नई दिल्ली,3 जुलाई (युआईटीवी)- बॉलीवुड में हर साल कई थ्रिलर, एक्शन और सस्पेंस से भरपूर फिल्में रिलीज होती हैं। इनमें से कुछ फिल्में केवल अपने बड़े बजट या स्टारकास्ट की वजह से चर्चा में रहती हैं,जबकि कुछ ऐसी भी होती हैं जो अपनी कहानी, निर्देशन और अभिनय के दम पर दर्शकों के दिलों में जगह बना लेती हैं। हाल के समय में रिलीज हुई फिल्म ‘बेबी डू डाई डू’ ऐसी ही एक फिल्म है,जिसने अपने अलग विषय, प्रभावशाली प्रस्तुतीकरण और मजबूत अभिनय के कारण दर्शकों और समीक्षकों का ध्यान अपनी ओर खींचा है। यह फिल्म पारंपरिक बॉलीवुड मसाला फिल्मों से अलग हटकर रहस्य,अपराध,भावनाओं और प्रेम को एक ऐसे अंदाज में पेश करती है,जो शुरुआत से लेकर अंत तक दर्शकों की उत्सुकता बनाए रखता है।
फिल्म की सबसे बड़ी विशेषता इसका वातावरण है। लगातार होती बारिश,धुंधली रोशनी, अंधेरे से भरे दृश्य और रहस्यमयी माहौल पूरी कहानी को एक अलग पहचान देते हैं। निर्देशक ने केवल कहानी पर ही नहीं,बल्कि उसके प्रस्तुतीकरण पर भी विशेष ध्यान दिया है। यही कारण है कि फिल्म का हर दृश्य दर्शकों को कहानी के भीतर खींच लेता है। बैकग्राउंड म्यूजिक और सिनेमैटोग्राफी इस माहौल को और अधिक प्रभावशाली बना देते हैं। फिल्म में हर कुछ मिनटों के बाद आने वाले नए मोड़ दर्शकों को लगातार यह सोचने पर मजबूर करते हैं कि आगे क्या होने वाला है।
फिल्म की कहानी बेबी करमरकर नाम की एक ऐसी महिला के इर्द-गिर्द घूमती है,जो सुन और बोल नहीं सकती। पहली नजर में उसकी यह शारीरिक स्थिति उसे कमजोर बना सकती है,लेकिन कहानी आगे बढ़ने के साथ यही उसकी सबसे बड़ी ताकत बन जाती है। वह बेहद शांत,सतर्क और खतरनाक पेशेवर सुपारी किलर है,जो मुंबई के रियल एस्टेट माफिया के लिए काम करती है। उसका हर मिशन बेहद योजनाबद्ध होता है और वह अपने निशाने को बिना कोई सुराग छोड़े खत्म कर देती है। उसकी सबसे खास पहचान उसकी छतरी है,जिसमें वह बंदूक छिपाकर अपने लक्ष्य तक पहुँचती है। यह अनोखा अंदाज फिल्म को बाकी थ्रिलर फिल्मों से अलग बनाता है।
हालाँकि,बेबी केवल एक पेशेवर हत्यारी नहीं है। उसके भीतर वर्षों से दबा हुआ एक गहरा दर्द भी है। उसकी बहन की हत्या कई साल पहले रहस्यमय परिस्थितियों में हुई थी और वह पिछले बीस वर्षों से इस घटना के पीछे छिपे लोगों की तलाश कर रही है। यही दर्द उसके जीवन की सबसे बड़ी प्रेरणा बन जाता है। वह अपराध की दुनिया में रहते हुए भी केवल अपने अतीत का सच जानना चाहती है। यही भावनात्मक संघर्ष फिल्म को केवल एक एक्शन थ्रिलर नहीं रहने देता,बल्कि उसे एक संवेदनशील मानवीय कहानी में बदल देता है।
कहानी तब नया मोड़ लेती है,जब बेबी को एक बेहद प्रभावशाली और ताकतवर व्यक्ति की हत्या का जिम्मा सौंपा जाता है। यह मिशन उसके लिए पहले के किसी भी मिशन से अलग साबित होता है। जैसे-जैसे वह इस काम को अंजाम देने की कोशिश करती है, उसके सामने ऐसे रहस्य खुलने लगते हैं,जो उसके अतीत,उसकी बहन की मौत और उसके अपने जीवन से जुड़े होते हैं। यहीं से फिल्म का सस्पेंस और रोमांच लगातार बढ़ता जाता है। दर्शक हर दृश्य के साथ नए सवालों और नए खुलासों का सामना करते हैं।
फिल्म का भावनात्मक पक्ष भी इसकी सबसे बड़ी ताकतों में शामिल है। अपराध और हिंसा के बीच बेबी की जिंदगी में प्रेम की भी दस्तक होती है। पहली बार वह सामान्य जीवन जीने,खुश रहने और अपने अतीत को पीछे छोड़ने का सपना देखने लगती है। निर्देशक ने इस प्रेम कहानी को बेहद सादगी और संवेदनशीलता के साथ प्रस्तुत किया है। यहाँ किसी तरह की बनावटी नाटकीयता नहीं दिखाई देती,बल्कि दो इंसानों के बीच धीरे-धीरे विकसित होते भावनात्मक संबंधों को सहज तरीके से दर्शाया गया है। यही कारण है कि दर्शक बेबी के भीतर चल रहे भावनात्मक संघर्ष को आसानी से महसूस कर पाते हैं।
इस प्रेम कहानी को और अधिक प्रभावशाली बनाने में संगीत की भी महत्वपूर्ण भूमिका है। गायक मोहित चौहान की आवाज में फिल्माया गया गीत कहानी में एक अलग ही भावनात्मक गहराई जोड़ देता है। यह गीत केवल मनोरंजन का हिस्सा नहीं लगता,बल्कि मुख्य किरदार की मनःस्थिति और उसके बदलते जीवन को अभिव्यक्त करता है। फिल्म का संगीत कहानी के साथ पूरी तरह घुला-मिला हुआ महसूस होता है।
लेकिन जैसे ही बेबी एक सामान्य जीवन की उम्मीद करने लगती है,उसका हिंसक अतीत फिर उसके सामने आ खड़ा होता है। अपराध की दुनिया इतनी आसानी से उसका पीछा नहीं छोड़ती। अपने प्यार और अपने भविष्य को बचाने की कोशिश करते हुए उसे आखिरकार अपनी बहन की हत्या से जुड़ा वह सच भी मिल जाता है,जिसकी तलाश वह दो दशकों से कर रही थी। इसके बाद फिल्म तेजी से क्लाइमैक्स की ओर बढ़ती है,जहाँ रहस्य,बदला और भावनाएँ एक साथ सामने आती हैं।
फिल्म की सबसे बड़ी ताकत इसकी कलाकारों की टोली है। हुमा कुरैशी,चंकी पांडे, सिकंदर खेर,सीमा पाहवा,रचित सिंह,मरुधर शेखावत,अरुण कुशवाहा और अन्य कलाकारों ने अपने-अपने किरदारों के साथ पूरा न्याय किया है। सभी कलाकार कहानी की जरूरत के अनुसार सधे हुए अभिनय के साथ नजर आते हैं। किसी भी किरदार को अनावश्यक रूप से बड़ा या छोटा नहीं बनाया गया है। यही संतुलन फिल्म को और प्रभावशाली बनाता है।
हालाँकि,पूरी फिल्म में सबसे अधिक प्रभावित करती हैं हुमा कुरैशी। उन्होंने बिना एक भी संवाद बोले केवल अपनी आँखों,चेहरे के हावभाव और शारीरिक भाषा के माध्यम से अपने किरदार की भावनाओं को जिस तरह जीवंत किया है,वह बेहद प्रभावशाली है। दर्द,गुस्सा, अकेलापन,प्रेम,डर और बदले की आग जैसी जटिल भावनाओं को उन्होंने बिना शब्दों के व्यक्त किया है। यह अभिनय उनके करियर की सबसे मजबूत प्रस्तुतियों में गिना जा सकता है। कई दृश्यों में केवल उनके चेहरे के भाव ही पूरी कहानी कह देते हैं।
चंकी पांडे और सिकंदर खेर ने भी अपने किरदारों को गंभीरता के साथ निभाया है। सीमा पाहवा हमेशा की तरह अपने सीमित लेकिन प्रभावशाली अभिनय से प्रभावित करती हैं। सहायक कलाकारों ने भी कहानी को मजबूत बनाने में महत्वपूर्ण योगदान दिया है। किसी भी कलाकार का अभिनय बनावटी या अतिनाटकीय नहीं लगता,जिससे पूरी फिल्म वास्तविकता के करीब महसूस होती है।
फिल्म के तकनीकी पक्ष की बात करें तो यह अपनी श्रेणी की मजबूत फिल्मों में शामिल की जा सकती है। संगीतकार अर्जुन अय्यर ने ऐसा संगीत तैयार किया है,जो फिल्म के हर दृश्य के प्रभाव को कई गुना बढ़ा देता है। बैकग्राउंड स्कोर विशेष रूप से उल्लेखनीय है। जहाँ रहस्य बढ़ता है,वहाँ संगीत तनाव पैदा करता है और जहाँ भावनाएँ उभरती हैं,वहाँ वही संगीत संवेदनशीलता को गहरा कर देता है।
तोजो जेवियर की सिनेमैटोग्राफी फिल्म की एक और बड़ी ताकत है। उन्होंने बारिश,अँधेरे, रोशनी और रंगों का जिस तरह इस्तेमाल किया है,वह हर फ्रेम को कलात्मक बना देता है। कई दृश्य ऐसे हैं,जो किसी पेंटिंग की तरह सुंदर दिखाई देते हैं। कैमरे की भाषा कहानी को केवल दिखाती नहीं,बल्कि महसूस भी कराती है। मुंबई की बरसाती रातें,सुनसान सड़कें और रहस्यमयी माहौल पूरी फिल्म को एक अलग दृश्यात्मक पहचान देते हैं।
निर्देशक नचिकेत सामंत की सबसे बड़ी सफलता यही है कि उन्होंने पारंपरिक बॉलीवुड फॉर्मूले से हटकर एक अलग तरह की थ्रिलर फिल्म बनाने का साहस दिखाया। उन्होंने कहानी को बिना अनावश्यक मसाले,लंबे संवादों या बेवजह के एक्शन दृश्यों के आगे बढ़ाया है। उनका निर्देशन आत्मविश्वास से भरा हुआ दिखाई देता है। फिल्म कहीं भी अपनी गति नहीं खोती और दर्शकों की दिलचस्पी लगातार बनी रहती है।
निर्माता साकिब सलीम ने भी इस तरह के अलग विषय पर फिल्म बनाकर जोखिम उठाया है। ऐसे समय में जब बड़े बजट की व्यावसायिक फिल्मों का दबदबा रहता है,इस तरह की प्रयोगधर्मी फिल्म को समर्थन देना अपने आप में सराहनीय कदम माना जा सकता है। फिल्म यह साबित करती है कि मजबूत कहानी और प्रभावशाली प्रस्तुतीकरण के दम पर भी दर्शकों का मनोरंजन किया जा सकता है।
फिल्म की एक और खास बात यह है कि गंभीर और हिंसक माहौल के बावजूद इसमें एक अलग तरह का हास्य भी मौजूद है। यह हास्य जबरदस्ती नहीं डाला गया है,बल्कि परिस्थितियों से स्वाभाविक रूप से निकलता है। यही वजह है कि फिल्म लगातार तनावपूर्ण होने के बावजूद बोझिल नहीं लगती। रहस्य और भावनाओं के बीच हल्के-फुल्के पल दर्शकों को राहत भी देते हैं और कहानी को संतुलित बनाए रखते हैं।
हालाँकि,फिल्म पूरी तरह त्रुटिहीन नहीं है। कुछ स्थानों पर कहानी थोड़ी धीमी होती हुई महसूस होती है और कुछ रहस्यों को थोड़ा अधिक विस्तार से दिखाया जा सकता था,लेकिन ये छोटी कमियाँ फिल्म के समग्र प्रभाव को अधिक प्रभावित नहीं करतीं। मजबूत पटकथा,शानदार अभिनय और प्रभावशाली तकनीकी प्रस्तुतीकरण इन कमियों पर भारी पड़ते हैं।
कुल मिलाकर ‘बेबी डू डाई डू’ हाल के वर्षों में आई उन चुनिंदा बॉलीवुड थ्रिलर फिल्मों में शामिल की जा सकती है,जो दर्शकों को कुछ नया अनुभव देने में सफल रहती हैं। इसमें रहस्य है,रोमांच है,भावनाएँ हैं,बदले की कहानी है,संवेदनशील प्रेम है और तकनीकी रूप से प्रभावशाली प्रस्तुतीकरण भी है। हुमा कुरैशी का शानदार अभिनय,दमदार निर्देशन,यादगार संगीत और बेहतरीन सिनेमैटोग्राफी इसे एक अलग पहचान देते हैं। यदि आप ऐसी फिल्में पसंद करते हैं,जो पारंपरिक मनोरंजन से आगे बढ़कर मजबूत कहानी और प्रभावशाली अभिनय के दम पर दर्शकों को बांधे रखें,तो ‘बेबी डू डाई डू’ निश्चित रूप से देखने लायक फिल्म साबित हो सकती है। यह फिल्म केवल एक थ्रिलर नहीं,बल्कि दर्द,प्रेम,अपराध और इंसानी जज्बातों की ऐसी यात्रा है,जो अंत तक दर्शकों को अपने साथ जोड़े रखती है।
