डीआर कांगो में इबोला का कहर जा (तस्वीर क्रेडिट@rashtra_press)

कांगो में इबोला का कहर गहराया, मृतकों की संख्या 600 पहुँचीं; स्वास्थ्य व्यवस्था पर बढ़ा भारी दबाव

किंशासा,9 जुलाई (युआईटीवी)- लोकतांत्रिक गणराज्य कांगो में इबोला वायरस का प्रकोप लगातार गंभीर रूप लेता जा रहा है। देश के स्वास्थ्य अधिकारियों द्वारा जारी ताजा आँकड़ों के अनुसार,इस घातक बीमारी से अब तक 600 लोगों की मौत हो चुकी है, जबकि संक्रमण के 1,759 मामलों की पुष्टि की गई है। तेजी से बढ़ते संक्रमण ने स्वास्थ्य व्यवस्था पर भारी दबाव पैदा कर दिया है और अस्पतालों में मरीजों की संख्या लगातार बढ़ रही है। अधिकारियों का कहना है कि यदि संक्रमण की रफ्तार को समय रहते नियंत्रित नहीं किया गया,तो स्थिति और अधिक गंभीर हो सकती है।

बुधवार देर रात जारी स्वास्थ्य विभाग के अपडेट के अनुसार,इस समय लगभग 750 मरीज आइसोलेशन केंद्रों या अस्पतालों में भर्ती हैं। अस्पतालों में उपलब्ध बिस्तरों में से लगभग 94 प्रतिशत भर चुके हैं,जिससे नए मरीजों के इलाज की व्यवस्था करना चुनौतीपूर्ण होता जा रहा है। स्वास्थ्य विशेषज्ञों का कहना है कि चिकित्सा सुविधाओं पर बढ़ते दबाव के कारण संक्रमित मरीजों को समय पर उपचार उपलब्ध कराना मुश्किल हो रहा है।

यह प्रकोप बुंडीबुग्यो प्रजाति के इबोला वायरस के कारण फैल रहा है,जिसे इस वर्ष 15 मई को आधिकारिक रूप से घोषित किया गया था। यह लोकतांत्रिक गणराज्य कांगो में दर्ज किया गया इबोला का 17वां प्रकोप है। इस बार संक्रमण ने देश के तीन प्रमुख प्रांतों इतुरी,नॉर्थ किवु और साउथ किवु के 37 स्वास्थ्य क्षेत्रों को अपनी चपेट में ले लिया है। इन इलाकों में लगातार नए मामले सामने आने से स्वास्थ्य अधिकारियों की चिंता बढ़ गई है।

समाचार एजेंसी शिन्हुआ के अनुसार,इस प्रकोप पर नियंत्रण पाने में स्वास्थ्य विभाग को कई गंभीर चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है। सबसे बड़ी समस्या यह है कि कई स्थानीय समुदाय पोस्टमार्टम के लिए सैंपल लेने का विरोध कर रहे हैं। स्वास्थ्य अधिकारियों का कहना है कि संक्रमण की सही पहचान और उसके प्रसार को रोकने के लिए मृतकों के नमूनों की जाँच बेहद आवश्यक होती है,लेकिन सामाजिक और सांस्कृतिक कारणों से कई परिवार इसके लिए तैयार नहीं हो रहे हैं। इससे संक्रमण की वास्तविक स्थिति का आकलन करना कठिन हो रहा है।

इसके अलावा इलाज की सीमित क्षमता भी बड़ी चुनौती बनी हुई है। अस्पतालों में बिस्तरों और चिकित्सा संसाधनों की कमी के कारण कई मरीजों को समय पर उपचार नहीं मिल पा रहा है। स्वास्थ्य अधिकारियों ने यह भी स्वीकार किया है कि संक्रमित लोगों के संपर्क में आए व्यक्तियों की पहचान और निगरानी यानी कॉन्टैक्ट ट्रेसिंग का काम पूरी तरह प्रभावी नहीं हो पा रहा है। विशेषज्ञों के अनुसार यदि संक्रमित व्यक्ति के संपर्क में आए लोगों की समय रहते पहचान नहीं की जाती,तो संक्रमण तेजी से फैल सकता है।

कांगो में सुरक्षा स्थिति भी इस स्वास्थ्य संकट को और जटिल बना रही है। कई प्रभावित क्षेत्र हथियारबंद समूहों की गतिविधियों से प्रभावित हैं,जिसके कारण स्वास्थ्य कर्मियों की पहुँच सीमित हो गई है। कई बार चिकित्सा दलों को सुरक्षा कारणों से प्रभावित गाँवों तक पहुँचने में कठिनाई होती है। इसके अलावा आवश्यक दवाओं,चिकित्सा उपकरणों और अन्य स्वास्थ्य सामग्री की आपूर्ति भी प्रभावित हो रही है। यही कारण है कि संक्रमण को नियंत्रित करने के प्रयास अपेक्षित गति से आगे नहीं बढ़ पा रहे हैं।

लोकतांत्रिक गणराज्य कांगो ने मई के मध्य में इस प्रकोप की आधिकारिक घोषणा की थी। तब से स्वास्थ्य मंत्रालय और अंतर्राष्ट्रीय स्वास्थ्य संगठनों ने मिलकर संक्रमण को रोकने के लिए व्यापक अभियान शुरू किया है। हालाँकि,अधिकारियों का कहना है कि असुरक्षा,लोगों का लगातार एक स्थान से दूसरे स्थान पर जाना,स्वास्थ्य सुविधाओं पर बढ़ता दबाव और अधूरी कॉन्टैक्ट ट्रेसिंग जैसी समस्याओं के कारण स्थिति को पूरी तरह नियंत्रित करना बेहद कठिन साबित हो रहा है।

इबोला वायरस दुनिया की सबसे घातक संक्रामक बीमारियों में से एक माना जाता है। यह एक दुर्लभ लेकिन अत्यंत गंभीर बीमारी है,जिसकी मृत्यु दर काफी अधिक हो सकती है। वैज्ञानिकों के अनुसार यह वायरस मुख्य रूप से जंगली जानवरों,विशेषकर फ्रूट बैट यानी फल खाने वाले चमगादड़ों से इंसानों में फैलता है। इसके बाद संक्रमित व्यक्ति के शरीर के तरल पदार्थों जैसे रक्त,लार,पसीना,उल्टी या अन्य शारीरिक स्राव के सीधे संपर्क में आने से यह एक व्यक्ति से दूसरे व्यक्ति तक फैल जाता है।

इस बीमारी के शुरुआती लक्षण सामान्य वायरल संक्रमण जैसे दिखाई देते हैं,जिससे शुरुआत में इसकी पहचान करना कठिन हो सकता है। वायरस के संपर्क में आने के दो से इक्कीस दिनों के भीतर संक्रमित व्यक्ति में अचानक तेज बुखार,अत्यधिक थकान, मांसपेशियों में दर्द,तेज सिरदर्द और गले में खराश जैसे लक्षण दिखाई देने लगते हैं। बीमारी बढ़ने पर मरीज को उल्टी,दस्त और पेट दर्द की शिकायत हो सकती है। गंभीर मामलों में शरीर के विभिन्न अंग प्रभावित होने लगते हैं और बिना किसी स्पष्ट कारण के आंतरिक या बाहरी रक्तस्राव भी हो सकता है। कई मरीजों के शरीर पर गहरे निशान दिखाई देने लगते हैं और समय पर इलाज न मिलने पर यह संक्रमण जानलेवा साबित हो सकता है।

विशेषज्ञों का कहना है कि इस बार फैल रही बुंडीबुग्यो प्रजाति के इबोला वायरस के लिए फिलहाल कोई स्वीकृत वैक्सीन या विशेष उपचार उपलब्ध नहीं है। हालाँकि,वैज्ञानिक संभावित वैक्सीन और नई दवाओं पर लगातार शोध कर रहे हैं। उपचार के दौरान मरीज को मुख्य रूप से सहायक चिकित्सा दी जाती है,जिसमें शरीर में पानी और इलेक्ट्रोलाइट का संतुलन बनाए रखना,संक्रमण को नियंत्रित करना और अंगों की कार्यक्षमता बनाए रखने का प्रयास किया जाता है।

यह पहली बार नहीं है,जब कांगो इबोला जैसी गंभीर महामारी का सामना कर रहा है। वर्ष 2018 में भी लोकतांत्रिक गणराज्य कांगो और युगांडा में इबोला का बड़ा प्रकोप सामने आया था। उस समय भी स्वास्थ्य एजेंसियों को संक्रमण पर नियंत्रण पाने के लिए लंबे समय तक संघर्ष करना पड़ा था। वर्तमान प्रकोप को और अधिक चुनौतीपूर्ण इसलिए माना जा रहा है क्योंकि यह ऐसे क्षेत्रों में फैल रहा है,जहाँ पहले से मानवीय संकट,सुरक्षा संबंधी समस्याएँ और स्वास्थ्य सुविधाओं की कमी मौजूद है।

विश्व स्वास्थ्य संगठन ने इस प्रकोप को अंतर्राष्ट्रीय चिंता का सार्वजनिक स्वास्थ्य आपातकाल घोषित किया है। संगठन का मानना है कि यदि संक्रमण को प्रभावी ढंग से नियंत्रित नहीं किया गया,तो इसके पड़ोसी देशों तक फैलने का खतरा बना रहेगा। संगठन लगातार स्थानीय प्रशासन और अंतरराष्ट्रीय साझेदारों के साथ मिलकर निगरानी,उपचार, जागरूकता अभियान और चिकित्सा सहायता उपलब्ध कराने के प्रयास कर रहा है।

स्वास्थ्य विशेषज्ञों का कहना है कि इबोला जैसी घातक बीमारी से बचाव के लिए समय पर पहचान,संक्रमित मरीजों को तुरंत अलग रखना,उनके संपर्क में आए लोगों की निगरानी और समुदाय के बीच जागरूकता बढ़ाना सबसे प्रभावी उपाय हैं। फिलहाल कांगो में स्वास्थ्य विभाग,अंतर्राष्ट्रीय संस्थाएँ और राहत एजेंसियाँ मिलकर संक्रमण की श्रृंखला को तोड़ने की कोशिश कर रही हैं,लेकिन बढ़ते मामलों और सीमित संसाधनों के बीच यह लड़ाई अभी भी बेहद कठिन बनी हुई है।