राघव चड्ढा (तस्वीर क्रेडिट@MukAn_X)

समरकंद में राघव चड्ढा ने उठाया महिलाओं के राजनीतिक अधिकारों का मुद्दा,बोले- सिर्फ वोट नहीं,शासन की शक्ति भी मिले

नई दिल्ली,10 सितंबर (युआईटीवी)- राघव चड्ढा ने उज्बेकिस्तान के समरकंद में आयोजित 12वें इंटर-पार्लियामेंटरी यूनियन सम्मेलन में महिलाओं के राजनीतिक अधिकारों और उनकी प्रभावी राजनीतिक भागीदारी का मुद्दा प्रमुखता से उठाया। सम्मेलन के एक सत्र में भारत का पक्ष रखते हुए उन्होंने कहा कि महिलाओं की लोकतांत्रिक भागीदारी केवल मतदान तक सीमित नहीं होनी चाहिए। उन्हें निर्णय लेने, नीति निर्माण और शासन चलाने की वास्तविक शक्ति भी मिलनी चाहिए। उन्होंने कहा कि किसी महिला को केवल राजनीतिक पद या सीट देना पर्याप्त नहीं है,बल्कि उस पद से जुड़े अधिकारों और निर्णय लेने की स्वतंत्रता को भी सुनिश्चित करना जरूरी है।

राघव चड्ढा ने “महिलाओं के राजनीतिक अधिकार सुनिश्चित करना” विषय पर अपने संबोधन में भारत में महिलाओं की बढ़ती राजनीतिक भागीदारी का उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि देश में लोकतांत्रिक प्रक्रिया में महिलाओं की भूमिका लगातार मजबूत हुई है और अब वे केवल मतदाता के तौर पर नहीं,बल्कि निर्वाचित प्रतिनिधि के रूप में भी महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां निभा रही हैं। उनके मुताबिक,महिलाओं की राजनीतिक भागीदारी को मजबूत बनाना लोकतंत्र को अधिक समावेशी और प्रभावी बनाने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है।

उन्होंने कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भारत महिला विकास की अवधारणा से आगे बढ़कर ‘महिला नेतृत्व वाले विकास’ की दिशा में आगे बढ़ रहा है। चड्ढा के अनुसार, महिलाओं को विकास की प्रक्रिया का लाभार्थी मात्र मानने के बजाय उन्हें विकास की दिशा तय करने और नेतृत्व करने वाली शक्ति के रूप में स्थापित किया जाना चाहिए। उन्होंने कहा कि जब महिलाएँ नीति निर्माण और शासन की प्रक्रिया में प्रभावी भूमिका निभाती हैं,तो लोकतांत्रिक व्यवस्था की पहुँच समाज के अधिक व्यापक हिस्से तक होती है।

अपने संबोधन में चड्ढा ने भारत में महिला मतदाताओं की बढ़ती भागीदारी का भी उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि देश में महिला मतदाताओं की भागीदारी रिकॉर्ड स्तर तक पहुंच चुकी है। यह बदलाव भारतीय लोकतंत्र में महिलाओं की बढ़ती राजनीतिक जागरूकता और भागीदारी को दर्शाता है। उन्होंने इसे केवल चुनावी आँकड़ा नहीं,बल्कि लोकतांत्रिक व्यवस्था में महिलाओं के बढ़ते प्रभाव का संकेत बताया।

राघव चड्ढा ने जमीनी स्तर पर महिलाओं की राजनीतिक भागीदारी को भी रेखांकित किया। उन्होंने बताया कि देश में करीब 14.5 लाख महिलाएँ निर्वाचित प्रतिनिधियों के रूप में अपनी जिम्मेदारियां निभा रही हैं। उनके अनुसार,स्थानीय स्तर पर महिलाओं की इतनी बड़ी संख्या में राजनीतिक भागीदारी भारतीय लोकतंत्र की महत्वपूर्ण उपलब्धियों में से एक है। पंचायतों और स्थानीय निकायों में महिलाओं की मौजूदगी ने उन्हें सीधे तौर पर सार्वजनिक निर्णय लेने की प्रक्रिया से जोड़ा है और इससे राजनीतिक नेतृत्व के लिए महिलाओं के लिए नए अवसर भी तैयार हुए हैं।

उन्होंने संसद और विधानसभाओं में महिलाओं का प्रतिनिधित्व बढ़ाने के लिए किए जा रहे संवैधानिक प्रयासों का भी उल्लेख किया। चड्ढा ने कहा कि भारत में विधायिकाओं में महिलाओं के लिए एक-तिहाई प्रतिनिधित्व सुनिश्चित करने की संवैधानिक दिशा तय की गई है। उन्होंने इसे राजनीतिक संस्थाओं में महिलाओं की हिस्सेदारी बढ़ाने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम बताया। हालाँकि,उन्होंने जोर दिया कि प्रतिनिधित्व बढ़ाना अपने आप में अंतिम लक्ष्य नहीं होना चाहिए। इसके साथ महिलाओं को वास्तविक निर्णय लेने की शक्ति और स्वतंत्र भूमिका भी मिलनी चाहिए।

चड्ढा ने कहा कि महिलाओं को केवल राजनीतिक प्रक्रिया में शामिल करना पर्याप्त नहीं है। यदि किसी महिला को चुनाव जीतकर या आरक्षित सीट के माध्यम से राजनीतिक पद मिलता है,लेकिन महत्वपूर्ण निर्णय लेने की शक्ति किसी अन्य व्यक्ति के पास रहती है, तो ऐसी भागीदारी का उद्देश्य पूरी तरह हासिल नहीं होता। उन्होंने कहा कि महिलाओं को पद के साथ अधिकार,जिम्मेदारी और निर्णय लेने की स्वतंत्रता भी मिलनी चाहिए।

उन्होंने सम्मेलन में भारत का संदेश स्पष्ट करते हुए कहा कि महिलाओं से केवल वोट देने के लिए नहीं कहा जाना चाहिए,बल्कि उन्हें शासन करने में सक्षम बनाया जाना चाहिए। उनके अनुसार,राजनीतिक प्रतिनिधित्व का वास्तविक अर्थ तभी पूरा होगा जब महिलाएं अपने पद का इस्तेमाल स्वतंत्र रूप से निर्णय लेने और जनता के हित में नीतियाँ बनाने के लिए कर सकें। उन्होंने महिला राजनीतिक नेतृत्व को लोकतंत्र की गुणवत्ता और शासन की प्रभावशीलता से जोड़ते हुए कहा कि महिलाओं की भागीदारी को केवल संख्या के आधार पर नहीं देखा जाना चाहिए।

राज्यसभा सांसद ने महिला सशक्तीकरण को भाषणों और नारों से आगे ले जाने की जरूरत पर भी जोर दिया। उन्होंने कहा कि महिलाओं के राजनीतिक अधिकारों को मजबूत करने के लिए ऐसी संस्थागत व्यवस्था तैयार करनी होगी,जो उनकी भागीदारी को स्थायी आधार दे। महिलाओं के लिए राजनीतिक अवसर पैदा करने के साथ-साथ उन्हें नेतृत्व के लिए आवश्यक अधिकार और संसाधन उपलब्ध कराना भी जरूरी है। उनके मुताबिक, केवल चुनावी प्रतिनिधित्व बढ़ाने से राजनीतिक सशक्तीकरण पूरा नहीं होगा,बल्कि महिलाओं को नीतिगत फैसलों में प्रभावी भूमिका देने की आवश्यकता है।

उन्होंने कहा कि लोकतांत्रिक संस्थाओं में महिलाओं की संख्या बढ़ना सकारात्मक बदलाव है,लेकिन इसके साथ उनकी भूमिका और प्रभाव भी बढ़ना चाहिए। महिलाओं को कानून बनाने,नीतियाँ तय करने,प्रशासनिक प्राथमिकताएँ निर्धारित करने और सार्वजनिक संसाधनों के इस्तेमाल से जुड़े फैसलों में सक्रिय भूमिका मिलनी चाहिए। इससे राजनीतिक व्यवस्था में महिलाओं की भागीदारी अधिक सार्थक होगी और उनके नेतृत्व की क्षमता भी मजबूत होगी।

समरकंद में आयोजित इस सम्मेलन में विभिन्न देशों के प्रतिनिधि राजनीतिक और संसदीय व्यवस्था से जुड़े महत्वपूर्ण मुद्दों पर चर्चा कर रहे हैं। ऐसे अंतर्राष्ट्रीय मंच पर भारत की ओर से महिलाओं के राजनीतिक अधिकारों और नेतृत्व का मुद्दा उठाते हुए चड्ढा ने इसे लोकतांत्रिक विकास का महत्वपूर्ण हिस्सा बताया। उन्होंने कहा कि दुनिया के लोकतंत्रों के सामने यह चुनौती है कि वे महिलाओं को राजनीतिक संस्थाओं में केवल प्रतिनिधित्व देने तक सीमित न रखें,बल्कि उन्हें प्रभावी नेतृत्व का अवसर भी दें।

चड्ढा के संबोधन का प्रमुख संदेश यही रहा कि महिलाओं की राजनीतिक भागीदारी को मतदान और चुनावी प्रतिनिधित्व से आगे बढ़ाने की जरूरत है। उनके अनुसार,लोकतंत्र तब अधिक मजबूत होगा जब महिलाएं मतदाता होने के साथ-साथ नीति निर्माता, निर्वाचित प्रतिनिधि और शासन में निर्णायक भूमिका निभाने वाली नेता भी बनेंगी। उन्होंने कहा कि महिलाओं को राजनीतिक अधिकार देने का अर्थ केवल उन्हें सीट उपलब्ध कराना नहीं, बल्कि उस सीट से जुड़े अधिकारों का वास्तविक इस्तेमाल करने की क्षमता और स्वतंत्रता सुनिश्चित करना भी है।

उन्होंने इस बात पर भी जोर दिया कि महिलाओं की राजनीतिक भागीदारी को स्थायी और मजबूत बनाने के लिए राजनीतिक दलों,विधायिकाओं और लोकतांत्रिक संस्थाओं को मिलकर काम करना होगा। महिलाओं को नेतृत्व के लिए तैयार करने, उन्हें निर्णय लेने का अवसर देने और राजनीतिक प्रक्रिया में उनकी आवाज को प्रभावी बनाने के लिए संस्थागत बदलाव जरूरी हैं।

कुल मिलाकर,समरकंद में राघव चड्ढा ने महिलाओं के राजनीतिक अधिकारों के मुद्दे को केवल प्रतिनिधित्व की संख्या तक सीमित न रखते हुए वास्तविक सत्ता और निर्णय लेने की क्षमता से जोड़ा। उन्होंने भारत में महिला मतदाताओं की बढ़ती भागीदारी,बड़ी संख्या में निर्वाचित महिला प्रतिनिधियों और विधायिकाओं में महिलाओं के प्रतिनिधित्व को बढ़ाने की संवैधानिक दिशा का उल्लेख करते हुए कहा कि अगला लक्ष्य महिलाओं को शासन और नीति निर्माण में प्रभावी नेतृत्व देना होना चाहिए। उनका संदेश था कि महिलाओं को लोकतंत्र में केवल वोट देने वाली शक्ति के रूप में नहीं,बल्कि शासन चलाने और भविष्य की दिशा तय करने वाली निर्णायक शक्ति के रूप में देखा जाना चाहिए।