अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप

पनामा नहर पर फिर बोले डोनाल्ड ट्रंप,चीन के बढ़ते प्रभाव पर जताई चिंता,कहा- इस रणनीतिक जलमार्ग पर बीजिंग का कब्जा कभी नहीं होने देंगे

वाशिंगटन,2 जुलाई (युआईटीवी)- अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने एक बार फिर पनामा नहर को लेकर अपनी पुरानी आपत्तियाँ दोहराते हुए चीन के बढ़ते प्रभाव पर गंभीर चिंता व्यक्त की है। उन्होंने कहा कि दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण समुद्री व्यापार मार्गों में शामिल पनामा नहर पर चीन अपना प्रभाव बढ़ाने की कोशिश कर रहा है और अमेरिका ऐसा किसी भी कीमत पर नहीं होने देगा। ट्रंप ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि उनकी सरकार इस रणनीतिक जलमार्ग पर चीन की बढ़ती मौजूदगी को रोकने के लिए हर आवश्यक कदम उठाएगी। हालाँकि,उन्होंने इस संबंध में किसी नई नीति या विशेष कार्रवाई की घोषणा नहीं की,लेकिन उनके बयान ने एक बार फिर पनामा नहर की सामरिक और आर्थिक अहमियत को वैश्विक चर्चा के केंद्र में ला दिया है।

नॉर्थ डकोटा के मेडोरा में आयोजित थियोडोर रूजवेल्ट प्रेसिडेंशियल लाइब्रेरी के उद्घाटन समारोह को संबोधित करते हुए ट्रंप ने पनामा नहर के निर्माण का उल्लेख किया और इसे अमेरिकी इतिहास की सबसे बड़ी इंजीनियरिंग उपलब्धियों में से एक बताया। उन्होंने पूर्व राष्ट्रपति थियोडोर रूजवेल्ट के नेतृत्व की सराहना करते हुए कहा कि उनके कार्यकाल में शुरू हुई यह परियोजना केवल एक निर्माण कार्य नहीं थी,बल्कि इसने वैश्विक समुद्री व्यापार की दिशा बदल दी थी। ट्रंप ने कहा कि पनामा नहर ने अमेरिका की आर्थिक और रणनीतिक ताकत को नई ऊँचाइयों तक पहुँचाया और दशकों तक वैश्विक व्यापार में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

अपने संबोधन के दौरान ट्रंप ने कहा कि अब चीन इस महत्वपूर्ण जलमार्ग पर नियंत्रण या प्रभाव स्थापित करने की कोशिश कर रहा है,लेकिन अमेरिका इसे सफल नहीं होने देगा। उन्होंने कहा कि यह केवल एक नहर का मुद्दा नहीं है,बल्कि अंतर्राष्ट्रीय व्यापार,समुद्री सुरक्षा और वैश्विक शक्ति संतुलन से जुड़ा विषय है। उनके अनुसार यदि चीन का प्रभाव इस क्षेत्र में बढ़ता है,तो इसका असर केवल अमेरिका पर नहीं,बल्कि पूरी दुनिया के व्यापारिक ढाँचे पर पड़ सकता है।

राष्ट्रपति ट्रंप ने पनामा नहर का नियंत्रण पनामा को सौंपने के अमेरिका के पुराने फैसले की भी आलोचना की। उन्होंने कहा कि यह निर्णय गलत था और अमेरिका ने अपनी एक ऐसी संपत्ति छोड़ दी,जिसका रणनीतिक और आर्थिक महत्व बेहद बड़ा था। ट्रंप ने कहा कि अमेरिका ने इस परियोजना के निर्माण में भारी निवेश किया था और यह देश के इतिहास की सबसे महँगी परियोजनाओं में से एक थी। उन्होंने यह भी कहा कि यह अमेरिका की सबसे अधिक लाभ देने वाली परिसंपत्तियों में शामिल थी और इसका नियंत्रण छोड़ना एक बड़ी भूल साबित हुआ।

उन्होंने अपने भाषण में दावा किया कि पनामा को नियंत्रण मिलने के बाद सबसे पहला कदम नहर से गुजरने वाले जहाजों पर शुल्क बढ़ाना था। ट्रंप के अनुसार पनामा ने ट्रांजिट शुल्क में चार गुना तक वृद्धि कर दी और इसके बावजूद जहाजों की आवाजाही पर कोई विशेष असर नहीं पड़ा। उन्होंने कहा कि बाद में शुल्क में दो बार और बढ़ोतरी की गई, लेकिन फिर भी जहाजों का आवागमन जारी रहा। ट्रंप का कहना था कि इससे यह साबित होता है कि पनामा नहर की वैश्विक व्यापार में कितनी महत्वपूर्ण भूमिका है और इसके विकल्प सीमित हैं।

अपने संबोधन में ट्रंप ने थियोडोर रूजवेल्ट की विरासत पर भी विस्तार से चर्चा की। उन्होंने कहा कि रूजवेल्ट केवल पर्यावरण संरक्षण और घरेलू सुधारों के लिए ही नहीं जाने जाते, बल्कि उन्होंने ऐसे बुनियादी ढाँचा परियोजनाओं की नींव भी रखी,जिन्होंने अमेरिका की वैश्विक स्थिति को मजबूत किया। ट्रंप ने कहा कि पनामा नहर इसका सबसे बड़ा उदाहरण है,जिसने समुद्री व्यापार को नई दिशा दी और अमेरिका को रणनीतिक लाभ प्रदान किया।

हालाँकि,ट्रंप ने इस विषय पर किसी नए सरकारी कदम की घोषणा नहीं की,लेकिन उनके बयान को चीन और अमेरिका के बीच बढ़ती रणनीतिक प्रतिस्पर्धा के संदर्भ में देखा जा रहा है। पिछले कुछ वर्षों में दोनों देशों के बीच व्यापार,प्रौद्योगिकी,समुद्री सुरक्षा और वैश्विक प्रभाव को लेकर लगातार तनाव बना हुआ है। ऐसे में पनामा नहर जैसे रणनीतिक जलमार्ग का मुद्दा दोनों देशों के बीच प्रतिस्पर्धा का एक महत्वपूर्ण पहलू बनता जा रहा है।

पनामा नहर का इतिहास भी इसे दुनिया की सबसे महत्वपूर्ण परियोजनाओं में शामिल करता है। बीसवीं सदी की शुरुआत में अमेरिका ने तत्कालीन राष्ट्रपति थियोडोर रूजवेल्ट के कार्यकाल में इस नहर के निर्माण की जिम्मेदारी सँभाली थी। कठिन भौगोलिक परिस्थितियों और तकनीकी चुनौतियों के बावजूद इस परियोजना को पूरा किया गया। इसके निर्माण के बाद अटलांटिक महासागर और प्रशांत महासागर के बीच समुद्री दूरी में भारी कमी आई,जिससे अंतर्राष्ट्रीय व्यापार की गति और लागत दोनों पर सकारात्मक प्रभाव पड़ा।

बाद में अमेरिका और पनामा के बीच वर्ष 1977 में एक महत्वपूर्ण संधि पर हस्ताक्षर किए गए। इस समझौते के तहत यह तय हुआ कि पनामा नहर का नियंत्रण चरणबद्ध तरीके से अमेरिका से पनामा को सौंपा जाएगा। इस प्रक्रिया के तहत 31 दिसंबर 1999 को नहर का पूरा नियंत्रण पनामा के पास चला गया। तब से इसका संचालन पनामा कैनाल अथॉरिटी कर रही है, जो पनामा सरकार की एक स्वायत्त एजेंसी है और नहर के प्रबंधन,रखरखाव तथा संचालन की जिम्मेदारी निभाती है।

करीब 82 किलोमीटर लंबी यह नहर अटलांटिक और प्रशांत महासागरों को जोड़ती है। इसकी वजह से जहाजों को दक्षिण अमेरिका के दक्षिणी सिरे का लंबा और जोखिम भरा समुद्री मार्ग तय नहीं करना पड़ता। यही कारण है कि पनामा नहर दुनिया के सबसे व्यस्त समुद्री व्यापार मार्गों में गिनी जाती है। अनुमान है कि वैश्विक समुद्री व्यापार का लगभग पाँच प्रतिशत हिस्सा इसी जलमार्ग से होकर गुजरता है। ऊर्जा आपूर्ति,कच्चे माल, औद्योगिक उत्पादों और उपभोक्ता वस्तुओं के परिवहन में इस नहर की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण मानी जाती है।

पनामा नहर का महत्व केवल अमेरिका या पनामा तक सीमित नहीं है। एशिया,यूरोप और अमेरिका के बीच होने वाले व्यापार में भी यह जलमार्ग केंद्रीय भूमिका निभाता है। भारत जैसे देशों के लिए भी इसका विशेष महत्व है,क्योंकि भारत का एक बड़ा समुद्री व्यापार इसी मार्ग से होकर गुजरता है। यदि इस नहर में किसी प्रकार की रुकावट आती है या ट्रांजिट शुल्क में उल्लेखनीय वृद्धि होती है,तो इसका सीधा असर वैश्विक आपूर्ति शृंखला, माल ढुलाई की लागत और अंतरराष्ट्रीय व्यापार पर पड़ सकता है। इससे आयात-निर्यात करने वाले देशों की लागत बढ़ सकती है और वस्तुओं की कीमतों पर भी प्रभाव पड़ सकता है।

विशेषज्ञों का मानना है कि वर्तमान समय में पनामा नहर केवल एक समुद्री मार्ग नहीं, बल्कि वैश्विक भू-राजनीति का भी महत्वपूर्ण केंद्र बन चुकी है। अमेरिका और चीन जैसी महाशक्तियाँ हिंद-प्रशांत क्षेत्र के साथ-साथ दुनिया के अन्य रणनीतिक समुद्री मार्गों पर भी अपना प्रभाव बनाए रखने की कोशिश कर रही हैं। ऐसे में ट्रंप का बयान इस व्यापक रणनीतिक प्रतिस्पर्धा का हिस्सा माना जा रहा है।

राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने भले ही पनामा नहर को लेकर किसी नई नीति की घोषणा नहीं की हो,लेकिन उनके ताजा बयान ने यह स्पष्ट कर दिया है कि यदि उनकी सरकार को लगता है कि चीन इस रणनीतिक जलमार्ग पर अपना प्रभाव बढ़ा रहा है,तो अमेरिका इस मुद्दे को गंभीरता से लेगा। दूसरी ओर पनामा नहर की वैश्विक आर्थिक और सामरिक अहमियत को देखते हुए आने वाले समय में इस जलमार्ग से जुड़ी गतिविधियों पर पूरी दुनिया की नजर बनी रहेगी,क्योंकि इसका प्रभाव केवल क्षेत्रीय राजनीति तक सीमित नहीं,बल्कि अंतर्राष्ट्रीय व्यापार,समुद्री सुरक्षा और वैश्विक अर्थव्यवस्था पर भी पड़ सकता है।