दिल्ली जिमखाना क्लब विवाद पहुँचा हाईकोर्ट (तस्वीर क्रेडिट@premkumarcbn01)

दिल्ली जिमखाना क्लब विवाद पहुँचा हाईकोर्ट,केंद्र बोला- कानून के तहत ही लिया जाएगा कब्जा

नई दिल्ली,26 मई (युआईटीवी)- देश की राजधानी दिल्ली के सबसे प्रतिष्ठित सामाजिक संस्थानों में शामिल दिल्ली जिमखाना क्लब को लेकर केंद्र सरकार और क्लब प्रबंधन के बीच विवाद अब कानूनी मोड़ ले चुका है। मंगलवार को इस मामले पर दिल्ली हाईकोर्ट में महत्वपूर्ण सुनवाई हुई,जहाँ केंद्र सरकार ने अदालत को भरोसा दिलाया कि क्लब परिसर पर किसी भी तरह का कब्जा केवल कानून में तय प्रक्रिया के तहत ही लिया जाएगा। केंद्र सरकार की ओर से पेश सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने अदालत में कहा कि सरकार किसी तरह की जबरन कार्रवाई नहीं करेगी और कानूनी प्रक्रिया का पूरी तरह पालन किया जाएगा।

यह मामला उस नोटिस से जुड़ा है,जिसमें केंद्र सरकार ने दिल्ली जिमखाना क्लब को पाँच जून तक परिसर खाली करने के लिए कहा है। क्लब प्रबंधन ने इस आदेश को चुनौती देते हुए दिल्ली हाईकोर्ट का रुख किया है। क्लब का कहना है कि यह मामला पहले से राष्ट्रीय कंपनी कानून न्यायाधिकरण यानी एनसीएलटी के समक्ष लंबित है और ऐसे में सरकार द्वारा परिसर खाली कराने की प्रक्रिया उचित नहीं है।

मंगलवार को हुई सुनवाई के दौरान अदालत कक्ष में काफी दिलचस्प बहस देखने को मिली। जिमखाना क्लब के सदस्यों की ओर से वरिष्ठ वकील अभिषेक मनु सिंघवी ने पक्ष रखा,जबकि केंद्र सरकार की ओर से सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने दलीलें पेश कीं। सुनवाई के दौरान अदालत ने दोनों पक्षों से कई अहम सवाल पूछे और सरकार से स्पष्ट रूप से यह जानना चाहा कि क्या किसी प्रकार की जबरन बेदखली की कार्रवाई की जाएगी।

सुनवाई के दौरान तुषार मेहता ने अदालत को बताया कि संबंधित लीज की क्लॉज़ 4 में सरकार को अधिकार दिए गए हैं,जिनके तहत वह लीज समाप्त कर सकती है। उन्होंने कहा कि कानून में स्पष्ट प्रावधान मौजूद हैं कि यदि अधिग्रहण किया जाता है,तो मुआवजे की व्यवस्था भी होगी। यह मुआवजा धनराशि के रूप में दिया जा सकता है या फिर सरकार दूसरी जमीन भी उपलब्ध करा सकती है। उन्होंने अदालत से कहा कि सरकार किसी भी स्थिति में तय कानूनी प्रक्रिया से बाहर जाकर कार्रवाई नहीं करेगी।

मेहता ने अदालत को यह भी आश्वासन दिया कि यदि क्लब पाँच जून तक परिसर खाली नहीं करता,तब भी तुरंत कब्जा नहीं लिया जाएगा। उन्होंने कहा कि किसी भी प्रकार की बेदखली केवल कानून के तहत निर्धारित प्रक्रिया का पालन करने के बाद ही संभव होगी। उन्होंने साफ कहा कि पुलिस बल के जरिए अचानक कोई कार्रवाई नहीं की जाएगी।

अदालत ने इस दौरान तुषार मेहता से पूछा कि क्या उनके इस बयान को रिकॉर्ड पर लिया जा सकता है। इस पर मेहता ने सहमति जताई और कहा कि सरकार कानून के मुताबिक ही आगे बढ़ेगी। अदालत ने यह भी कहा कि फिलहाल मुद्दा केवल कब्जा लेने की प्रक्रिया को लेकर है और उसे कानूनी तरीके से ही पूरा किया जाना चाहिए।

दूसरी ओर क्लब की तरफ से पेश अभिषेक मनु सिंघवी ने केंद्र सरकार की कार्रवाई पर गंभीर सवाल उठाए। उन्होंने कहा कि दिल्ली जिमखाना क्लब एक गैर-लाभकारी संस्था है और सरकार जिस तरह से कार्रवाई कर रही है,वह उचित नहीं है। सिंघवी ने अदालत को बताया कि सरकार ने आदेश जारी किया है कि पाँच जून तक क्लब को स्वेच्छा से खाली कर दिया जाए,जबकि इस मामले से जुड़े कई मुद्दे पहले से एनसीएलटी और राष्ट्रीय कंपनी विधि अपीलीय न्यायाधिकरण यानी एनसीएलएटी के समक्ष विचाराधीन हैं।

सिंघवी ने आरोप लगाया कि यह कोई सामान्य प्रशासनिक प्रक्रिया नहीं है,बल्कि क्लब के प्रबंधन को बदलने की कोशिश भी की गई है। उन्होंने अदालत को बताया कि पहले क्लब की 15 सदस्यीय समिति थी,जिसे बदलकर सरकार ने अपने नामित सदस्यों वाली समिति नियुक्त कर दी। उनके अनुसार यह पूरी प्रक्रिया विवादास्पद है और इसे चुनौती दी गई है।

इस पर तुषार मेहता ने जवाब देते हुए कहा कि ऐसा प्रतीत होता है कि याचिकाकर्ताओं को आशंका है कि नई समिति सरकार के साथ मिलीभगत कर रही है। हालाँकि,उन्होंने दोहराया कि सरकार केवल कानून के अनुसार ही आगे बढ़ेगी और किसी प्रकार की जल्दबाजी नहीं की जाएगी।

सुनवाई के दौरान अदालत ने यह भी कहा कि यदि जमीन का अधिग्रहण हो भी जाता है,तो क्लब के सदस्यों की सदस्यता समाप्त नहीं होगी। इस पर तुषार मेहता ने कहा कि सरकार वैकल्पिक जमीन देने के विकल्प पर भी विचार कर सकती है। अदालत ने इस बिंदु पर विशेष रुचि दिखाई और सरकार से स्पष्टता माँगी कि क्या फिलहाल मुद्दा केवल परिसर खाली कराने तक सीमित है।

तुषार मेहता ने अदालत को बताया कि केंद्र सरकार द्वारा नियुक्त जिमखाना प्रबंधन समिति ने भी इस आदेश पर अपनी आपत्ति दर्ज कराई है। उन्होंने कहा कि सरकार का उद्देश्य कानून व्यवस्था का उल्लंघन करना नहीं है और कोई भी कदम वैधानिक प्रक्रिया के तहत ही उठाया जाएगा।

दिल्ली हाईकोर्ट ने सुनवाई के दौरान यह भी उल्लेख किया कि इस मामले का पहले से मुकदमेबाजी का लंबा इतिहास रहा है। अदालत ने कहा कि अतीत में भी लीज की शर्तों के उल्लंघन को लेकर कार्रवाई शुरू हुई थी,लेकिन बाद में मामला सुलझा लिया गया था। इसके बाद क्लब के प्रबंधन को लेकर विवाद सामने आया और यह मामला एनसीएलटी तक पहुंचा।

अदालत ने कहा कि एनसीएलटी ने क्लब के प्रबंधन में कथित अनियमितताओं को देखते हुए 15 सदस्यों की नियुक्ति का आदेश दिया था। अब उसी पृष्ठभूमि में केंद्र सरकार द्वारा परिसर खाली कराने का मुद्दा सामने आया है,जिससे विवाद और गहरा गया है।

सुनवाई के अंत में दिल्ली हाईकोर्ट ने केंद्र सरकार को समन जारी करते हुए आठ सप्ताह के भीतर जवाब दाखिल करने का निर्देश दिया। इसके साथ ही मामले की अगली सुनवाई की तारीख भी तय की जाएगी। अदालत ने फिलहाल सरकार के उस आश्वासन को रिकॉर्ड पर लिया कि बिना कानूनी प्रक्रिया पूरी किए कोई जबरन कब्जा नहीं लिया जाएगा।

दिल्ली जिमखाना क्लब केवल एक सामाजिक संस्था नहीं,बल्कि राजधानी के इतिहास और अभिजात्य सामाजिक संस्कृति का महत्वपूर्ण हिस्सा माना जाता है। वर्ष 1913 में स्थापित यह क्लब लंबे समय से देश के सबसे प्रतिष्ठित क्लबों में शामिल रहा है। यहाँ वरिष्ठ नौकरशाहों,सैन्य अधिकारियों,राजनयिकों,उद्योगपतियों और प्रभावशाली व्यक्तियों की सदस्यता रही है।

लुटियंस दिल्ली के बेहद महत्वपूर्ण इलाके में स्थित यह क्लब सफदरजंग रोड पर करीब 27.3 एकड़ क्षेत्र में फैला हुआ है। इसका परिसर प्रधानमंत्री के आधिकारिक आवास 7,लोक कल्याण मार्ग के बेहद करीब स्थित है। यही कारण है कि केंद्र सरकार ने सार्वजनिक सुरक्षा और रणनीतिक महत्व का हवाला देते हुए इस परिसर को अपने कब्जे में लेने का निर्णय लिया है।

क्लब का मौजूदा ढाँचा 1930 के दशक की शुरुआत में प्रसिद्ध वास्तुकार रॉबर्ट टी. रसेल द्वारा तैयार किया गया था। रसेल वही वास्तुकार थे,जिन्होंने नई दिल्ली के कई प्रतिष्ठित भवनों की रूपरेखा तैयार की थी। जिमखाना क्लब अपनी औपनिवेशिक शैली की वास्तुकला,विशाल लॉन,खेल सुविधाओं और विशिष्ट सामाजिक वातावरण के लिए जाना जाता है।

फिलहाल क्लब में करीब 5,600 स्थायी सदस्य हैं। इसकी सदस्यता को देश की सबसे प्रतिष्ठित सदस्यताओं में गिना जाता है। बताया जाता है कि क्लब की सदस्यता पाने के लिए लोगों को दशकों तक इंतजार करना पड़ता है। कई प्रभावशाली लोग वर्षों से वेटिंग लिस्ट में बने हुए हैं।

अब इस पूरे विवाद ने दिल्ली के सामाजिक और राजनीतिक गलियारों में नई चर्चा छेड़ दी है। एक ओर केंद्र सरकार सार्वजनिक सुरक्षा और प्रशासनिक अधिकारों की बात कर रही है,वहीं दूसरी ओर क्लब प्रबंधन इसे संस्था की स्वायत्तता और अधिकारों का मामला बता रहा है। कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि यह मामला केवल एक क्लब तक सीमित नहीं है,बल्कि इसमें सरकारी अधिकार,सार्वजनिक हित,निजी संस्थागत स्वायत्तता और संपत्ति संबंधी कानून जैसे कई बड़े प्रश्न जुड़े हुए हैं।

आने वाले दिनों में इस मामले की सुनवाई पर देशभर की नजरें टिकी रहेंगी। यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि अदालत इस विवाद में किस तरह संतुलन स्थापित करती है और क्या केंद्र सरकार तथा क्लब प्रबंधन के बीच कोई समाधान निकल पाता है या नहीं। फिलहाल इतना स्पष्ट है कि दिल्ली जिमखाना क्लब का यह विवाद अब केवल प्रशासनिक मामला नहीं रह गया है,बल्कि यह राजधानी के सबसे चर्चित कानूनी और राजनीतिक मुद्दों में शामिल हो चुका है।