नई दिल्ली,4 जुलाई (युआईटीवी)- सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर अवैध और संवेदनशील सामग्री को लेकर केंद्र सरकार ने एक बार फिर सख्त रुख अपनाया है। इंस्टाग्राम पर कथित तौर पर बाल यौन शोषण को बढ़ावा देने वाले विज्ञापनों के सामने आने के बाद सरकार ने मामले को गंभीरता से लेते हुए कार्रवाई शुरू कर दी है। रिपोर्ट्स के अनुसार, केंद्रीय इलेक्ट्रॉनिक्स एवं सूचना प्रौद्योगिकी मंत्री अश्विनी वैष्णव ने इलेक्ट्रॉनिक्स एवं सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय (एमईआईटीवाई) को निर्देश दिया है कि वह मेटा के अधिकारियों को तलब कर इस मामले में विस्तृत स्पष्टीकरण मांगे। सरकार यह जानना चाहती है कि सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर इस प्रकार के कथित विज्ञापन कैसे दिखाई दिए और भविष्य में ऐसी घटनाओं को रोकने के लिए कंपनी ने क्या सुरक्षा व्यवस्था की है।
सूत्रों के मुताबिक,मंत्रालय मेटा से कई महत्वपूर्ण सवाल पूछने की तैयारी कर रहा है। सरकार यह स्पष्ट करना चाहती है कि इंस्टाग्राम जैसे व्यापक उपयोग वाले मंच पर कथित तौर पर बाल यौन शोषण से जुड़े विज्ञापन कैसे प्रकाशित हुए और उन्हें समय रहते रोका क्यों नहीं जा सका। मंत्रालय यह भी जानना चाहता है कि कंपनी की कंटेंट मॉडरेशन प्रणाली किस प्रकार काम करती है और ऐसे संवेदनशील तथा अवैध कंटेंट की पहचान करने के लिए कौन-सी तकनीकी और मानवीय प्रक्रियाएँ अपनाई जाती हैं।
सरकार का मानना है कि सोशल मीडिया कंपनियों की जिम्मेदारी केवल उपयोगकर्ताओं को मंच उपलब्ध कराने तक सीमित नहीं है,बल्कि यह सुनिश्चित करना भी उनकी जिम्मेदारी है कि उनके प्लेटफॉर्म का दुरुपयोग किसी भी प्रकार की गैरकानूनी गतिविधियों,विशेषकर बच्चों के शोषण से जुड़े मामलों के लिए न हो। यही कारण है कि मंत्रालय अब मेटा से उसकी विज्ञापन समीक्षा प्रणाली,कंटेंट फिल्टरिंग तकनीक और अवैध सामग्री के खिलाफ उठाए जाने वाले कदमों की विस्तृत जानकारी मांगने की तैयारी में है।
सूत्रों का कहना है कि मंत्रालय इस बात का भी जवाब चाहता है कि यदि किसी प्लेटफॉर्म पर बाल यौन शोषण से जुड़ा कंटेंट या विज्ञापन सामने आता है,तो उसे हटाने की प्रक्रिया कितनी तेज होती है। साथ ही यह भी पूछा जाएगा कि ऐसे मामलों में कंपनी संबंधित एजेंसियों के साथ किस प्रकार समन्वय स्थापित करती है और दोषियों के खिलाफ कार्रवाई में किस तरह सहयोग करती है। सरकार यह सुनिश्चित करना चाहती है कि भविष्य में इस तरह की घटनाओं की पुनरावृत्ति न हो और सोशल मीडिया मंचों पर बच्चों की सुरक्षा सर्वोच्च प्राथमिकता बनी रहे।
मामले की गंभीरता को देखते हुए मंत्रालय मेटा की संपूर्ण कंटेंट मॉडरेशन व्यवस्था की भी समीक्षा कर सकता है। अधिकारियों के अनुसार,कंपनी से यह जानकारी मांगी जा सकती है कि कृत्रिम बुद्धिमत्ता आधारित प्रणालियों,स्वचालित निगरानी तकनीकों और मानव मॉडरेटरों के माध्यम से आपत्तिजनक सामग्री की पहचान कैसे की जाती है। इसके अलावा यह भी पूछा जा सकता है कि विज्ञापन प्रकाशित होने से पहले उनकी जाँच किस स्तर पर की जाती है और यदि कोई विज्ञापन नियमों का उल्लंघन करता पाया जाता है,तो उसके खिलाफ क्या कार्रवाई की जाती है।
हालाँकि,खबर लिखे जाने तक मेटा की ओर से इस पूरे मामले पर कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई थी। कंपनी की चुप्पी के बीच यह मामला और अधिक चर्चा का विषय बन गया है। माना जा रहा है कि मंत्रालय के समक्ष पेश होने के बाद कंपनी को अपनी नीतियों और सुरक्षा उपायों के बारे में विस्तृत जानकारी देनी होगी।
भारत सरकार पिछले कुछ वर्षों से डिजिटल प्लेटफॉर्म पर उपयोगकर्ताओं की सुरक्षा और जवाबदेही सुनिश्चित करने के लिए लगातार सख्त रुख अपनाती रही है। विशेष रूप से बच्चों से जुड़े अपराधों,ऑनलाइन धोखाधड़ी,फर्जी सूचनाओं और आपत्तिजनक सामग्री के मामलों में सरकार बार-बार सोशल मीडिया कंपनियों को अपनी जिम्मेदारियों का पालन करने की सलाह देती रही है। सूचना प्रौद्योगिकी नियमों के तहत भी सोशल मीडिया कंपनियों पर यह दायित्व है कि वे अवैध सामग्री के खिलाफ समय पर कार्रवाई करें और कानून प्रवर्तन एजेंसियों के साथ सहयोग करें।
यह घटनाक्रम ऐसे समय सामने आया है,जब हाल ही में केंद्र सरकार और मेटा के स्वामित्व वाले मैसेजिंग प्लेटफॉर्म व्हाट्सऐप के बीच नए यूजरनेम फीचर को लेकर भी चर्चा हुई थी। सरकार ने फिलहाल इस फीचर के रोलआउट पर रोक लगा दी थी और उससे जुड़े संभावित सुरक्षा जोखिमों पर स्पष्टीकरण माँगा था। इसके जवाब में व्हाट्सऐप ने स्पष्ट किया कि नया यूजरनेम फीचर पूरी तरह वैकल्पिक होगा और किसी भी उपयोगकर्ता के लिए इसे अपनाना अनिवार्य नहीं रहेगा।
व्हाट्सऐप ने यह भी कहा कि इस फीचर को लागू करने से पहले पहचान की चोरी, ऑनलाइन धोखाधड़ी और अनचाहे संपर्क जैसी समस्याओं से बचाव के लिए कई अतिरिक्त सुरक्षा उपाय शामिल किए गए हैं। कंपनी के अनुसार,उपयोगकर्ताओं की गोपनीयता और सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए यूजरनेम प्रणाली तैयार की गई है,ताकि व्यक्तिगत मोबाइल नंबर साझा किए बिना भी संवाद स्थापित किया जा सके। साथ ही यह सुनिश्चित किया गया है कि किसी अन्य व्यक्ति के नाम का दुरुपयोग न हो।
कंपनी ने सोशल मीडिया मंच एक्स पर उपयोगकर्ताओं के सवालों का जवाब देते हुए बताया कि इंस्टाग्राम और फेसबुक पर पहले से मौजूद यूजरनेम,सार्वजनिक हस्तियों, सरकारी संस्थाओं तथा मेटा वेरिफाइड खातों के नाम सुरक्षित रखे जाएँगे। इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि इन नामों का उपयोग केवल उनके वास्तविक और अधिकृत मालिक ही कर सकें। कंपनी के अनुसार,इससे फर्जी खातों और पहचान की चोरी की घटनाओं पर भी अंकुश लगाने में मदद मिलेगी।
डिजिटल प्लेटफॉर्म के बढ़ते प्रभाव के साथ बच्चों की ऑनलाइन सुरक्षा एक वैश्विक चिंता का विषय बन चुकी है। विभिन्न देशों की सरकारें सोशल मीडिया कंपनियों से अपेक्षा कर रही हैं कि वे बाल यौन शोषण,मानव तस्करी,साइबर अपराध और अन्य अवैध गतिविधियों से जुड़े कंटेंट के खिलाफ अधिक प्रभावी और पारदर्शी तंत्र विकसित करें। भारत भी इसी दिशा में लगातार अपने नियमों और निगरानी व्यवस्था को मजबूत कर रहा है।
विशेषज्ञों का मानना है कि सोशल मीडिया कंपनियों को केवल तकनीकी समाधान विकसित करने तक सीमित नहीं रहना चाहिए,बल्कि उन्हें अपनी विज्ञापन स्वीकृति प्रक्रिया,कंटेंट मॉडरेशन और शिकायत निवारण प्रणाली को भी अधिक पारदर्शी और जवाबदेह बनाना होगा। कृत्रिम बुद्धिमत्ता आधारित प्रणालियों के साथ प्रशिक्षित मानव मॉडरेटरों की भूमिका भी ऐसे मामलों में महत्वपूर्ण मानी जाती है,क्योंकि कई बार संवेदनशील सामग्री की पहचान केवल स्वचालित तकनीक के माध्यम से संभव नहीं होती।
केंद्र सरकार द्वारा मेटा से जवाब तलब किए जाने को डिजिटल प्लेटफॉर्म की जवाबदेही सुनिश्चित करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है। अब निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि मेटा सरकार के सवालों का क्या जवाब देता है और भविष्य में अपने प्लेटफॉर्म पर अवैध तथा संवेदनशील सामग्री को रोकने के लिए कौन-से अतिरिक्त सुरक्षा उपाय लागू करता है। सरकार का स्पष्ट संदेश है कि बच्चों की सुरक्षा और ऑनलाइन मंचों की जवाबदेही से किसी भी प्रकार का समझौता स्वीकार नहीं किया जाएगा।
