रामलिंगा रेड्डी ने मंत्री पद से दिया इस्तीफा (तस्वीर क्रेडिट@airnewsalerts)

विभागों के बँटवारे से कर्नाटक कांग्रेस में बढ़ी नाराजगी,रामलिंगा रेड्डी ने मंत्री पद से दिया इस्तीफा

बेंगलुरु,5 जून (युआईटीवी)- कर्नाटक की राजनीति में उस समय नया मोड़ आ गया,जब राज्य सरकार में विभागों के बँटवारे को लेकर वरिष्ठ कांग्रेस नेता रामलिंगा रेड्डी ने मंत्री पद से इस्तीफा देने का फैसला कर लिया। उनके इस कदम ने न केवल राज्य की सियासत में हलचल पैदा कर दी है,बल्कि कांग्रेस सरकार के भीतर असंतोष और नाराजगी की चर्चाओं को भी हवा दे दी है। हालाँकि,रेड्डी ने स्पष्ट किया है कि उनका फैसला किसी व्यक्ति या पार्टी के खिलाफ नहीं है,बल्कि यह उनके आत्मसम्मान से जुड़ा मामला है। उन्होंने यह भी कहा कि वह कांग्रेस पार्टी के साथ बने रहेंगे और विधायक के रूप में जनता की सेवा जारी रखेंगे।

दरअसल,हाल ही में कर्नाटक मंत्रिमंडल में विभागों का बँटवारा किया गया था। इसी दौरान रामलिंगा रेड्डी को जल संसाधन विभाग की जिम्मेदारी सौंपी गई,लेकिन रेड्डी इस फैसले से संतुष्ट नहीं दिखे। उनका कहना है कि मंत्री पद स्वीकार करने से पहले उन्हें बेंगलुरु अर्बन डेवलपमेंट विभाग दिए जाने का भरोसा दिलाया गया था। उन्होंने इसी आश्वासन के आधार पर मंत्रिमंडल में शामिल होने की सहमति दी थी,लेकिन बाद में विभागों के अंतिम बँटवारे में उन्हें यह विभाग नहीं मिला और इसकी जिम्मेदारी कृष्णा बायरे गौड़ा को सौंप दी गई।

रेड्डी ने मीडिया से बातचीत के दौरान कहा कि उन्होंने लंबे समय तक सार्वजनिक जीवन में काम किया है और हमेशा संगठन तथा जनता के हितों को प्राथमिकता दी है। उनका कहना था कि जब किसी वरिष्ठ नेता को एक विशेष जिम्मेदारी का आश्वासन दिया जाता है और बाद में उसे बदल दिया जाता है,तो यह स्वाभाविक रूप से निराशा पैदा करता है। उन्होंने कहा कि वह किसी से व्यक्तिगत रूप से नाराज नहीं हैं,लेकिन उन्हें लगता है कि उनके साथ किया गया वादा पूरा नहीं किया गया।

उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि उनके इस्तीफे को किसी प्रकार के विद्रोह या राजनीतिक दबाव के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए। रेड्डी ने कहा कि वह कांग्रेस के समर्पित कार्यकर्ता हैं और पार्टी की विचारधारा के प्रति उनकी निष्ठा पहले की तरह बनी रहेगी। उन्होंने कहा कि मंत्री पद छोड़ने का फैसला पूरी तरह व्यक्तिगत है और इसका उद्देश्य केवल अपने आत्मसम्मान की रक्षा करना है।

सूत्रों के अनुसार,रेड्डी ने अपना इस्तीफा मुख्यमंत्री कार्यालय को भेज दिया है। हालाँकि,अभी तक इस पर अंतिम निर्णय सामने नहीं आया है,लेकिन उनके इस कदम ने कांग्रेस नेतृत्व के लिए नई चुनौती खड़ी कर दी है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यदि इस मुद्दे को समय रहते नहीं सुलझाया गया,तो इससे सरकार और संगठन दोनों के भीतर असंतोष बढ़ सकता है।

रामलिंगा रेड्डी कर्नाटक कांग्रेस के अनुभवी नेताओं में गिने जाते हैं। लंबे समय से सक्रिय राजनीति में रहने वाले रेड्डी ने राज्य की राजनीति में अपनी अलग पहचान बनाई है। विशेष रूप से बेंगलुरु क्षेत्र में उनका मजबूत जनाधार माना जाता है। ऐसे में उनका मंत्री पद छोड़ने का फैसला केवल व्यक्तिगत असंतोष का मामला नहीं माना जा रहा,बल्कि इसे सरकार के भीतर संतुलन और समन्वय से भी जोड़कर देखा जा रहा है।

राजनीतिक हलकों में यह चर्चा भी तेज हो गई है कि क्या विभागों के बँटवारे को लेकर कांग्रेस के अन्य नेताओं में भी असंतोष है। हालाँकि,अभी तक किसी अन्य मंत्री या विधायक ने खुलकर अपनी नाराजगी जाहिर नहीं की है,लेकिन माना जा रहा है कि कई नेता अपने पसंदीदा विभाग नहीं मिलने से संतुष्ट नहीं हैं। ऐसे में रेड्डी का इस्तीफा उन नेताओं के लिए भी एक संकेत माना जा रहा है,जो फिलहाल अपनी नाराजगी सार्वजनिक रूप से व्यक्त नहीं कर रहे हैं।

कांग्रेस सरकार के लिए यह स्थिति इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि राज्य में सरकार बनने के बाद से पार्टी नेतृत्व लगातार एकजुटता और स्थिरता का संदेश देने की कोशिश करता रहा है। ऐसे समय में एक वरिष्ठ नेता का इस्तीफा विपक्ष को सरकार पर हमला करने का अवसर दे सकता है। विपक्षी दल पहले ही सरकार के भीतर कथित गुटबाजी और असंतोष को मुद्दा बनाने की कोशिश कर रहे हैं।

दूसरी ओर,कांग्रेस नेतृत्व इस मामले को शांतिपूर्वक सुलझाने के प्रयास में जुट सकता है। पार्टी के कई वरिष्ठ नेताओं का मानना है कि रेड्डी जैसे अनुभवी नेता संगठन की महत्वपूर्ण संपत्ति हैं और उनकी नाराजगी दूर करने के लिए संवाद का रास्ता अपनाया जाना चाहिए। राजनीतिक जानकारों का भी कहना है कि यदि पार्टी नेतृत्व समय रहते हस्तक्षेप करता है तो स्थिति को सामान्य बनाया जा सकता है।

फिलहाल रामलिंगा रेड्डी अपने फैसले पर कायम नजर आ रहे हैं। उन्होंने दोहराया है कि उनका संघर्ष किसी पद या व्यक्ति के खिलाफ नहीं है,बल्कि उस वादे को लेकर है,जो उनसे किया गया था। उनके अनुसार राजनीतिक जीवन में विश्वास और सम्मान सबसे महत्वपूर्ण होते हैं और जब इन पर आंच आती है,तो व्यक्ति को अपने सिद्धांतों के अनुसार निर्णय लेना पड़ता है।

कर्नाटक की राजनीति में अब सभी की निगाहें कांग्रेस नेतृत्व और मुख्यमंत्री की अगली रणनीति पर टिकी हुई हैं। यह देखना दिलचस्प होगा कि पार्टी रेड्डी की नाराजगी को किस तरह दूर करती है और क्या उन्हें मनाने में सफलता मिलती है। फिलहाल इतना तय है कि विभागों के बँटवारे से उपजा यह विवाद राज्य की राजनीति में आने वाले दिनों में चर्चा का प्रमुख विषय बना रहेगा।