वॉशिंगटन,9 जुलाई (युआईटीवी)- अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ते तनाव के बीच अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने एक बार फिर तेहरान के खिलाफ सख्त रुख अपनाने के संकेत दिए हैं। उन्होंने दावा किया कि हाल के अमेरिकी जवाबी हमलों के बाद ईरान बातचीत के लिए तैयार दिखाई दे रहा है,लेकिन साथ ही यह भी सवाल उठाया कि क्या तेहरान किसी भी संभावित समझौते का ईमानदारी से पालन करेगा। राष्ट्रपति ट्रंप ने स्पष्ट किया कि अमेरिका की सर्वोच्च प्राथमिकता ईरान को परमाणु हथियार हासिल करने से रोकना है और जब तक यह लक्ष्य पूरा नहीं हो जाता,तब तक वाशिंगटन आवश्यक सैन्य, कूटनीतिक और आर्थिक कदम उठाता रहेगा।
तुर्किए में आयोजित नाटो शिखर सम्मेलन में भाग लेने के बाद वाशिंगटन लौटते समय एयर फोर्स वन में पत्रकारों से बातचीत करते हुए राष्ट्रपति ट्रंप ने हाल के घटनाक्रम पर विस्तार से अपनी बात रखी। उन्होंने कहा कि ईरान से जुड़े हालिया घटनाक्रमों के बाद अमेरिका ने बेहद कड़ा जवाब दिया है और यह संदेश स्पष्ट कर दिया है कि किसी भी हमले का जवाब पहले से कहीं अधिक ताकत के साथ दिया जाएगा। ट्रंप ने कहा कि यदि अमेरिका पर हमला किया जाएगा,तो उसका जवाब कई गुना अधिक प्रभावशाली होगा और यही रणनीति हालिया घटनाओं में भी अपनाई गई।
राष्ट्रपति ट्रंप ने कहा कि अमेरिका ने हाल के हमलों के बाद केवल जवाब नहीं दिया, बल्कि ऐसा जवाब दिया जिसने यह स्पष्ट कर दिया कि वाशिंगटन किसी भी प्रकार की आक्रामक कार्रवाई को बर्दाश्त नहीं करेगा। उन्होंने दावा किया कि अमेरिका ने ईरान समर्थित गतिविधियों के खिलाफ पहले से कहीं अधिक प्रभावी सैन्य कार्रवाई की है। उनके अनुसार यदि कोई अमेरिका या उसके हितों को निशाना बनाएगा,तो उसे उसके मुकाबले कई गुना अधिक ताकतवर जवाब मिलेगा।
उन्होंने बातचीत के दौरान कहा कि हाल ही में वाणिज्यिक जहाजों पर हुए हमलों के बाद अमेरिका ने निर्णायक कार्रवाई की। ट्रंप के अनुसार शुरुआत में ऐसा माना गया था कि दो जहाजों को निशाना बनाया गया,लेकिन बाद में जानकारी मिली कि कुल तीन जहाजों पर हमला किया गया था। उन्होंने कहा कि अमेरिका ने इन घटनाओं का जवाब बेहद सख्ती से दिया और यह कार्रवाई केवल जवाबी कदम नहीं थी,बल्कि भविष्य के लिए एक स्पष्ट चेतावनी भी थी।
राष्ट्रपति ट्रंप ने कहा कि अमेरिका की नीति अब पूरी तरह स्पष्ट है। यदि भविष्य में भी अमेरिका या उसके सहयोगियों के खिलाफ किसी प्रकार की सैन्य कार्रवाई होती है,तो उसका जवाब कहीं अधिक व्यापक और प्रभावशाली होगा। उन्होंने इस दौरान यह भी कहा कि हाल के जवाबी हमलों के बाद ईरान बातचीत करने की इच्छा जता रहा है,लेकिन उनके मन में इस बात को लेकर गंभीर संदेह है कि क्या ईरानी नेतृत्व किसी समझौते का पूरी ईमानदारी से पालन करेगा।
जब पत्रकारों ने उनसे पूछा कि यदि ईरान वास्तव में बातचीत चाहता है,तो फिर उसने वाणिज्यिक जहाजों पर हमले क्यों किए,तो राष्ट्रपति ट्रंप ने कहा कि वर्तमान परिस्थितियाँ सामान्य नहीं हैं। उनके अनुसार क्षेत्र में हालात इतने अस्थिर हो चुके हैं कि कई घटनाएँ नियंत्रण से बाहर होती दिखाई दे रही हैं। हालाँकि,उन्होंने यह भी कहा कि उपलब्ध संकेत बताते हैं कि ईरान अब किसी प्रकार के समझौते के लिए उत्सुक है और बढ़ते दबाव के कारण बातचीत की राह तलाश रहा है।
राष्ट्रपति ट्रंप ने इस पूरे विवाद का मूल कारण ईरान के परमाणु कार्यक्रम को बताया। उन्होंने कहा कि अमेरिका का उद्देश्य किसी देश पर हमला करना नहीं,बल्कि यह सुनिश्चित करना है कि ईरान कभी भी परमाणु हथियार विकसित न कर सके। उनके अनुसार यदि ईरान परमाणु हथियार हासिल करता है तो इससे केवल मध्य पूर्व ही नहीं,बल्कि पूरी दुनिया की सुरक्षा प्रभावित होगी। उन्होंने कहा कि अमेरिका की कार्रवाई इसी उद्देश्य को ध्यान में रखकर की जा रही है और यह केवल अमेरिका ही नहीं,बल्कि अंतर्राष्ट्रीय समुदाय के हित में भी है।
उन्होंने कहा कि ईरान के परमाणु कार्यक्रम को रोकना पूरी दुनिया की साझा जिम्मेदारी होनी चाहिए। ट्रंप के अनुसार यह केवल अमेरिकी सुरक्षा का मामला नहीं है,बल्कि वैश्विक शांति और स्थिरता से जुड़ा मुद्दा है। उन्होंने कहा कि यदि ईरान को परमाणु हथियार विकसित करने की अनुमति मिलती है,तो उसके गंभीर परिणाम सामने आ सकते हैं।
यात्रा के दौरान राष्ट्रपति ट्रंप से यह भी पूछा गया कि तुर्किए से रवाना होने से पहले अंतिम समय में उनके विमान में किए गए बदलाव का संबंध किसी सुरक्षा खतरे से था या नहीं। इस पर उन्होंने किसी भी विशेष सुरक्षा चिंता से इनकार किया। उन्होंने कहा कि विमान में बदलाव केवल इसलिए किया गया था,ताकि एयर बेस पर मौजूद लोग विमान को देख सकें और इसका किसी विशेष खतरे से कोई संबंध नहीं था।
हालाँकि,जब उनसे यह पूछा गया कि क्या ईरान की ओर से एयर फोर्स वन या उनकी सुरक्षा को लेकर कोई विश्वसनीय खतरा मौजूद था,तो ट्रंप ने हल्के अंदाज में जवाब दिया कि वह हमेशा ईरान की सूची में पहले स्थान पर रहते हैं। उनके इस बयान ने यह संकेत जरूर दिया कि वह स्वयं को ईरान के प्रमुख राजनीतिक विरोधियों में मानते हैं,लेकिन उन्होंने किसी विशेष खुफिया जानकारी या तत्काल खतरे का खुलासा नहीं किया।
राष्ट्रपति ट्रंप ने अपने संबोधन में तुर्किए में संपन्न नाटो शिखर सम्मेलन का भी उल्लेख किया और उसे अत्यंत सफल बताया। उन्होंने कहा कि पिछले कुछ वर्षों में रक्षा खर्च को लेकर अमेरिका और उसके सहयोगी देशों के बीच मतभेद देखने को मिले थे,लेकिन इस बार सदस्य देशों ने अधिक एकजुटता का परिचय दिया। उनके अनुसार सम्मेलन के दौरान कई महत्वपूर्ण मुद्दों पर सहमति बनी और अमेरिका के साथ पहले जो असंतुलन था,उसे दूर करने की दिशा में सकारात्मक प्रगति हुई।
उन्होंने कहा कि नाटो के सहयोगी अब यह समझने लगे हैं कि अमेरिका पर लंबे समय तक रक्षा संबंधी असमान जिम्मेदारियाँ रही हैं। ट्रंप के अनुसार इस बार की बैठक में इन मुद्दों पर खुलकर चर्चा हुई और कई मामलों में समाधान भी निकला। उन्होंने विश्वास जताया कि भविष्य में नाटो देशों के बीच सहयोग और अधिक मजबूत होगा।
यूरोप में अमेरिकी सैनिकों की तैनाती को लेकर पूछे गए एक प्रश्न के उत्तर में राष्ट्रपति ट्रंप ने कहा कि इस संबंध में भविष्य के फैसले कई अंतर्राष्ट्रीय घटनाक्रमों पर निर्भर करेंगे। उन्होंने विशेष रूप से ग्रीनलैंड और ईरान से जुड़े घटनाक्रमों का उल्लेख करते हुए कहा कि बदलती वैश्विक परिस्थितियों के अनुसार अमेरिका अपनी सैन्य रणनीति की समीक्षा करता रहेगा। उन्होंने संकेत दिया कि सुरक्षा चुनौतियों को ध्यान में रखते हुए सैनिकों की तैनाती से जुड़े निर्णय समय-समय पर बदले जा सकते हैं।
राष्ट्रपति ट्रंप ने यह भी दावा किया कि जिन सहयोगी देशों ने पहले अमेरिका की कुछ कार्रवाइयों में सहयोग देने से परहेज किया था,वे अब ईरान के मुद्दे पर अधिक सक्रिय भूमिका निभाने के इच्छुक हैं। उन्होंने कहा कि कई देश ईरान के खिलाफ अमेरिका का साथ देना चाहते हैं और सहयोग की पेशकश भी कर रहे हैं। हालाँकि,उन्होंने यह भी कहा कि फिलहाल अमेरिका अपनी रणनीति को लागू करने में सक्षम है और उसे अतिरिक्त सहायता की तत्काल आवश्यकता नहीं है।
इस दौरान राष्ट्रपति ट्रंप ने मध्य पूर्व के अन्य मुद्दों पर भी अपनी राय रखी। उन्होंने सीरिया की स्थिति का उल्लेख करते हुए वहाँ के राष्ट्रपति अहमद अल-शरा की सराहना की और कहा कि उन्होंने अपने देश में अच्छा काम किया है। ट्रंप ने संकेत दिया कि सीरिया में कुछ सकारात्मक बदलाव देखने को मिल रहे हैं और वहाँ की नई नेतृत्व व्यवस्था कुछ महत्वपूर्ण कदम उठा रही है।
पत्रकारों ने जब उनसे पूछा कि क्या सीरिया के राष्ट्रपति अहमद अल-शरा ने लेबनान में हिज्बुल्लाह को लेकर कोई विशेष आश्वासन दिया है,तो ट्रंप ने इसका उत्तर सकारात्मक रूप में दिया। हालाँकि,उन्होंने इस विषय में अधिक जानकारी देने से इनकार कर दिया और कहा कि वह इस समय उस विषय पर विस्तृत टिप्पणी नहीं करना चाहते।
राष्ट्रपति ट्रंप ने यूक्रेन के राष्ट्रपति वोलोदिमिर जेलेंस्की के साथ अपनी मुलाकात का भी उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि जेलेंस्की के साथ उनकी बातचीत सकारात्मक रही और बैठक का माहौल अच्छा था। हालाँकि,उन्होंने इस मुलाकात के विषय में भी अधिक विवरण साझा नहीं किया।
अमेरिका और ईरान के बीच हाल के सप्ताहों में तनाव लगातार बढ़ा है। वाणिज्यिक जहाजों पर हमलों,सैन्य जवाबी कार्रवाइयों और एक-दूसरे पर लगाए जा रहे आरोपों ने क्षेत्रीय सुरक्षा को लेकर चिंताएँ बढ़ा दी हैं। अमेरिका लगातार यह कहता रहा है कि उसका उद्देश्य ईरान को परमाणु हथियार विकसित करने से रोकना है,जबकि ईरान अपनी परमाणु गतिविधियों को शांतिपूर्ण बताता रहा है। दोनों देशों के बीच लंबे समय से चले आ रहे अविश्वास ने स्थिति को और अधिक जटिल बना दिया है।
ट्रंप प्रशासन का कहना है कि वह केवल सैन्य कार्रवाई पर निर्भर नहीं है,बल्कि कूटनीतिक और आर्थिक दबाव का भी उपयोग कर रहा है,ताकि ईरान अपने व्यवहार में बदलाव लाए। प्रशासन का मानना है कि प्रतिबंध,अंतर्राष्ट्रीय दबाव और सैन्य तैयारियों का संयुक्त प्रभाव तेहरान को बातचीत की दिशा में आगे बढ़ने के लिए मजबूर कर सकता है।
हालाँकि,अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर कई देश दोनों पक्षों से संयम बरतने और कूटनीतिक समाधान तलाशने की अपील कर रहे हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि तनाव इसी प्रकार बढ़ता रहा तो इसका असर केवल मध्य पूर्व तक सीमित नहीं रहेगा,बल्कि वैश्विक व्यापार,ऊर्जा आपूर्ति और अंतर्राष्ट्रीय सुरक्षा पर भी पड़ सकता है। ऐसे में आने वाले दिनों में अमेरिका और ईरान के बीच होने वाली संभावित बातचीत,सैन्य गतिविधियाँ और कूटनीतिक प्रयास पूरी दुनिया की नजरों में बने रहेंगे। फिलहाल राष्ट्रपति ट्रंप के ताजा बयान ने यह स्पष्ट कर दिया है कि अमेरिका ईरान के खिलाफ अपनी सख्त नीति में किसी तरह की ढील देने के पक्ष में नहीं है और परमाणु हथियारों के मुद्दे पर वह आगे भी कठोर रुख अपनाए रखेगा।
