डोनाल्ड ट्रंप (तस्वीर क्रेडिट@rashtra_press)

ईरान पर फिर सख्त हुए डोनाल्ड ट्रंप,परमाणु समझौते की वकालत के साथ सैन्य कार्रवाई की भी दी चेतावनी

वॉशिंगटन,29 जुलाई (युआईटीवी)- अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने एक बार फिर ईरान के परमाणु कार्यक्रम को लेकर कड़ा रुख अपनाते हुए कहा है कि तेहरान अब वॉशिंगटन के साथ समझौता करने के लिए “बेहद इच्छुक” है और उसने मूल रूप से यह स्वीकार कर लिया है कि वह परमाणु हथियार नहीं रख सकता। हालाँकि,ट्रंप ने स्पष्ट किया कि यदि बातचीत किसी नतीजे तक नहीं पहुँचती या ईरान समझौते से पीछे हटता है,तो अमेरिका सैन्य कार्रवाई से पीछे नहीं हटेगा। उन्होंने चेतावनी दी कि जरूरत पड़ने पर अमेरिकी सेना ईरान के महत्वपूर्ण बुनियादी ढांचे और रणनीतिक ठिकानों पर फिर से हमले कर सकती है। ट्रंप के इन बयानों को पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव और अमेरिका-ईरान संबंधों के संदर्भ में बेहद महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ये टिप्पणियाँ रिपब्लिकन सांसद एंडी ओगल्स के समर्थन में आयोजित एक वर्चुअल चुनावी रैली और फॉक्स न्यूज को दिए एक अलग साक्षात्कार के दौरान कीं। उन्होंने कहा कि अमेरिका का रुख बिल्कुल स्पष्ट है और ईरान को किसी भी स्थिति में परमाणु हथियार रखने की अनुमति नहीं दी जाएगी। ट्रंप ने कहा कि अमेरिकी दबाव और पहले की गई सैन्य कार्रवाई के बाद ईरान अब समझ चुका है कि उसके लिए परमाणु हथियारों का रास्ता बंद है।

टेनेसी में आयोजित वर्चुअल रैली को संबोधित करते हुए ट्रंप ने कहा कि ईरान पर अमेरिका ने पहले ही बेहद प्रभावी कार्रवाई की है और उसका असर अब साफ दिखाई दे रहा है। उन्होंने कहा कि तेहरान किसी भी तरह समझौता करना चाहता है क्योंकि वह जानता है कि अमेरिका अपने राष्ट्रीय और वैश्विक सुरक्षा हितों से कोई समझौता नहीं करेगा। ट्रंप ने दोहराया कि ईरान के पास कभी भी परमाणु हथियार नहीं होंगे और यही अमेरिका की सबसे बड़ी प्राथमिकता है।

फॉक्स न्यूज को दिए साक्षात्कार में ट्रंप ने दावा किया कि अमेरिका और ईरान के बीच पर्दे के पीछे काफी सकारात्मक बातचीत चल रही है। उन्होंने ईरान के उन सार्वजनिक बयानों को खारिज किया,जिनमें कहा गया था कि दोनों देशों के बीच परमाणु कार्यक्रम को लेकर कोई चर्चा नहीं हो रही है। ट्रंप ने कहा कि कई बार ऐसा होता है कि बातचीत के दौरान दूसरी तरफ से सार्वजनिक रूप से अलग बयान दिए जाते हैं,जबकि वास्तविकता कुछ और होती है।

उन्होंने कहा कि अमेरिका और ईरान के बीच हुई चर्चाओं का सबसे महत्वपूर्ण विषय परमाणु कार्यक्रम ही रहा है। ट्रंप के अनुसार,बातचीत का मूल उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि ईरान भविष्य में कभी भी परमाणु हथियार विकसित न कर सके। उन्होंने कहा कि तेहरान इस सिद्धांत को मूल रूप से स्वीकार कर चुका है,लेकिन अब उसे आधिकारिक रूप से भी इसकी पुष्टि करनी होगी,ताकि किसी व्यापक समझौते का रास्ता साफ हो सके।

ट्रंप ने कहा कि उनकी प्राथमिकता किसी नए युद्ध के बजाय कूटनीतिक समाधान है। उनका मानना है कि यदि समझौते के माध्यम से परमाणु संकट का समाधान निकल सकता है,तो वही सबसे बेहतर विकल्प होगा। हालाँकि,उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि अमेरिका किसी भी स्थिति में अपनी सुरक्षा या अपने सहयोगी देशों की सुरक्षा से समझौता नहीं करेगा। यदि ईरान बातचीत से पीछे हटता है या समझौते का पालन नहीं करता है,तो अमेरिका आवश्यक सैन्य कदम उठाने के लिए पूरी तरह तैयार रहेगा।

राष्ट्रपति ने चेतावनी देते हुए कहा कि यदि ईरान समझौते को स्वीकार नहीं करता,तो अमेरिका उसके महत्वपूर्ण बुनियादी ढाँचे को निशाना बना सकता है। उन्होंने विशेष रूप से पुलों,बिजलीघरों और अन्य रणनीतिक प्रतिष्ठानों का उल्लेख करते हुए कहा कि यदि कूटनीति विफल होती है,तो सैन्य कार्रवाई फिर शुरू की जाएगी। ट्रंप ने कहा कि यदि समझौता नहीं हुआ,तो अमेरिका वापस जाकर अपना अधूरा काम पूरा करेगा।

अपने बयान में ट्रंप ने पिकएक्स माउंटेन का भी उल्लेख किया,जिसके बारे में रिपोर्टें हैं कि वहाँ ईरान निर्माण और किलेबंदी का कार्य कर रहा है। उन्होंने कहा कि यदि समझौता नहीं हुआ,तो अमेरिका इस स्थान को भी निशाना बना सकता है। ट्रंप ने दावा किया कि अमेरिका पहले ही ईरान के कई परमाणु ठिकानों को नष्ट कर चुका है और यदि भविष्य में आवश्यकता पड़ी,तो बाकी रणनीतिक स्थानों पर भी कार्रवाई करने में संकोच नहीं करेगा। उनके अनुसार,पिकएक्स माउंटेन को नष्ट करना अमेरिकी सेना के लिए कठिन नहीं होगा।

ट्रंप ने होर्मुज जलडमरूमध्य का भी उल्लेख किया,जिसे वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति के लिए सबसे महत्वपूर्ण समुद्री मार्गों में गिना जाता है। उन्होंने दावा किया कि इस समुद्री क्षेत्र में अमेरिकी सेना की मजबूत मौजूदगी है और वहाँ से गुजरने वाले जहाजों पर प्रभावी निगरानी रखी जा रही है। उन्होंने कहा कि केवल उन्हीं जहाजों को गुजरने दिया जा रहा है, जिन्हें अनुमति दी जाती है। ट्रंप के अनुसार,अमेरिकी नाकेबंदी इतनी प्रभावी है कि उसकी अनुमति के बिना कोई भी जहाज आसानी से इस मार्ग का उपयोग नहीं कर सकता।

उन्होंने यह भी कहा कि जब दोनों देशों के बीच संभावित समझौते की रूपरेखा तैयार हो रही थी,तब अमेरिका ने अपनी समुद्री नाकेबंदी में कुछ ढील दी थी,लेकिन बाद में ईरान द्वारा समझौते की शर्तों का पालन नहीं करने के कारण उस ढील को वापस ले लिया गया। ट्रंप ने संकेत दिया कि भविष्य में भी अमेरिकी नीति पूरी तरह ईरान के व्यवहार पर निर्भर करेगी।

ईरान के परमाणु कार्यक्रम को लेकर अमेरिका और पश्चिमी देशों की चिंताएँ कई वर्षों से बनी हुई हैं। वर्ष 2015 में ईरान और दुनिया की छह प्रमुख शक्तियों के बीच एक ऐतिहासिक परमाणु समझौता हुआ था। इस समझौते के तहत ईरान ने अपने परमाणु कार्यक्रम पर कई सीमाएँ स्वीकार की थीं,जबकि बदले में उस पर लगे कई आर्थिक प्रतिबंधों में राहत दी गई थी। इस समझौते का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना था कि ईरान परमाणु हथियार विकसित न कर सके और उसका परमाणु कार्यक्रम केवल शांतिपूर्ण उद्देश्यों तक सीमित रहे।

हालाँकि,डोनाल्ड ट्रंप ने अपने पहले राष्ट्रपति कार्यकाल के दौरान वर्ष 2018 में अमेरिका को इस समझौते से अलग कर लिया था। उनका तर्क था कि यह समझौता अमेरिका के हितों की पर्याप्त सुरक्षा नहीं करता और ईरान को भविष्य में परमाणु क्षमता विकसित करने से प्रभावी ढंग से नहीं रोक सकता। अमेरिका के समझौते से बाहर होने के बाद दोनों देशों के संबंधों में तनाव काफी बढ़ गया और ईरान पर कई नए आर्थिक प्रतिबंध लगाए गए।

इसके बाद पश्चिम एशिया में कई बार सैन्य तनाव देखने को मिला। ईरान और अमेरिका के बीच प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष टकराव की घटनाओं ने क्षेत्रीय सुरक्षा को प्रभावित किया। कई मौकों पर दोनों देशों के बीच कूटनीतिक संवाद भी हुआ,लेकिन स्थायी समाधान नहीं निकल सका। ट्रंप के हालिया बयान से यह संकेत मिलता है कि अमेरिका एक बार फिर बातचीत और दबाव की दोहरी रणनीति अपनाना चाहता है।

अंतर्राष्ट्रीय मामलों के जानकारों का मानना है कि ट्रंप के बयान का उद्देश्य एक ओर ईरान पर अधिकतम दबाव बनाए रखना है,तो दूसरी ओर बातचीत का रास्ता भी खुला रखना है। उनका मानना है कि अमेरिका यह संदेश देना चाहता है कि यदि ईरान परमाणु कार्यक्रम को सीमित करने पर सहमत होता है,तो समझौते की संभावना बनी रह सकती है,लेकिन यदि वह पीछे हटता है,तो उसे गंभीर परिणामों का सामना करना पड़ सकता है।

पश्चिम एशिया पहले से ही कई सुरक्षा चुनौतियों का सामना कर रहा है। ऐसे में अमेरिका और ईरान के बीच किसी भी प्रकार का तनाव वैश्विक ऊर्जा बाजार,समुद्री व्यापार और अंतर्राष्ट्रीय कूटनीति पर व्यापक प्रभाव डाल सकता है। होर्मुज जलडमरूमध्य से दुनिया के बड़े हिस्से में तेल और गैस की आपूर्ति होती है,इसलिए इस क्षेत्र में किसी भी प्रकार का सैन्य टकराव वैश्विक अर्थव्यवस्था को भी प्रभावित कर सकता है।

फिलहाल ट्रंप के ताजा बयान ने यह स्पष्ट कर दिया है कि अमेरिका की नीति दो समानांतर रास्तों पर आगे बढ़ रही है। एक ओर वह कूटनीतिक समझौते के जरिए ईरान के परमाणु कार्यक्रम पर स्थायी नियंत्रण चाहता है,वहीं दूसरी ओर उसने सैन्य विकल्प को भी पूरी तरह खुला रखा है। अब अंतर्राष्ट्रीय समुदाय की नजर इस बात पर टिकी है कि अमेरिका और ईरान के बीच चल रही बातचीत किस दिशा में आगे बढ़ती है और क्या दोनों देश किसी नए समझौते तक पहुँच पाते हैं या फिर क्षेत्र में तनाव एक बार फिर बढ़ने की आशंका साकार होती है।