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फेमा उल्लंघन मामले में एपोथेकॉन फार्मास्यूटिकल्स को राहत, 40.52 लाख रुपये जमा होने के बाद ईडी की जाँच बंद

नई दिल्ली,17 जुलाई (युआईटीवी)- विदेशी निवेश से जुड़े नियमों के उल्लंघन के मामले में भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) ने एपोथेकॉन फार्मास्यूटिकल्स प्राइवेट लिमिटेड के खिलाफ कंपाउंडिंग आदेश जारी करते हुए मामले का निपटारा कर दिया है। कंपनी द्वारा एकमुश्त 40.52 लाख रुपये का कंपाउंडिंग शुल्क जमा करने के बाद प्रवर्तन निदेशालय ने भी इस मामले में अपनी जाँच बंद कर दी है। इस घटनाक्रम को विदेशी मुद्रा प्रबंधन अधिनियम के तहत स्वैच्छिक अनुपालन को बढ़ावा देने की दिशा में एक महत्वपूर्ण उदाहरण माना जा रहा है। प्रवर्तन निदेशालय ने गुरुवार को जारी अपने आधिकारिक बयान में इस संबंध में विस्तृत जानकारी साझा की।

प्रवर्तन निदेशालय के अनुसार,भारतीय रिजर्व बैंक ने विदेशी मुद्रा प्रबंधन अधिनियम की धारा 15 के तहत कंपाउंडिंग आदेश जारी किया। यह आदेश तब जारी किया गया जब प्रवर्तन निदेशालय ने मामले में आवश्यक जाँच के बाद भारतीय रिजर्व बैंक को अनापत्ति प्रमाणपत्र उपलब्ध कराया। इसके साथ ही कंपनी के खिलाफ दर्ज फेमा उल्लंघन से जुड़े मामलों का औपचारिक रूप से निपटारा हो गया।

जाँच एजेंसी ने बताया कि उसे कंपनी के वित्तीय लेनदेन से जुड़ी कुछ विश्वसनीय जानकारियाँ प्राप्त हुई थीं,जिसके आधार पर मामले की जाँच शुरू की गई। जाँच के दौरान यह पाया गया कि कंपनी ने विदेशी निवेश प्राप्त करने के बाद नियमानुसार आवश्यक दस्तावेज समय पर जमा नहीं किए थे। यही देरी आगे चलकर फेमा के विभिन्न प्रावधानों के उल्लंघन के रूप में सामने आई।

प्रवर्तन निदेशालय के अनुसार,जाँच में सबसे पहले यह तथ्य सामने आया कि कंपनी ने लगभग 9.91 करोड़ रुपये की विदेशी राशि प्राप्त करने के बाद फॉर्म एआरएफ निर्धारित समय सीमा के भीतर जमा नहीं किया। विदेशी निवेश प्राप्त होने पर यह फॉर्म समय पर दाखिल करना नियामकीय प्रक्रिया का महत्वपूर्ण हिस्सा माना जाता है। इसके अतिरिक्त लगभग 29.97 करोड़ रुपये के विदेशी निवेश से संबंधित एफसी-जीपीआर फॉर्म भी तय समय सीमा के भीतर दाखिल नहीं किया गया। इन दोनों मामलों को विदेशी मुद्रा प्रबंधन अधिनियम के नियमों का उल्लंघन माना गया।

जाँच के दौरान एक और महत्वपूर्ण तथ्य सामने आया कि कंपनी ने विदेशी निवेश प्राप्त होने से पहले ही लगभग 18.48 लाख रुपये मूल्य के शेयर जारी कर दिए थे। नियमानुसार विदेशी निवेश से जुड़े शेयरों का आवंटन निर्धारित प्रक्रिया और समयसीमा के अनुरूप किया जाना आवश्यक होता है। इसके अलावा कंपनी ने लगभग 2.25 करोड़ रुपये मूल्य के शेयर विदेशी निवेश प्राप्त होने के 180 दिनों से अधिक समय बीत जाने के बाद जारी किए। यह भी फेमा नियमों के विपरीत पाया गया।

प्रवर्तन निदेशालय की जाँच में यह भी स्पष्ट हुआ कि कंपनी ने तीन अलग-अलग मामलों में भारत सरकार की पूर्व स्वीकृति प्राप्त किए बिना ही विदेशी निवेशकों को शेयर आवंटित कर दिए। कुछ विशेष प्रकार के विदेशी निवेश के मामलों में सरकार की पूर्व अनुमति आवश्यक होती है। बिना अनुमति शेयर जारी करना भी फेमा के प्रावधानों का उल्लंघन माना गया और इसे जाँच के दौरान रिकॉर्ड में शामिल किया गया।

इन उल्लंघनों के सामने आने के बाद कंपनी ने विदेशी मुद्रा प्रबंधन अधिनियम की धारा 15 के तहत कंपाउंडिंग का विकल्प अपनाने का निर्णय लिया। कंपनी ने भारतीय रिजर्व बैंक के समक्ष आवेदन प्रस्तुत कर सभी उल्लंघनों के निपटारे की माँग की। भारतीय रिजर्व बैंक ने नियमानुसार इस आवेदन पर विचार किया और प्रवर्तन निदेशालय से इस संबंध में अनापत्ति प्रमाणपत्र उपलब्ध कराने का अनुरोध किया।

प्रवर्तन निदेशालय ने अपने बयान में कहा कि मामले की समीक्षा के बाद कानून की भावना और लागू नियमों के अनुरूप भारतीय रिजर्व बैंक को अनापत्ति प्रमाणपत्र जारी कर दिया गया। इसके आधार पर भारतीय रिजर्व बैंक ने 6 जुलाई 2026 को कंपाउंडिंग आदेश जारी किया और निर्धारित शुल्क के भुगतान के साथ सभी उल्लंघनों का निपटारा कर दिया गया। कंपनी द्वारा 40.52 लाख रुपये की राशि जमा करने के बाद प्रवर्तन निदेशालय ने भी अपनी जांच समाप्त कर दी।

प्रवर्तन निदेशालय ने अपने बयान में स्पष्ट किया कि उसकी नीति का उद्देश्य केवल दंडात्मक कार्रवाई करना नहीं है,बल्कि स्वैच्छिक अनुपालन को भी प्रोत्साहित करना है। यदि कोई संस्था या कंपनी फेमा के तहत हुए उल्लंघनों को स्वीकार करते हुए नियमानुसार कंपाउंडिंग के लिए आवेदन करती है,आवश्यक शर्तों का पालन करती है और उसके खिलाफ कोई गंभीर आपराधिक जाँच या अन्य कानूनी बाधा लंबित नहीं होती,तो ऐसे मामलों में विभाग भारतीय रिजर्व बैंक को अनापत्ति प्रमाणपत्र जारी करता है। इससे मामलों का शीघ्र निपटारा संभव हो पाता है और अनावश्यक मुकदमेबाजी से भी बचा जा सकता है।

प्रवर्तन निदेशालय ने यह भी कहा कि विदेशी मुद्रा प्रबंधन अधिनियम मूल रूप से एक सिविल कानून है। इसका उद्देश्य विदेशी मुद्रा लेनदेन को व्यवस्थित और पारदर्शी बनाना है। अधिनियम की धारा 15 के तहत धारा 13 में वर्णित कुछ प्रकार के उल्लंघनों की कंपाउंडिंग का प्रावधान रखा गया है,ताकि तकनीकी या प्रक्रियागत चूक वाले मामलों का समाधान लंबी कानूनी प्रक्रिया के बिना किया जा सके।

कंपाउंडिंग व्यवस्था का उद्देश्य व्यवसायों को स्वैच्छिक रूप से अपनी त्रुटियाँ सुधारने का अवसर देना भी है। इससे न्यायालयों और जाँच एजेंसियों पर अनावश्यक मामलों का बोझ कम होता है तथा कारोबार करने में आसानी को बढ़ावा मिलता है। सरकार और नियामक संस्थाएं लंबे समय से इस व्यवस्था को एक संतुलित नियामकीय तंत्र के रूप में देखती रही हैं,जिसमें नियमों का पालन भी सुनिश्चित होता है और व्यापारिक गतिविधियों पर अनावश्यक दबाव भी नहीं पड़ता।

विदेशी मुद्रा प्रबंधन अधिनियम के तहत कंपाउंडिंग की प्रक्रिया अब फॉरेन एक्सचेंज (कंपाउंडिंग प्रोसीडिंग्स) रूल्स,2024 के अनुसार संचालित की जाती है। इन नियमों में आवेदन दाखिल करने,उसकी जाँच करने,संबंधित पक्षों से आवश्यक जानकारी प्राप्त करने और अंतिम कंपाउंडिंग आदेश जारी करने की पूरी प्रक्रिया निर्धारित की गई है। इन नियमों का उद्देश्य सभी मामलों में पारदर्शिता और एकरूपता बनाए रखना है।

हालाँकि,नियमों में यह भी स्पष्ट किया गया है कि सभी प्रकार के फेमा उल्लंघन कंपाउंडिंग के दायरे में नहीं आते। यदि कोई मामला मनी लॉन्ड्रिंग,आतंकवाद के वित्तपोषण, राष्ट्रीय सुरक्षा,देश की संप्रभुता या अखंडता को प्रभावित करने वाले गंभीर अपराधों से जुड़ा हो,तो ऐसे मामलों में कंपाउंडिंग की अनुमति नहीं दी जाती। ऐसे मामलों में अलग कानूनी प्रक्रिया के तहत जाँच और कार्रवाई जारी रहती है।

फॉरेन एक्सचेंज (कंपाउंडिंग प्रोसीडिंग्स) रूल्स, 2024 के नियम 3 के अनुसार भारतीय रिजर्व बैंक अपने अधिकार क्षेत्र में आने वाले पात्र मामलों में कंपाउंडिंग करने वाला सक्षम प्राधिकारी है। बैंक प्रत्येक मामले की प्रकृति,उल्लंघन की गंभीरता,उसकी अवधि,संबंधित राशि और अन्य परिस्थितियों का मूल्यांकन करने के बाद कंपाउंडिंग शुल्क निर्धारित करता है।

भारतीय रिजर्व बैंक ने फेमा के तहत कंपाउंडिंग प्रक्रिया को अधिक स्पष्ट और पारदर्शी बनाने के लिए विस्तृत मास्टर डायरेक्शन भी जारी किए हैं। इनमें यह बताया गया है कि विभिन्न प्रकार के उल्लंघनों के लिए शुल्क किस प्रकार निर्धारित किया जाएगा तथा किन परिस्थितियों में आवेदन स्वीकार या अस्वीकार किया जा सकता है। इसका उद्देश्य सभी आवेदकों के लिए एक समान और पारदर्शी व्यवस्था सुनिश्चित करना है।

एपोथेकॉन फार्मास्यूटिकल्स प्राइवेट लिमिटेड का यह मामला इस बात का उदाहरण माना जा रहा है कि यदि किसी कंपनी से प्रक्रियागत या तकनीकी स्तर पर फेमा के नियमों का उल्लंघन हो जाता है और वह समय रहते स्वैच्छिक रूप से नियामकीय प्रक्रिया का पालन करते हुए कंपाउंडिंग के लिए आवेदन करती है,तो कानून के प्रावधानों के अनुरूप उसका समाधान भी संभव है। वहीं,यह मामला कंपनियों के लिए एक महत्वपूर्ण संदेश भी देता है कि विदेशी निवेश से जुड़े सभी दस्तावेज,अनुमतियाँ और नियामकीय औपचारिकताएँ समय पर पूरी करना आवश्यक है,क्योंकि लापरवाही की स्थिति में जाँच,दंड और अतिरिक्त वित्तीय दायित्वों का सामना करना पड़ सकता है।