चेन्नई,29 जुलाई (युआईटीवी)- तमिलनाडु सरकार राज्य की बहुचर्चित और देशभर में मिसाल मानी जाने वाली मिड-डे मील योजना में बड़ा बदलाव करने पर विचार कर रही है। सरकार सप्ताह में एक दिन स्कूली बच्चों को चिकन बिरयानी परोसने के प्रस्ताव का परीक्षण कर रही है। इस पहल का मुख्य उद्देश्य बच्चों को अधिक पौष्टिक भोजन उपलब्ध कराना,उनके आहार में प्रोटीन की मात्रा बढ़ाना और सरकारी स्कूलों में मिलने वाले भोजन को छात्रों के लिए अधिक आकर्षक बनाना है। यदि इस प्रस्ताव को अंतिम मंजूरी मिलती है, तो यह देश के सबसे पुराने और सफल स्कूल पोषण कार्यक्रमों में से एक में एक महत्वपूर्ण बदलाव माना जाएगा।
राज्य सरकार के सूत्रों के अनुसार,फिलहाल यह प्रस्ताव विचाराधीन है और इस पर विभिन्न स्तरों पर चर्चा चल रही है। अंतिम निर्णय सामाजिक कल्याण एवं महिला सशक्तिकरण विभाग के साथ विस्तृत विचार-विमर्श के बाद लिया जाएगा। यही विभाग पूरे राज्य में मिड-डे मील योजना के संचालन और उसके क्रियान्वयन की जिम्मेदारी सँभालता है। सरकार का मानना है कि किसी भी बदलाव को लागू करने से पहले उसके पोषण संबंधी लाभ,वित्तीय प्रभाव,आपूर्ति व्यवस्था और व्यावहारिक पहलुओं का सावधानीपूर्वक मूल्यांकन आवश्यक है।
तमिलनाडु लंबे समय से स्कूली बच्चों के पोषण को प्राथमिकता देने वाला राज्य रहा है। यहाँ की मिड-डे मील योजना ने न केवल लाखों बच्चों को पौष्टिक भोजन उपलब्ध कराया है,बल्कि सरकारी स्कूलों में नामांकन बढ़ाने,विद्यार्थियों की नियमित उपस्थिति सुनिश्चित करने और आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों के बच्चों को शिक्षा से जोड़े रखने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। इसी परंपरा को आगे बढ़ाते हुए सरकार अब भोजन की गुणवत्ता और पोषण मूल्य को और बेहतर बनाने के विकल्पों पर विचार कर रही है।
प्रस्तावित योजना के अनुसार सप्ताह में एक बार चिकन बिरयानी परोसी जा सकती है, जिससे बच्चों को स्वादिष्ट भोजन के साथ-साथ पर्याप्त मात्रा में प्रोटीन भी मिल सकेगा। विशेषज्ञों का मानना है कि बढ़ती उम्र के बच्चों के लिए संतुलित आहार अत्यंत आवश्यक है। प्रोटीन मांसपेशियों के विकास,शारीरिक वृद्धि और रोग प्रतिरोधक क्षमता को मजबूत करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। ऐसे में यदि बच्चों को नियमित रूप से पौष्टिक भोजन उपलब्ध कराया जाता है,तो इसका सकारात्मक प्रभाव उनके स्वास्थ्य और पढ़ाई दोनों पर पड़ सकता है।
सरकार केवल चिकन बिरयानी को शामिल करने तक ही सीमित नहीं रहना चाहती,बल्कि मिड-डे मील योजना के तहत परोसे जाने वाले भोजन की समग्र गुणवत्ता में सुधार करने पर भी विचार कर रही है। अधिकारियों के अनुसार,स्कूलों में उपलब्ध कराए जाने वाले चावल की गुणवत्ता बेहतर बनाने सहित अन्य खाद्य सामग्री की गुणवत्ता बढ़ाने पर भी चर्चा चल रही है। सरकार का मानना है कि यदि भोजन स्वादिष्ट होने के साथ-साथ उच्च गुणवत्ता वाला भी होगा,तो बच्चे उसे अधिक रुचि से खाएंगे और योजना का उद्देश्य अधिक प्रभावी ढंग से पूरा होगा।
तमिलनाडु की मिड-डे मील योजना वर्तमान में कक्षा एक से लेकर कक्षा दस तक के विद्यार्थियों को कवर करती है। सरकारी और सरकारी सहायता प्राप्त विद्यालयों में पढ़ने वाले लगभग 40 लाख छात्र इस योजना का लाभ उठा रहे हैं। यह योजना वर्षों से लाखों परिवारों के लिए राहत का माध्यम बनी हुई है,विशेषकर उन परिवारों के लिए जिनकी आर्थिक स्थिति कमजोर है और जिनके बच्चों के लिए स्कूल में मिलने वाला पौष्टिक भोजन अत्यंत महत्वपूर्ण होता है।
राज्य सरकार ने पिछले कुछ वर्षों में केवल दोपहर के भोजन तक ही अपनी योजनाओं को सीमित नहीं रखा है। मुख्यमंत्री की नाश्ता योजना भी व्यापक स्तर पर लागू की गई है, जिसके अंतर्गत कक्षा एक से आठ तक के विद्यार्थियों को विद्यालय में सुबह का पौष्टिक भोजन उपलब्ध कराया जाता है। हाल ही में इस योजना के विस्तार के बाद लगभग 32 लाख बच्चों को इसका लाभ मिलने की संभावना है। सरकार का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि कोई भी बच्चा खाली पेट विद्यालय न पहुँचे और उसे पढ़ाई के लिए आवश्यक ऊर्जा मिल सके।
सरकार अब इस बात पर भी विचार कर रही है कि नाश्ता और दोपहर के भोजन की सुविधा को उच्च माध्यमिक कक्षाओं तक विस्तारित किया जाए। यदि मिड-डे मील योजना को कक्षा ग्यारह और बारह तक बढ़ाने का निर्णय लिया जाता है,तो अनुमान है कि लगभग आठ लाख अतिरिक्त छात्र इसका लाभ उठा सकेंगे। यह कदम विशेष रूप से उन विद्यार्थियों के लिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है,जो आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों से आते हैं और जिनकी पढ़ाई कई बार पोषण की कमी तथा आर्थिक कठिनाइयों के कारण प्रभावित होती है।
शिक्षा विशेषज्ञों का लंबे समय से मानना रहा है कि किशोरावस्था के विद्यार्थियों को पर्याप्त पोषण उपलब्ध कराना उनकी शैक्षणिक सफलता के लिए बेहद जरूरी है। इस आयु में शरीर और मस्तिष्क दोनों का तेजी से विकास होता है। यदि विद्यार्थियों को संतुलित भोजन नहीं मिलता,तो इसका असर उनकी एकाग्रता,स्मरण शक्ति,शारीरिक क्षमता और सीखने की गति पर पड़ सकता है। इसलिए उच्च माध्यमिक स्तर तक पोषण योजनाओं का विस्तार विद्यार्थियों के समग्र विकास में महत्वपूर्ण योगदान दे सकता है।
स्कूल प्रशासकों का भी मानना है कि बेहतर भोजन उपलब्ध होने से विद्यार्थियों की विद्यालय में नियमित उपस्थिति बढ़ेगी और पढ़ाई बीच में छोड़ने वाले छात्रों की संख्या कम हो सकती है। विशेष रूप से ग्रामीण और आर्थिक रूप से कमजोर क्षेत्रों में रहने वाले परिवारों के लिए ऐसी योजनाएँ बच्चों को शिक्षा से जोड़े रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं। कई परिवारों के लिए विद्यालय में मिलने वाला भोजन बच्चों के दैनिक पोषण का एक महत्वपूर्ण हिस्सा होता है।
तमिलनाडु का नाम देश में भोजन आधारित कल्याणकारी योजनाओं के अग्रणी राज्यों में लिया जाता है। राज्य ने कई दशक पहले स्कूली बच्चों के लिए पोषण कार्यक्रमों की शुरुआत कर यह साबित किया था कि शिक्षा और पोषण एक-दूसरे के पूरक हैं। बाद में देश के अन्य राज्यों और केंद्र सरकार ने भी इसी मॉडल से प्रेरणा लेकर मिड-डे मील जैसी योजनाओं को व्यापक स्तर पर लागू किया। आज यह योजना देश के सबसे बड़े सामाजिक कल्याण कार्यक्रमों में से एक मानी जाती है।
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि चिकन बिरयानी को सप्ताह में एक बार मिड-डे मील का हिस्सा बनाया जाता है,तो यह केवल मेन्यू में बदलाव नहीं होगा,बल्कि बच्चों के पोषण स्तर को बेहतर बनाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम भी होगा। हालाँकि,इसके साथ कई व्यावहारिक चुनौतियाँ भी जुड़ी होंगी,जैसे खाद्य सामग्री की नियमित आपूर्ति,गुणवत्ता नियंत्रण,स्वच्छता,भंडारण व्यवस्था और सभी स्कूलों तक समान रूप से भोजन पहुँचाना। सरकार इन सभी पहलुओं का अध्ययन करने के बाद ही अंतिम निर्णय लेना चाहती है।
इसके अलावा यह भी सुनिश्चित करना होगा कि विभिन्न सामाजिक,सांस्कृतिक और स्थानीय आवश्यकताओं का सम्मान करते हुए योजना का क्रियान्वयन किया जाए। राज्य सरकार इस बात पर भी विचार कर सकती है कि जिन क्षेत्रों में किसी विशेष प्रकार के भोजन को लेकर अलग आवश्यकताएँ हैं,वहाँ उपयुक्त विकल्प उपलब्ध कराए जाएँ, ताकि सभी विद्यार्थियों को समान रूप से पौष्टिक भोजन मिल सके।
पोषण विशेषज्ञों का कहना है कि बच्चों के भोजन में विविधता होना भी महत्वपूर्ण है। यदि भोजन का मेन्यू समय-समय पर बदलता रहे और उसमें अलग-अलग प्रकार के पौष्टिक खाद्य पदार्थ शामिल किए जाएँ,तो बच्चे भोजन को अधिक रुचि के साथ ग्रहण करते हैं। इससे भोजन की बर्बादी भी कम होती है और बच्चों को आवश्यक पोषक तत्व भी पर्याप्त मात्रा में मिलते हैं।
फिलहाल चिकन बिरयानी को मिड-डे मील योजना में शामिल करने का प्रस्ताव विचाराधीन है और इस पर अंतिम निर्णय अभी लिया जाना बाकी है। यदि इसे मंजूरी मिलती है,तो यह तमिलनाडु की शिक्षा और पोषण संबंधी नीतियों में एक नया अध्याय जोड़ सकता है। यह कदम न केवल बच्चों के स्वास्थ्य को बेहतर बनाने की दिशा में महत्वपूर्ण होगा,बल्कि सरकारी स्कूलों को अधिक आकर्षक बनाने,विद्यार्थियों की नियमित उपस्थिति बढ़ाने और शिक्षा की गुणवत्ता में सुधार के व्यापक प्रयासों को भी नई मजबूती प्रदान कर सकता है। तमिलनाडु ने वर्षों से स्कूली पोषण कार्यक्रमों में जो नेतृत्वकारी भूमिका निभाई है,यह प्रस्ताव उसी परंपरा को आगे बढ़ाने की दिशा में एक संभावित और महत्वपूर्ण पहल के रूप में देखा जा रहा है।
