एलआईसी

सरकार के ओएफएस ऐलान से एलआईसी के शेयरों में बड़ी गिरावट,शेयर करीब 8 प्रतिशत फिसला,निवेशकों की बढ़ी चिंता

नई दिल्ली,4 अगस्त (युआईटीवी)- भारतीय जीवन बीमा निगम के शेयरों में मंगलवार को तेज गिरावट दर्ज की गई। सरकार द्वारा ऑफर फॉर सेल के माध्यम से अपनी हिस्सेदारी बेचने की घोषणा के बाद कंपनी के शेयरों पर भारी दबाव देखने को मिला। कारोबार के दौरान एलआईसी का शेयर लगभग आठ प्रतिशत तक टूट गया,जिससे निवेशकों के बीच चिंता का माहौल बन गया। बाजार विशेषज्ञों का मानना है कि कम फ्लोर प्राइस और बड़ी मात्रा में शेयरों की संभावित बिक्री ने निवेशकों की धारणा को प्रभावित किया है।

नेशनल स्टॉक एक्सचेंज पर दोपहर लगभग 12 बजे एलआईसी का शेयर 7.54 प्रतिशत की गिरावट के साथ 396 रुपये पर कारोबार कर रहा था। दिन के कारोबार के दौरान शेयर ने 402.40 रुपये का उच्चतम स्तर और 390.50 रुपये का न्यूनतम स्तर छुआ। शुरुआती कारोबार से ही शेयर में बिकवाली का दबाव बना रहा और दिन भर निवेशकों की सतर्कता स्पष्ट रूप से दिखाई दी।

इस गिरावट की मुख्य वजह केंद्र सरकार की ओर से एलआईसी में अपनी हिस्सेदारी कम करने के लिए ऑफर फॉर सेल लाने की घोषणा रही। सरकार ने कंपनी की चुकता इक्विटी पूँजी का 2.5 प्रतिशत हिस्सा आधार प्रस्ताव के रूप में बेचने का फैसला किया है। इसके साथ ही चार प्रतिशत अतिरिक्त हिस्सेदारी बेचने के लिए ग्रीनशू विकल्प भी रखा गया है। यदि इस विकल्प का पूरी तरह उपयोग किया जाता है,तो सरकार कुल 6.5 प्रतिशत हिस्सेदारी बेचकर लगभग 31,000 करोड़ रुपये जुटा सकती है।

बाजार में सबसे अधिक असर ऑफर फॉर सेल के लिए तय किए गए 382 रुपये प्रति शेयर के फ्लोर प्राइस का देखने को मिला। यह मूल्य सोमवार को एलआईसी के बंद भाव की तुलना में लगभग 11 प्रतिशत कम है। कम फ्लोर प्राइस ने निवेशकों को यह संकेत दिया कि ऑफर आकर्षक कीमत पर उपलब्ध होगा,जिससे खुले बाजार में शेयरों पर अतिरिक्त दबाव बन गया। परिणामस्वरूप कई निवेशकों ने मुनाफावसूली या जोखिम कम करने के उद्देश्य से अपने शेयर बेचना शुरू कर दिया।

विशेषज्ञों का कहना है कि जब किसी बड़ी कंपनी में प्रमोटर या सरकार अपनी बड़ी हिस्सेदारी बेचती है,तब बाजार में शेयरों की आपूर्ति बढ़ने की संभावना रहती है। इससे अल्पकालिक अवधि में शेयर की कीमतों पर दबाव आ सकता है। एलआईसी के मामले में भी यही स्थिति देखने को मिली,क्योंकि निवेशकों को आशंका रही कि बड़ी संख्या में नए शेयर बाजार में आने से मौजूदा कीमतों पर असर पड़ेगा।

ऑफर फॉर सेल मंगलवार को गैर-खुदरा निवेशकों के लिए खोला गया,जबकि खुदरा निवेशकों के लिए यह बुधवार को उपलब्ध होगा। इस प्रक्रिया के माध्यम से संस्थागत और खुदरा दोनों प्रकार के निवेशकों को सरकार से सीधे शेयर खरीदने का अवसर मिलेगा। बाजार की नजर अब इस बात पर रहेगी कि निवेशकों की ओर से इस ऑफर को कितना अच्छा प्रतिसाद मिलता है।

हालाँकि,सरकार की यह पहल केवल धन जुटाने तक सीमित नहीं है। इसका एक महत्वपूर्ण उद्देश्य भारतीय प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड के न्यूनतम सार्वजनिक हिस्सेदारी संबंधी नियमों का पालन करना भी है। वर्तमान में एलआईसी में सरकार की हिस्सेदारी लगभग 96.5 प्रतिशत है,जबकि सार्वजनिक निवेशकों के पास केवल 3.5 प्रतिशत हिस्सेदारी है। सेबी के नियमों के अनुसार सूचीबद्ध कंपनियों में न्यूनतम सार्वजनिक हिस्सेदारी निर्धारित स्तर तक होना आवश्यक है,ताकि शेयरों में पर्याप्त तरलता बनी रहे और बाजार में निष्पक्ष कारोबार सुनिश्चित हो सके।

यदि आधार प्रस्ताव और ग्रीनशू विकल्प के तहत प्रस्तावित सभी 6.5 प्रतिशत शेयर सफलतापूर्वक बिक जाते हैं,तो सरकार की हिस्सेदारी घटकर लगभग 90 प्रतिशत रह जाएगी। इससे एलआईसी न्यूनतम सार्वजनिक हिस्सेदारी के लक्ष्य के काफी करीब पहुँच जाएगी। सेबी ने सरकार को इस लक्ष्य को पूरा करने के लिए मई 2027 तक का समय दिया है।

विश्लेषकों का मानना है कि लंबी अवधि के दृष्टिकोण से सार्वजनिक हिस्सेदारी बढ़ने से एलआईसी के शेयरों में तरलता बेहतर हो सकती है और संस्थागत निवेशकों की भागीदारी भी बढ़ सकती है। हालाँकि,अल्पकाल में ऑफर फॉर सेल और कम फ्लोर प्राइस के कारण शेयर पर दबाव बना रह सकता है। ऐसे मामलों में अक्सर बाजार पहले नई आपूर्ति और मूल्य निर्धारण को समायोजित करता है,जिसके बाद स्थिति धीरे-धीरे स्थिर होती है।

एलआईसी देश की सबसे बड़ी जीवन बीमा कंपनी है और उसका बाजार में महत्वपूर्ण स्थान है। करोड़ों पॉलिसीधारकों और बड़े निवेशक आधार के कारण कंपनी के शेयरों में होने वाली हर बड़ी हलचल पर बाजार की विशेष नजर रहती है। यही कारण है कि सरकार की इस घोषणा के बाद एलआईसी का शेयर निवेशकों और विश्लेषकों के बीच चर्चा का प्रमुख विषय बन गया है।

आने वाले दिनों में यह स्पष्ट होगा कि ऑफर फॉर सेल को निवेशकों से कितना समर्थन मिलता है और इसके बाद एलआईसी के शेयरों की चाल किस दिशा में जाती है। फिलहाल बाजार का ध्यान सरकार की विनिवेश रणनीति,सार्वजनिक हिस्सेदारी बढ़ाने की प्रक्रिया और निवेशकों की प्रतिक्रिया पर केंद्रित है। निवेशकों के लिए यह घटनाक्रम केवल एक शेयर की कीमत में उतार-चढ़ाव नहीं,बल्कि देश की सबसे बड़ी बीमा कंपनी में सरकार की हिस्सेदारी कम करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम भी माना जा रहा है।