न्यूयॉर्क,27 अक्टूबर (युआईटीवी)- संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में वीटो अधिकारों और संस्थागत सुधारों को लेकर भारत ने एक बार फिर अपना स्पष्ट रुख सामने रखा है। भारत ने वीटो के इस्तेमाल के साथ-साथ उस अप्रत्यक्ष व्यवस्था की भी आलोचना की है, जिसके जरिए कुछ देश आम सहमति का हवाला देकर महत्वपूर्ण फैसलों और सुधार संबंधी बातचीत को रोक देते हैं। भारत का कहना है कि वीटो अधिकार को केवल राजनीतिक विशेषाधिकार के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए,बल्कि इसके साथ अंतर्राष्ट्रीय शांति और सुरक्षा के प्रति जिम्मेदारी भी जुड़ी हुई है। सुरक्षा परिषद की मौजूदा संरचना में बदलाव की मांग करते हुए भारत ने जोर दिया कि संस्था को आज की वैश्विक वास्तविकताओं के अनुरूप बनाया जाना चाहिए।
संयुक्त राष्ट्र महासभा में सोमवार को सुरक्षा परिषद के पाँच स्थायी सदस्यों के वीटो अधिकारों पर हुई चर्चा के दौरान संयुक्त राष्ट्र में भारत के स्थायी प्रतिनिधि पी. हरीश ने यह मुद्दा उठाया। उन्होंने कहा कि सुरक्षा परिषद में सुधार के लिए चल रही अंतरसरकारी वार्ता प्रक्रिया में वीटो का सवाल लंबे समय से महत्वपूर्ण बना हुआ है। इसके बावजूद बातचीत में ठोस प्रगति नहीं हो पा रही है। भारत के अनुसार, इसके पीछे एक बड़ी वजह आम सहमति की ऐसी व्याख्या है,जिसका इस्तेमाल सुधार प्रक्रिया को आगे बढ़ने से रोकने के लिए किया जा रहा है।
हरीश ने कहा कि अंतरसरकारी वार्ता प्रक्रिया में भी आम सहमति को अप्रत्यक्ष वीटो की तरह इस्तेमाल किया जा रहा है। उनका संकेत ऐसी प्रक्रिया संबंधी बाधाओं की ओर था, जिनके कारण सदस्य देशों के बीच बातचीत के लिए प्रस्तावित मसौदे को स्वीकार नहीं किया जा पा रहा है। भारत का मानना है कि यदि सुधारों पर चर्चा को इसी तरह रोका जाता रहा,तो सुरक्षा परिषद को अधिक प्रतिनिधित्वपूर्ण और प्रभावी बनाने का उद्देश्य अधूरा रह जाएगा।
सुरक्षा परिषद में सुधार के लिए अंतरसरकारी वार्ता यानी आईजीएन की शुरुआत इस उद्देश्य से की गई थी कि सदस्य देश परिषद की संरचना, प्रतिनिधित्व और कामकाज में बदलाव को लेकर बातचीत कर सकें। लेकिन भारत का कहना है कि इस प्रक्रिया में कुछ देशों की ओर से अपनाए जा रहे तरीकों के कारण वास्तविक प्रगति बाधित हो रही है।
हरीश ने वर्ष 2008 में महासभा द्वारा पारित उस प्रस्ताव का उल्लेख किया, जिसे आईजीएन की प्रक्रिया का आधार माना जाता है। उनके मुताबिक, इस प्रस्ताव में सुधारों के लिए अधिकतम राजनीतिक स्वीकृति हासिल करने पर जोर दिया गया है, न कि हर मुद्दे पर सभी देशों की पूर्ण सहमति को अनिवार्य बनाने पर। भारत का तर्क है कि इन दोनों अवधारणाओं के बीच अंतर को समझना जरूरी है। अधिकतम राजनीतिक स्वीकृति का अर्थ व्यापक समर्थन हासिल करना है, जबकि आम सहमति की कठोर व्याख्या किसी एक सदस्य को भी पूरी प्रक्रिया रोकने का अवसर दे सकती है।
भारत ने कहा कि बातचीत के 17 दौर पूरे होने के बावजूद कोई ठोस परिणाम सामने नहीं आया है। हरीश ने इसे ऐसी व्यावहारिक वीटो व्यवस्था का परिणाम बताया,जिसका आईजीएन को स्थापित करने वाले प्रस्ताव में स्पष्ट आधार नहीं है। उनके अनुसार,यदि हर चरण में प्रक्रिया संबंधी आपत्तियों के जरिए मसौदा तैयार करने और उस पर बातचीत शुरू करने से रोका जाता रहा,तो सुधारों को लेकर सहमति बनाने की कोशिश लगातार कमजोर होती जाएगी।
इस संदर्भ में भारत ने मसौदे पर आधारित बातचीत जल्द शुरू करने की आवश्यकता जताई। हरीश ने कहा कि व्यापक सुधारों की दिशा में आगे बढ़ने के लिए स्पष्ट समय-सीमा और ठोस लक्ष्य निर्धारित किए जाने चाहिए। भारत चाहता है कि सदस्य देश केवल प्रक्रियागत बहस में उलझे रहने के बजाय ऐसे प्रस्तावों पर चर्चा करें,जिनसे सुरक्षा परिषद की संरचना और कार्यप्रणाली में वास्तविक बदलाव संभव हो सके।
वीटो का सामान्य अर्थ सुरक्षा परिषद के किसी स्थायी सदस्य की ओर से किसी प्रस्ताव को रोकने की शक्ति से है। संयुक्त राष्ट्र चार्टर के तहत पांच स्थायी सदस्य इस अधिकार का इस्तेमाल कुछ महत्वपूर्ण मामलों में कर सकते हैं। इनमें चीन, फ्रांस, रूस, ब्रिटेन और अमेरिका शामिल हैं। लेकिन भारत ने चर्चा के दौरान उस अप्रत्यक्ष वीटो की ओर भी ध्यान दिलाया, जो औपचारिक रूप से चार्टर में निर्धारित नहीं है,फिर भी परिषद के रोजमर्रा के कामकाज को प्रभावित कर सकता है।
हरीश के अनुसार,यह अप्रत्यक्ष वीटो केवल स्थायी सदस्यों तक सीमित नहीं है। सुरक्षा परिषद के चुने हुए अस्थायी सदस्य भी कुछ प्रक्रियाओं में इसका इस्तेमाल कर सकते हैं। उन्होंने अध्यक्षीय बयानों, प्रेस बयानों और प्रतिबंध समितियों के फैसलों का उदाहरण दिया। उनके मुताबिक,आम सहमति के अलिखित नियम के कारण कोई सदस्य किसी निर्णय को रोक सकता है और कई बार उसे अपनी आपत्ति का विस्तृत कारण भी नहीं बताना पड़ता।
भारत की चिंता यह है कि ऐसी व्यवस्था से निर्णय लेने की प्रक्रिया पारदर्शी और जवाबदेह नहीं रह जाती। किसी प्रस्ताव पर औपचारिक मतदान होने से पहले ही उसे रोक दिया जाए, तो सदस्य देशों और अंतर्राष्ट्रीय समुदाय के लिए यह समझना मुश्किल हो सकता है कि निर्णय क्यों नहीं लिया गया। इससे सुरक्षा परिषद के कामकाज में देरी होने के साथ-साथ उसकी विश्वसनीयता पर भी सवाल उठते हैं।
हरीश ने इस बात पर जोर दिया कि वीटो को केवल उसके औपचारिक इस्तेमाल तक सीमित करके नहीं देखा जाना चाहिए। यदि किसी सदस्य के पास अनौपचारिक प्रक्रियाओं के जरिए महत्वपूर्ण फैसलों को रोकने की क्षमता है,तो उसके प्रभाव का आकलन भी व्यापक दृष्टिकोण से किया जाना चाहिए। भारत के मुताबिक, सुधारों पर चर्चा करते समय इस तरह की प्रक्रियागत बाधाओं को दूर करना भी जरूरी है।
भारत ने अप्रत्यक्ष वीटो की चर्चा के दौरान आतंकवाद से जुड़े मामलों का भी संदर्भ दिया। हरीश ने कहा कि चीन ने संयुक्त राष्ट्र की प्रतिबंध समितियों में कई बार पाकिस्तान स्थित आतंकवादियों के खिलाफ प्रतिबंध लगाने के प्रयासों को रोका है। इनमें लश्कर-ए-तैयबा से जुड़े जकी-उर-रहमान लखवी और शाहिद महमूद तथा जैश-ए-मोहम्मद से जुड़े साजिद मीर और मसूद अजहर के नाम शामिल हैं।
भारत लंबे समय से अंतराष्ट्रीय मंचों पर आतंकवाद के आरोपियों और संगठनों के खिलाफ कार्रवाई की मांग करता रहा है। ऐसे मामलों में प्रतिबंध लगाने के प्रस्तावों पर सहमति नहीं बन पाने को भारत आतंकवाद के विरुद्ध वैश्विक सहयोग की राह में एक बाधा के रूप में देखता है। भारत का तर्क है कि जब प्रतिबंध संबंधी फैसले आम सहमति की प्रक्रिया में अटक जाते हैं, तो सुरक्षा परिषद की कार्रवाई की प्रभावशीलता प्रभावित होती है।
यह मुद्दा वीटो अधिकारों की व्यापक बहस से भी जुड़ा हुआ है। भारत के अनुसार,किसी देश को अंतरराष्ट्रीय शांति और सुरक्षा से संबंधित फैसलों को प्रभावित करने की शक्ति मिलने के साथ यह अपेक्षा भी जुड़ी होनी चाहिए कि उसका इस्तेमाल व्यापक अंतरराष्ट्रीय हितों को ध्यान में रखकर किया जाए। भारत चाहता है कि परिषद की कार्यप्रणाली ऐसी हो, जिसमें महत्वपूर्ण सुरक्षा मामलों पर फैसले लेने की प्रक्रिया अनावश्यक रूप से बाधित न हो।
भारत ने स्पष्ट किया कि सुरक्षा परिषद की समस्याओं का समाधान केवल वीटो के इस्तेमाल को नियंत्रित करने या उसके प्रभाव को कम करने तक सीमित नहीं हो सकता। इसके लिए परिषद की सदस्य संख्या और प्रतिनिधित्व में भी व्यापक बदलाव जरूरी है। भारत का कहना है कि मौजूदा व्यवस्था आज की दुनिया की राजनीतिक, आर्थिक और जनसांख्यिकीय वास्तविकताओं को पर्याप्त रूप से प्रतिबिंबित नहीं करती।
संयुक्त राष्ट्र की स्थापना द्वितीय विश्व युद्ध के बाद हुई थी। उस समय की वैश्विक शक्ति-संरचना के आधार पर सुरक्षा परिषद में पांच देशों को स्थायी सदस्यता और वीटो अधिकार दिए गए। लेकिन पिछले आठ दशकों में दुनिया में बड़े बदलाव हुए हैं। अनेक देश स्वतंत्र हुए, नई अर्थव्यवस्थाएँ उभरीं और अंतर्राष्ट्रीय राजनीति में विभिन्न क्षेत्रों की भूमिका बढ़ी। भारत का मानना है कि सुरक्षा परिषद की संरचना में इन परिवर्तनों का प्रतिबिंब दिखाई देना चाहिए।
हरीश ने कहा कि परिषद की विश्वसनीयता,वैधता और प्रभावशीलता से जुड़े सवालों का जवाब ऐसी संस्था के जरिए ही दिया जा सकता है,जो अपने उद्देश्य के अनुरूप हो और वर्तमान वैश्विक परिस्थितियों का प्रतिनिधित्व करती हो। भारत लंबे समय से सुरक्षा परिषद में स्थायी सदस्यता के विस्तार का समर्थक रहा है और नए स्थायी सदस्यों को शामिल करने की माँग करता रहा है।
भारत ने यह भी दोहराया कि यदि सुधार के तहत किसी देश को स्थायी सदस्य बनाया जाता है, तो उसे वीटो का अधिकार भी मिलना चाहिए। हरीश के अनुसार,जब तक वीटो व्यवस्था बनी रहती है,तब तक नए स्थायी सदस्यों को इससे वंचित रखना समानता और न्याय के सिद्धांतों के अनुरूप नहीं होगा। भारत इसे एक सिद्धांत-आधारित रुख के रूप में प्रस्तुत करता है।
सुरक्षा परिषद में सुधार को लेकर कुछ प्रस्तावों में ऐसी व्यवस्था की चर्चा होती रही है, जिसके तहत नए सदस्यों को स्थायी या लंबे कार्यकाल वाली सदस्यता तो मिले,लेकिन उन्हें मौजूदा स्थायी सदस्यों की तरह वीटो अधिकार प्राप्त न हों। भारत ने इस तरह की श्रेणियां बनाने के विचार पर भी आपत्ति जताई है।
हरीश ने कहा कि लंबे कार्यकाल वाले सदस्यों या वीटो रहित स्थायी सदस्यों की अलग श्रेणियाँ बनाने से सुधार प्रक्रिया और जटिल हो सकती है। भारत का मानना है कि ऐसी व्यवस्था परिषद के भीतर असमानता को खत्म करने के बजाय उसे और गहरा कर सकती है। यदि नए स्थायी सदस्यों को पुराने स्थायी सदस्यों की तुलना में कम अधिकार दिए जाते हैं, तो परिषद के भीतर दो स्तरों की व्यवस्था बन सकती है।
भारत के अनुसार,सुधार का उद्देश्य अधिक प्रतिनिधित्व और समानता सुनिश्चित करना होना चाहिए। इसलिए सदस्यता के विस्तार के साथ अधिकारों के प्रश्न पर भी स्पष्ट और समान सिद्धांत अपनाए जाने चाहिए। भारत चाहता है कि परिषद का नया ढाँचा केवल सदस्यों की संख्या बढ़ाने तक सीमित न रहे,बल्कि निर्णय लेने की प्रक्रिया को भी अधिक न्यायसंगत बनाए।
वीटो के इस्तेमाल के बाद संबंधित देश को महासभा के सामने आकर अपने फैसले का स्पष्टीकरण देने की व्यवस्था पर भी भारत ने संशय जताया। इस व्यवस्था का उद्देश्य वीटो के इस्तेमाल को अधिक पारदर्शी बनाना और स्थायी सदस्यों की जवाबदेही बढ़ाना है। हालाँकि,हरीश ने कहा कि इस व्यवस्था के लागू होने के बाद भी वीटो का बार-बार इस्तेमाल होने की प्रवृत्ति में अपेक्षित बदलाव दिखाई नहीं दिया है।
भारत की टिप्पणी का आशय यह था कि केवल वीटो के इस्तेमाल के बाद स्पष्टीकरण माँगने से समस्या का पूरा समाधान नहीं होगा। जब तक सुरक्षा परिषद की संरचना और निर्णय लेने की प्रक्रिया में बुनियादी सुधार नहीं किए जाते,तब तक जवाबदेही बढ़ाने के प्रयास सीमित प्रभाव ही डाल सकते हैं।
कुल मिलाकर,संयुक्त राष्ट्र महासभा में भारत ने वीटो के औपचारिक और अप्रत्यक्ष दोनों रूपों पर सवाल उठाते हुए सुरक्षा परिषद में व्यापक बदलाव की माँग दोहराई है। भारत का जोर है कि सुधार प्रक्रिया को प्रक्रियागत विवादों से बाहर निकालकर ठोस बातचीत की दिशा में आगे बढ़ाया जाए। परिषद का विस्तार,नए स्थायी सदस्यों को समान अधिकार, पारदर्शी निर्णय प्रक्रिया और जवाबदेही जैसे मुद्दे इस बहस के केंद्र में हैं। भारत के अनुसार, संयुक्त राष्ट्र की प्रमुख सुरक्षा संस्था तभी अधिक प्रभावी और विश्वसनीय बन सकती है, जब उसकी संरचना वर्तमान वैश्विक वास्तविकताओं के अनुरूप हो और उसके फैसलों में व्यापक अंतर्राष्ट्रीय समुदाय का भरोसा दिखाई दे।
