सहारनपुर,5 सितंबर (युआईटीवी)- उत्तर प्रदेश के सहारनपुर में कलेक्ट्रेट परिसर के अंदर बनी एक मस्जिद को प्रशासन ने ध्वस्त कर दिया। भारी पुलिस बल की मौजूदगी में छह बुलडोजरों के जरिए यह कार्रवाई की गई। प्रशासन के मुताबिक,कलेक्ट्रेट परिसर की सरकारी जमीन पर बना यह निर्माण अवैध पाया गया था और इसे हटाने का फैसला कानूनी प्रक्रिया पूरी होने के बाद लिया गया। जिला अदालत ने भी संबंधित बेदखली आदेश को बरकरार रखते हुए मस्जिद कमेटी की अपील खारिज कर दी थी। इसके बाद प्रशासन ने ध्वस्तीकरण की कार्रवाई शुरू की।
प्रशासन की इस कार्रवाई के दौरान इलाके में सुरक्षा के व्यापक इंतजाम किए गए थे। कानून-व्यवस्था बनाए रखने के लिए बड़ी संख्या में पुलिसकर्मियों की तैनाती की गई। अधिकारियों के मुताबिक,त्योहारों के मद्देनजर पहले से ही अतिरिक्त सुरक्षा बल उपलब्ध कराया गया था। इसमें प्रांतीय सशस्त्र बल और त्वरित कार्रवाई बल के जवान भी शामिल थे। प्रशासन ने किसी भी अप्रिय स्थिति से निपटने के लिए पूरे इलाके में सुरक्षा व्यवस्था कड़ी रखी।
सहारनपुर के पुलिस उपमहानिरीक्षक अभिषेक सिंह ने मामले को लेकर कहा कि कलेक्ट्रेट परिसर के भीतर सरकारी जमीन पर एक अवैध निर्माण पाया गया था। इस संबंध में सिटी मजिस्ट्रेट की अदालत की ओर से आदेश जारी किया गया था। मस्जिद कमेटी ने इस आदेश के खिलाफ पहली अपील दायर की थी,लेकिन अपील खारिज कर दी गई और सिटी मजिस्ट्रेट के आदेश को बरकरार रखा गया। इसके बाद उसी आदेश के तहत अवैध निर्माण को हटाने की कार्रवाई की गई।
पुलिस अधिकारी ने कहा कि प्रशासन ने अपनी सभी कानूनी जिम्मेदारियाँ पूरी की हैं और पूरी कार्रवाई कानूनी प्रक्रिया के तहत की जा रही है। उन्होंने कानून-व्यवस्था को लेकर भी प्रशासन की तैयारियों की जानकारी दी। उनके मुताबिक,त्योहारों और सुरक्षा व्यवस्था को ध्यान में रखते हुए अतिरिक्त प्रांतीय सशस्त्र बल और त्वरित कार्रवाई बल उपलब्ध कराया गया है। प्रशासन का कहना है कि कार्रवाई के दौरान किसी भी तरह की स्थिति से निपटने के लिए पर्याप्त सुरक्षा व्यवस्था की गई थी।
मस्जिद के ध्वस्तीकरण को लेकर राजनीतिक विवाद भी शुरू हो गया है। कैराना की सांसद इकरा हसन को पुलिस ने नजरबंद कर दिया था। बताया गया कि वह कलेक्ट्रेट परिसर में स्थित मस्जिद के मुद्दे को लेकर सहारनपुर जाने की तैयारी कर रही थीं। उनके नजरबंद किए जाने के बाद उनके परिवार की ओर से भी प्रशासन की कार्रवाई पर सवाल उठाए गए।
इकरा हसन की माँ और पूर्व सांसद तबस्सुम हसन ने इस घटनाक्रम की आलोचना की। उन्होंने कहा कि उनका परिवार जनता की सेवा के लिए प्रतिबद्ध है। सांसद को नजरबंद किए जाने के घटनाक्रम ने भी राजनीतिक बहस को और तेज कर दिया है। विपक्षी नेताओं का आरोप है कि प्रशासन को इस तरह की कार्रवाई करते समय संबंधित पक्षों की आपत्तियों और कानूनी दावों पर भी विचार करना चाहिए।
कांग्रेस सांसद इमरान मसूद ने भी सहारनपुर में मस्जिद गिराए जाने की कार्रवाई पर सवाल उठाए। उन्होंने कहा कि मामला केवल मस्जिद का नहीं है,बल्कि देश के कानून और संविधान से जुड़ा हुआ है। उन्होंने जमीन के स्वामित्व से संबंधित रिकॉर्ड का हवाला देते हुए प्रशासन के दावे पर सवाल उठाया। इमरान मसूद के मुताबिक,प्रशासन जिस जमीन को सरकारी कलेक्ट्रेट की जमीन बता रहा है,उससे जुड़े खसरा रिकॉर्ड में जमीन अभी भी वहीद खान और याकूब खान के नाम पर दर्ज है।
इमरान मसूद ने दावा किया कि मस्जिद उस जमीन पर बनी थी,जो पहले वहीद खान और याकूब खान की जमींदारी के अंतर्गत आती थी। उन्होंने कहा कि जमीन के रिकॉर्ड को लेकर स्थिति अभी भी स्पष्ट नहीं है और इस पहलू को नजरअंदाज नहीं किया जाना चाहिए। उनके बयान के अनुसार,जमीन के स्वामित्व और मस्जिद के निर्माण से जुड़े दस्तावेजों की भी जाँच की जानी चाहिए।
कांग्रेस सांसद ने मस्जिद के वक्फ बोर्ड में पंजीकृत होने का भी दावा किया। उन्होंने आरोप लगाया कि कार्रवाई से संबंधित प्रक्रिया में वक्फ बोर्ड को पक्षकार नहीं बनाया गया। उनके अनुसार,यदि किसी धार्मिक स्थल की संपत्ति या स्थिति को लेकर विवाद है,तो उससे जुड़े सभी संबंधित पक्षों को कानूनी प्रक्रिया में शामिल किया जाना चाहिए।
इमरान मसूद ने ‘वक्फ बाय यूजर’ के प्रावधान का भी उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि वह संयुक्त संसदीय समिति के सदस्य रह चुके हैं और उनके अनुसार वक्फ बाय यूजर की अवधारणा यह स्थापित करती है कि किसी संपत्ति का लंबे समय तक धार्मिक उपयोग किस तरह महत्वपूर्ण हो सकता है। उन्होंने दावा किया कि कलेक्ट्रेट परिसर में स्थित इस मस्जिद में लगातार नमाज अदा की जाती रही है और वहाँ धार्मिक गतिविधियाँ होती रही हैं।
हालाँकि,प्रशासन की ओर से मस्जिद को अवैध निर्माण बताया गया है और ध्वस्तीकरण की कार्रवाई अदालत के आदेश के आधार पर किए जाने की बात कही गई है। प्रशासन का कहना है कि सिटी मजिस्ट्रेट की अदालत ने संबंधित मामले में आदेश दिया था और मस्जिद कमेटी की अपील खारिज होने के बाद उस आदेश को लागू किया गया। इसलिए अधिकारियों के मुताबिक,कार्रवाई किसी मनमाने फैसले के तहत नहीं,बल्कि निर्धारित कानूनी प्रक्रिया के तहत हुई है।
इस मामले में जमीन के स्वामित्व,निर्माण की वैधता और मस्जिद के धार्मिक दर्जे को लेकर अलग-अलग दावे सामने आ रहे हैं। एक ओर प्रशासन सरकारी जमीन पर अवैध निर्माण होने की बात कह रहा है,वहीं राजनीतिक विरोध करने वाले नेताओं की ओर से जमीन के पुराने राजस्व रिकॉर्ड और मस्जिद के वक्फ पंजीकरण का हवाला दिया जा रहा है। ऐसे में विवाद के सभी कानूनी पहलुओं पर आगे भी चर्चा होने की संभावना है।
सहारनपुर में ध्वस्तीकरण की कार्रवाई के दौरान प्रशासन ने कानून-व्यवस्था को सर्वोच्च प्राथमिकता दी। भारी पुलिस बल की तैनाती और अतिरिक्त सुरक्षा बलों की मौजूदगी से यह संकेत मिला कि प्रशासन किसी भी तरह के तनाव को रोकने के लिए पूरी तैयारी के साथ आगे बढ़ा। पुलिस और प्रशासन की ओर से लोगों से शांति बनाए रखने की अपील भी की गई।
मामले का राजनीतिक असर भी व्यापक हो सकता है,क्योंकि मस्जिद से जुड़े विवाद के साथ सांसद को नजरबंद किए जाने और जमीन के रिकॉर्ड को लेकर उठाए गए सवालों ने इसे केवल स्थानीय प्रशासनिक कार्रवाई तक सीमित नहीं रहने दिया है। विपक्षी नेताओं ने इसे कानून,संविधान और धार्मिक संपत्तियों से जुड़े अधिकारों के संदर्भ में उठाया है,जबकि प्रशासन ने न्यायिक आदेश के पालन को कार्रवाई का आधार बताया है।
फिलहाल सहारनपुर कलेक्ट्रेट परिसर में स्थित मस्जिद को छह बुलडोजरों की मदद से ध्वस्त किया जा चुका है। प्रशासन का कहना है कि उसने अदालत के आदेश और कानूनी प्रक्रिया के तहत कार्रवाई की है। दूसरी ओर,राजनीतिक नेताओं की ओर से जमीन के रिकॉर्ड,वक्फ पंजीकरण और धार्मिक उपयोग से जुड़े दावे सामने रखे जा रहे हैं। अब इस विवाद में आगे की कानूनी और राजनीतिक गतिविधियों पर नजर रहेगी।
