी सफलता ने देश में युवा खिलाड़ियों को इस खेल की ओर आकर्षित किया और निशानेबाजी को एक संभावनाशील खेल के रूप में स्थापित करने में मदद की।
हालाँकि,जसपाल राणा की सबसे बड़ी विरासत केवल उनके पदक नहीं हैं,बल्कि वे खिलाड़ी हैं,जिन्हें उन्होंने तैयार किया। खिलाड़ी के रूप में सफलता हासिल करने के बाद उन्होंने कोचिंग को अपना मिशन बनाया और भारतीय निशानेबाजी को नई पीढ़ी के सितारे दिए। उनकी कोचिंग शैली अनुशासन,तकनीकी दक्षता और मानसिक मजबूती पर आधारित थी। यही कारण था कि उनके मार्गदर्शन में कई युवा खिलाड़ियों ने अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर सफलता हासिल की।
भारतीय राष्ट्रीय राइफल संघ ने उन्हें 25 मीटर पिस्टल स्पर्धा के लिए हाई परफॉर्मेंस कोच नियुक्त किया था। इस भूमिका में उन्होंने खिलाड़ियों के लिए एक सख्त लेकिन प्रभावी प्रशिक्षण प्रणाली विकसित की। विशेषज्ञों का मानना है कि भारतीय पिस्टल निशानेबाजी में जो निरंतरता और गुणवत्ता हाल के वर्षों में देखने को मिली,उसमें जसपाल राणा का बड़ा योगदान रहा।
उनकी कोचिंग यात्रा का सबसे चर्चित अध्याय ओलंपिक पदक विजेता मनु भाकर के साथ जुड़ा रहा। जसपाल राणा की देखरेख में मनु भाकर ने अंतर्राष्ट्रीय मंच पर कई उपलब्धियाँ हासिल कीं और भारतीय निशानेबाजी को नई पहचान दिलाई। उनके मार्गदर्शन में मनु ने पेरिस ओलंपिक में शानदार प्रदर्शन करते हुए दो स्वर्ण पदक जीते। यह उपलब्धि भारतीय निशानेबाजी के इतिहास में एक महत्वपूर्ण मील का पत्थर मानी जाती है। मनु की सफलता ने यह भी साबित किया कि जसपाल राणा केवल एक महान खिलाड़ी ही नहीं,बल्कि विश्वस्तरीय कोच भी थे।
भारतीय खेलों में उनके योगदान को देखते हुए उन्हें वर्ष 2020 में प्रतिष्ठित द्रोणाचार्य पुरस्कार से सम्मानित किया गया था। यह सम्मान उन कोचों को दिया जाता है,जिन्होंने खिलाड़ियों को अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर सफलता दिलाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई हो। जसपाल राणा ने इस सम्मान को अपनी उपलब्धि नहीं,बल्कि भारतीय निशानेबाजी परिवार की सामूहिक सफलता बताया था।
उनके निधन पर भारतीय राष्ट्रीय राइफल संघ के अध्यक्ष कलिकेश नारायण सिंह देव ने गहरा दुख व्यक्त किया। उन्होंने कहा कि जसपाल राणा का जाना भारतीय खेल जगत के लिए अपूरणीय क्षति है। उनके अनुसार,जसपाल केवल एक चैंपियन खिलाड़ी नहीं थे,बल्कि एक उत्कृष्ट मार्गदर्शक और प्रेरक व्यक्तित्व भी थे। उन्होंने कहा कि भारतीय निशानेबाजी को जिस ऊँचाई तक पहुँचाने में जसपाल ने योगदान दिया,उसे कभी भुलाया नहीं जा सकेगा।
खेल जगत से जुड़े कई वर्तमान और पूर्व खिलाड़ियों ने भी उनके निधन पर शोक व्यक्त किया है। सभी ने उन्हें एक ऐसे इंसान के रूप में याद किया,जो हमेशा खिलाड़ियों को बेहतर बनने के लिए प्रेरित करते थे। उनका मानना था कि प्रतिभा तभी सफल होती है जब उसके साथ अनुशासन,मेहनत और आत्मविश्वास जुड़ा हो। यही संदेश उन्होंने अपने पूरे जीवन में खिलाड़ियों को दिया।
जसपाल राणा का जीवन भारतीय खेलों के लिए समर्पण,संघर्ष और सफलता की प्रेरक कहानी रहा। उन्होंने एक खिलाड़ी के रूप में देश को गौरवान्वित किया और फिर एक कोच के रूप में नई पीढ़ी को तैयार कर भारतीय निशानेबाजी की नींव को और मजबूत बनाया। उनका योगदान केवल पदकों तक सीमित नहीं था,बल्कि उन्होंने इस खेल की संस्कृति को विकसित करने और युवा खिलाड़ियों में जीत का विश्वास जगाने का काम किया।
उनके निधन से भारतीय निशानेबाजी को गहरा आघात पहुँचा है। हालाँकि,वे अब हमारे बीच नहीं हैं,लेकिन उनकी उपलब्धियाँ,उनके द्वारा प्रशिक्षित खिलाड़ी और खेल के प्रति उनका समर्पण हमेशा उन्हें जीवित रखेगा। भारतीय खेल जगत आज एक ऐसे महान योद्धा को विदाई दे रहा है,जिसने अपने निशाने से केवल लक्ष्य ही नहीं साधे,बल्कि लाखों युवाओं के सपनों को भी दिशा दी।
